अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 96/ मन्त्र 1
ती॒व्रस्या॒भिव॑यसो अ॒स्य पा॑हि सर्वर॒था वि हरी॑ इ॒ह मु॑ञ्च। इन्द्र॒ मा त्वा॒ यज॑मानासो अ॒न्ये नि री॑रम॒न्तुभ्य॑मि॒मे सु॒तासः॑ ॥
स्वर सहित पद पाठती॒व्रस्य॑ । अ॒भिऽव॑यस: । अ॒स्य । पा॒हि॒ । स॒र्व॒ऽर॒था । वि । हरी॒ इति॑ । इ॒ह । मु॒ञ्च॒ ॥ इन्द्र॑ । मा । त्वा॒ । यज॑मानास: । अ॒न्ये । नि । रि॒र॒म॒न् । तुभ्य॑म् । इ॒मे । सु॒तास॑: ॥९६.१॥
स्वर रहित मन्त्र
तीव्रस्याभिवयसो अस्य पाहि सर्वरथा वि हरी इह मुञ्च। इन्द्र मा त्वा यजमानासो अन्ये नि रीरमन्तुभ्यमिमे सुतासः ॥
स्वर रहित पद पाठतीव्रस्य । अभिऽवयस: । अस्य । पाहि । सर्वऽरथा । वि । हरी इति । इह । मुञ्च ॥ इन्द्र । मा । त्वा । यजमानास: । अन्ये । नि । रिरमन् । तुभ्यम् । इमे । सुतास: ॥९६.१॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
राजा के कर्तव्य का उपदेश।
पदार्थ
(इन्द्र) हे इन्द्र ! [बड़े ऐश्वर्यवाले राजन्] (अस्य) इस (तीव्रस्य) तीक्ष्ण [शीघ्र बलदायक] (अभिवयसः) प्राप्त अन्न की (पाहि) तू रक्षा कर और (सर्वरथा) सब रथों के योग्य (हरी) अपने दोनों घोड़ों को (इह) यहाँ पर (वि मुञ्च) छोड़ दे। (त्वा) तुझको (यजमानासः) यजमानों के गिरानेवाले [अथवा यजमानों से भिन्न] (अन्ये) दूसरे [विरोधी] लोग (मा नि रीरमन्) न रोक लेवें, (तुभ्यम्) तेरे लिये (इमे) यह (सुतासः) सिद्ध किये हुए [तत्त्व रस] हैं ॥१॥
भावार्थ
राजा अन्न आदि बलदायक पदार्थों की रक्षा करके प्रजा की बात सुने और वैरियों के फन्दों में न पड़कर श्रेष्ठों के सिद्धान्तों को माने ॥१॥
टिप्पणी
मन्त्र १- ऋग्वेद में है-१०।१६०।१- ॥ १−(तीव्रस्य) तीक्ष्णस्य। क्षिप्रबलकरस्य (अभिवयसः) वयोऽन्नम्-निघ० २।७। अभिगतस्य प्राप्तस्यान्नास्य (अस्य) समीपस्थस्य (पाहि) रक्षां कुरु (सर्वरथा) सर्वरथयोग्यौ (वि मुञ्च) विसृज (हरी) अश्वौ (इह) अत्र (इन्द्र) परमैश्वर्यवन् राजन् (मा) निषेधे (त्वा) त्वाम् (यजमानासः) यजमान+असु क्षेपणे-क्विप्। यजमानानां क्षेप्तारः। यद्वा। सुपां सुपो भवन्ति। वा० पा० ७।१।३९। पञ्चम्यर्थे प्रथमा, असुक् च। यजमानेभ्यः सकाशात् पृथग्भूताः (अन्ये) अपरे। विरोधिनः (नि) नितराम् (रीरमन्) रमु उपरमे-णिचि लुङ्। अडभावो माङ्योगे। उपरमयन्तु। निवर्तयन्तु (तुभ्यम्) त्वदर्थम् (इमे) लभ्यमानाः (सुतासः) संस्कृतास्तत्त्वरसाः ॥
विषय
'मुख्य कर्तव्य' [सोम-रक्षण]
पदार्थ
१. (तीवस्य) = शत्रुओं के लिए तीन रोगकृमिरूप शत्रुओं को तीव्रता से विनष्ट करनेवाले (अभिवयसः) = [अभिगतं वयो येन], जिसके द्वारा उत्कृष्ट जीवनवाला होता है, (अस्य) = [सोमस्य] इस सोम का (पाहि) = तू अपने में रक्षण कर। सोम को तू शरीर में ही सुरक्षित रख। यह तुझे रोगों से मुक्त करेगा और दीर्घजीवन प्राप्त कराएगा। २. (इह) = इस जीवन में सर्वरथाः [सर्व: रथः याभ्याम्]-जिनके द्वारा यह शरीर-रथ पूर्ण बनता है, उन (हरी) = ज्ञानेन्द्रिय व कर्मेन्द्रियरूप अश्वों को (विमुञ्च) = विषय-वासनारूप घास के चरते रहने से पृथक् कर। तेरी इन्द्रियाँ विषयों में ही लित न रह जाएँ-इन्हें तू विषयमुक्त करके शरीर-रथ को आगे ले-चलनेवाला बन। ३. हे (इन्द्र) = जितेन्द्रिय पुरुष! (त्वा) = तुझे (अन्ये यजमानास:) = अन्य विविध कामनाओं से यज्ञों में व्याप्त लोग (मा निरीरमन्) = मत आनन्दित करें, अर्थात् तू भी उनकी तरह सकाम होकर इन यज्ञ-याग आदि में ही न उलझा रह जाए। (तुम्यम्) = तेरे लिए तो (इमे) = ये सोम (सुतास:) = उत्पन्न किये गये हैं। तेरा मुख्य कार्य इनका रक्षण है। इनके रक्षण से ही सब प्रकार की उन्नति होगी।
