अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 71/ मन्त्र 13
सं गोम॑दिन्द्र॒ वाज॑वद॒स्मे पृ॒थु श्रवो॑ बृ॒हत्। वि॒श्वायु॑र्धे॒ह्यक्षि॑तम् ॥
स्वर सहित पद पाठसम् । गोऽम॑त् । इ॒न्द्र॒ । वाज॑ऽवत् । अ॒स्मे इति॑ । पृ॒थु । श्रव॑: । बृ॒हत् । वि॒श्वऽआयु: । धे॒हि॒ । अक्षि॑तम् ॥७१.१३॥
स्वर रहित मन्त्र
सं गोमदिन्द्र वाजवदस्मे पृथु श्रवो बृहत्। विश्वायुर्धेह्यक्षितम् ॥
स्वर रहित पद पाठसम् । गोऽमत् । इन्द्र । वाजऽवत् । अस्मे इति । पृथु । श्रव: । बृहत् । विश्वऽआयु: । धेहि । अक्षितम् ॥७१.१३॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
मनुष्य के कर्तव्य का उपदेश।
पदार्थ
(इन्द्र) हे इन्द्र ! [बड़े ऐश्वर्यवाले परमेश्वर] (अस्मे) हमको (गोमत्) बहुत भूमिवाला, (वाजवत्) बहुत अन्नवाला, (पृथु) फैला हुआ, (बृहत्) बढ़ता हुआ, (विश्वायुः) पूरे जीवन तक रहनेवाला, (अक्षितम्) अक्षय [न घटनेवाला] (श्रवः) सुनने योग्य यश वा धन (सम्) अच्छे प्रकार (धेहि) दे ॥१३॥
भावार्थ
मनुष्यों को चाहिये कि परमात्मा की भक्ति के साथ ब्रह्मचर्य से विद्या प्राप्त करें और बहुत यश और धन पाकर चक्रवर्त्ती राजा होकर संसार को सुख दें और आप सुखी होवें ॥१३॥
टिप्पणी
१३−(सम्) सम्यक् (गोमत्) बहुभूमियुक्तम् (इन्द्र) परमेश्वर (वाजवत्) बह्वन्नवत् (अस्मे) अस्मभ्यम् (पृथु) विस्तृतम् (श्रवः) श्रवणीयं यशो धनं वा (बृहत्) वर्धमानम् (विश्वायुः) सर्वजीवनपर्याप्तम् (धेहि) देहि (अक्षितम्) अक्षीणम्। हानिरहितम् ॥
विषय
'विश्वायु-अक्षित' धन
पदार्थ
१. हे (इन्द्र) = परमैश्वर्यशालिन् प्रभो! (अस्मे) = हमारे लिए उस (श्रवः) = यशस्वी धन को (संधेहि) = धारण कीजिए जोकि (गोमत्) = प्रशस्त गौओंवाला हो-जिस धन के द्वारा हम घरों में गौवों को रख सकें। (वाजवत्) = प्रशस्त अन्नवाले धन को धारण कीजिए। धन के द्वारा हम शक्तिवर्धक अन्नों को जुटा सकें। यह धन (पृथु) = विस्तारवाला व (बृहत्) = वृद्धिवाला हो। इस धन के विनियोग से हम शक्तियों का विस्तार करते हुए वृद्धि को प्राप्त हों। २. यह धन हमें (विश्वायु:) = पूर्ण जीवन देनेवाला हो। इस धन से हमारे शरीरों में शक्ति का वर्धन हो, मनों में पवित्रता बढ़े, अर्थात् हम यज्ञादि की प्रवृत्तिवाले बनें न कि भोगवृत्तिवाले तथा ज्ञान के साधनों को जुटाते हुए हम दीप्त मस्तिष्कवाले बनें। यह धन (अक्षितम्) = किसी भी प्रकार से हमें क्षीण न करे।
भावार्थ
प्रभु हमें 'गोमान्-वाजवान्-पृथु-बृहत्-विश्वायु-अक्षित' धन प्राप्त कराएँ।
भाषार्थ
(इन्द्र) हे परमेश्वर! (गोमत्) इन्द्रियों को प्रशस्त बनानेवाले, (वाजवत्) बलशाली, (पृथु) विस्तृत, तथा (अक्षितम्) न क्षीण होनेवाले (बृहत् श्रवः) महाधन को, आध्यात्मिक महाधन को, (विश्वायुः) हमारी समग्र आयु पर्यन्त, (अस्मे संधेहि) हमारे साथ सम्बद्ध कीजिए, हमें प्रदान करते रहिये।
विषय