भावार्थ
हम इन्द्रियों को विषयों से मुक्त करके, सोम-रक्षण को ही अपना मुख्य कर्तव्य समझें।
भाषार्थ
(इन्द्र) हे परमेश्वर! (तीव्रस्य) तीव्रसंवेगी और (अभिवयसः) मानो अपने पूर्णयौवन को प्राप्त (अस्य) इस मेरे भक्तिरस की (पाहि) आप रक्षा कीजिए, और (सर्वरथा) सबके शरीर-रथों में जुते हुए (हरी) विषयों में हरण करनेवाले द्विविध इन्द्रियाश्वों को, (इह) मेरे इस जीवन में, (वि मुञ्च) विषयों में हरण करने से वियुक्त कर दीजिए, छुड़ा दीजिए। हे परमेश्वर! (अन्ये) मुझ से भिन्न, (यजमानासः) उपासना-यज्ञों के यजन करनेवाले उपासक भी, (त्वा=त्वां विहाय) आपका त्याग कर, (मा नि रीरमन्) विषयों में रमण नहीं करते, क्योंकि (इमे) ये भक्तिरस (तुभ्यम्) आपके निमित्त (सुतासः) इन सब यजमानों में प्रकट हो चुके हैं।
विषय
राजा,आत्मा और परमेश्वर।
भावार्थ
हे (इन्द्र) इन्द्र ! ऐश्वर्यशील ! जीवात्मन् ! तू (तीव्रस्य) तीव्र, तीक्ष्ण ज्ञानवान् (अभिवयसः) सब प्रकार योग्य कर्म फलों से युक्त (अस्य) इस आनन्द-रस को (पाहि) पान कर, स्वीकार कर। (सर्वरथा) समस्त रमण योग्य देहों में विद्यमान (हरी) हरी हरणशील अश्वों के समान प्राण और अपान दोनों को (इह) इस ज्ञान की दशा में (वि मुञ्च) त्याग कर। हे (इन्द्र) आत्मन् (त्वा) तुझको (अन्ये यजमानासः) और दूसरे विपरीत मार्ग पर लेजाने वाले संगकारी, आसक्तिजनक विषयगण (मा निरीरमन्) सर्वथा भी प्रलोभन में न फांसलें (इमे) ये (सुतासः) समस्त उत्पन्न पदार्थ आभ्यन्तर आनन्दरस (तुभ्यम्) तेरे ही लिये हैं।
टिप्पणी
इदं सूक्तं राथह्विटनीभ्यां त्रयोविंशत्यृचं पठ्यते। वैतानसूत्रे चतुर्विंशत्यृचं स्वीक्रियते। तत्र पूर्वाः पञ्च पूरणदृष्टाः। ततः पञ्च यक्ष्मनाशन प्राजापत्यदृष्टाः। ततः षट् रक्षोहा ब्राह्मदृष्टाः तत षड् विवृहा काश्यपदृष्टाः ततश्चैका प्रचेतोदृष्टा दुःस्वप्नघ्नी इति ऋग्वेदीयक्रमेण पठ्यमाना त्रयोविंशतिर्ऋचोराथसम्मताः। पाण्डुरंग संहितायां हृदयातते०॥१७॥ एत्येका ऋग् अधिका पठ्यते। मेहनादित्यस्य स्थाने च ‘अस्थि भ्यस्ते०’ इति ऋक् पठयते। ‘ऊरुभ्यां०’ ‘अङ्गैअगे०’ इत्यनयोः। पाठभेदश्च दृश्यते।
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
१-५ पूरणो वैश्वामित्रः। ६-१० यक्ष्मनाशनः प्राजापत्यः। ११-१६ रक्षोहा ब्राह्मः। १७-२३ विवृहा काश्यपः। २४ प्रचेताः॥ १-५ इन्द्रो देवता। ६-१० राजयक्ष्मघ्नम्। ११-१६ गर्भसंस्रावे प्रायश्चितम्। १७-२३ यक्ष्मघ्नम्। २४ दुःस्वप्नघ्नम्॥ १-१० त्रिष्टुभः। ११-२४ अनुष्टुभः। चतुर्विंशत्यृचं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Brhaspati Devata
Meaning
O ruler of the world, Indra, take on, protect and promote this vibrant youthful social order, release all the versatile and abundant resources of development here for this purpose, let no other programme or programmers distract your attention. For you and your purpose all these natural and human resources are ready, trained and matured to the full.