परमेश्वर।
भावार्थ
हे (इन्द्र) परमेश्वर ! राजन् ! तू (अस्मे) हमें (गोमत्) गौ आदि पशुओं से समृद्ध, (वाजवत्) ऐश्वर्य युक्त, (बृहत्) बड़ा भारी (पृथु) अति विस्तृत, (श्रवः) अन्न और यश एवं (गोमत्) ज्ञानवाणियों युक्त (वाजवत्) वीर्य से युक्त (श्रवः) वेद ज्ञान और अन्न (सं धेहि) प्रदान कर और (अक्षितम्) अक्षय, अविनाशी (विश्वायुः) पूर्ण आयु अथवा (विश्वायुः) पूर्णायु देने वाला (अक्षितम्) अक्षय अन्न (धेहि) से प्रदान कर।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
ऋषिः—मधुच्छन्दाः। देवता—इन्द्रः॥ छन्दः—गायत्री॥ षोडशर्चं सूक्तम॥
इंग्लिश (4)
Subject
In dr a Devata
Meaning
Indra, infinite lord of life and light, wealth and honour, grant us a full life of knowledge and divine speech, wealth of food and energy, great reputation, high and inexhaustible honour, and the vision of Infinity.
Translation
O Almighty God, please grant us that conspecuity which is lofty, wealthy in cattle and in strength, lasting life-long and inexhaustible.
Translation
O Almighty God, please grant us that conspicuity which is lofty, wealthy in cattle and in strength, lasting life-long and inexhaustible.
Translation
O Showerer of Gifts, completely invests us with the vast, great life prolonging and imperishable wealth and glory of cows, horses, etc.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
१३−(सम्) सम्यक् (गोमत्) बहुभूमियुक्तम् (इन्द्र) परमेश्वर (वाजवत्) बह्वन्नवत् (अस्मे) अस्मभ्यम् (पृथु) विस्तृतम् (श्रवः) श्रवणीयं यशो धनं वा (बृहत्) वर्धमानम् (विश्वायुः) सर्वजीवनपर्याप्तम् (धेहि) देहि (अक्षितम्) अक्षीणम्। हानिरहितम् ॥
बंगाली (2)
मन्त्र विषय
মনুষ্যকর্ত্যব্যোপদেশঃ
भाषार्थ
(ইন্দ্র) হে ইন্দ্র ! [পরম ঐশ্বর্যশালী পরমেশ্বর] (অস্মে) আমাদের (গোমৎ) বহু ভূমিযুক্ত/ভূস্বামী, (বাজবৎ) বহু অন্নযুক্ত করুন, (পৃথু) বিস্তৃত, (বৃহৎ) বর্ধিষ্ণু, (বিশ্বায়ুঃ) সম্পূর্ণ জীবন পর্যন্ত অটুট, (অক্ষিতম্) অক্ষয় [ক্ষয়রহিত] (শ্রবঃ) শ্রবণীয় যশ বা ধন (সম্) সম্যকরূপে (ধেহি) প্রদান করুন ॥১৩॥
भावार्थ
মনুষ্যের উচিত, পরমাত্মার ভক্তির সঙ্গে ব্রহ্মচর্য অবলম্বন করে বিদ্যা প্রাপ্ত করা এবং বহু যশ ও ধন প্রাপ্ত করে চক্রবর্ত্তী রাজা হয়ে সংসারকে সুখ প্রদান করা এবং নিজেও সুখী হওয়া ॥১৩॥
भाषार्थ
(ইন্দ্র) হে পরমেশ্বর! (গোমৎ) ইন্দ্রিয়-সমূহকে প্রশস্তকারী, (বাজবৎ) বলশালী, (পৃথু) বিস্তৃত, তথা (অক্ষিতম্) অক্ষীণ (বৃহৎ শ্রবঃ) মহাধন, আধ্যাত্মিক মহাধন, (বিশ্বায়ুঃ) আমাদের সমগ্র আয়ু পর্যন্ত, (অস্মে সন্ধেহি) আমাদের সাথে সম্বদ্ধ করুন, আমাদের প্রদান করতে থাকুন।
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