Translation
O mighty ruler, you drink this strong draught of this cerial preparation, unyoke your horses which may carry all the chariots, let not other Yajmanas slay you, as for you here are jucies of Soma kept ready.
Translation
O mighty ruler, you drink this strong draught of this cerial preparation, unyoke your horses which may carry all the chariots, Iet not other Yajmanas slay you, as for you here are juices of Soma kept ready.
Translation
O soul, all these created things are for thee alone. The would-be created things are also for thee. The clear and swift-moving Vedic verses call thy attention. Today, partaking of this sacrifice, and realising the secrets of the universe, drink deep the internal bliss in this world.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
मन्त्र १- ऋग्वेद में है-१०।१६०।१- ॥ १−(तीव्रस्य) तीक्ष्णस्य। क्षिप्रबलकरस्य (अभिवयसः) वयोऽन्नम्-निघ० २।७। अभिगतस्य प्राप्तस्यान्नास्य (अस्य) समीपस्थस्य (पाहि) रक्षां कुरु (सर्वरथा) सर्वरथयोग्यौ (वि मुञ्च) विसृज (हरी) अश्वौ (इह) अत्र (इन्द्र) परमैश्वर्यवन् राजन् (मा) निषेधे (त्वा) त्वाम् (यजमानासः) यजमान+असु क्षेपणे-क्विप्। यजमानानां क्षेप्तारः। यद्वा। सुपां सुपो भवन्ति। वा० पा० ७।१।३९। पञ्चम्यर्थे प्रथमा, असुक् च। यजमानेभ्यः सकाशात् पृथग्भूताः (अन्ये) अपरे। विरोधिनः (नि) नितराम् (रीरमन्) रमु उपरमे-णिचि लुङ्। अडभावो माङ्योगे। उपरमयन्तु। निवर्तयन्तु (तुभ्यम्) त्वदर्थम् (इमे) लभ्यमानाः (सुतासः) संस्कृतास्तत्त्वरसाः ॥
बंगाली (2)
मन्त्र विषय
রাজকর্তব্যোপদেশঃ
भाषार्थ
(ইন্দ্র) হে ইন্দ্র ! [পরম ঐশ্বর্যশালী রাজন্] (অস্য) এই (তীব্রস্য) তীক্ষ্ণ [শীঘ্র বলদায়ক] (অভিবয়সঃ) প্রাপ্ত অন্নের (পাহি) তুমি রক্ষা করো এবং (সর্বরথা) সমস্ত রথের যোগ্য (হরী) নিজের অশ্ব দু’টিকে (ইহ) এখানে (বি মুঞ্চ) মুক্ত করো। (ত্বা) তোমাকে (যজমানাসঃ) যজমান বিতাড়ক [অথবা যজমান থেকে ভিন্ন] (অন্যে) অন্য [বিরোধী] লোক (মা নি রীরমন্) না নিরোধ করে/করবে, (তুভ্যম্) তোমার জন্য (ইমে) এই (সুতাসঃ) সিদ্ধকৃত [তত্ত্ব রস] ॥১॥
भावार्थ
রাজা অন্নাদি বলদায়ক পদার্থসমূহের রক্ষা করে প্রজার কথন শ্রবণ করে/করুক এবং শত্রুদের ফাঁদে পা না দিয়ে শ্রেষ্ঠ পুরুষদের সিদ্ধান্ত মান্য করে/করুক॥১॥ মন্ত্র ১-৫ ঋগ্বেদ - ১০।১৬০।১-৫ ॥
भाषार्थ
(ইন্দ্র) হে পরমেশ্বর! (তীব্রস্য) তীব্রসংবেগী এবং (অভিবয়সঃ) মানো নিজের পূর্ণযৌবন প্রাপ্ত (অস্য) এই আমার ভক্তিরস (পাহি) আপনি রক্ষা করুন, এবং (সর্বরথা) সকলের শরীর-রথে যুক্ত (হরী) বিষয়-সমূহের মধ্যে হরণকারী দ্বিবিধ ইন্দ্রিয়াশ্বকে, (ইহ) আমার এই জীবনে, (বি মুঞ্চ) বিষয়-সমূহের মধ্যে হরণ করায়, বিযুক্ত করে দিন, মুক্ত করুন। হে পরমেশ্বর! (অন্যে) আমার থেকে ভিন্ন, (যজমানাসঃ) উপাসনা-যজ্ঞের যজনকারী উপাসকও, (ত্বা=ত্বাং বিহায়) আপনার ত্যাগ করে, (মা নি রীরমন্) বিষয়-সমূহের মধ্যে রমণ করে না, কারণ (ইমে) এই ভক্তিরস (তুভ্যম্) আপনার নিমিত্ত (সুতাসঃ) এই সব যজমানের মধ্যে প্রকট হয়েছে।
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