अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 96/ मन्त्र 6
ऋषिः - पूरणः
देवता - इन्द्राग्नी, यक्ष्मनाशनम्
छन्दः - त्रिष्टुप्
सूक्तम् - सूक्त-९६
53
मु॒ञ्चामि॑ त्वा ह॒विषा॒ जीव॑नाय॒ कम॑ज्ञातय॒क्ष्मादु॒त रा॑जय॒क्ष्मात्। ग्राहि॑र्ज॒ग्राह॒ यद्ये॒तदे॑नं॒ तस्या॑ इन्द्राग्नी॒ प्र मु॑मुक्तमेनम् ॥
स्वर सहित पद पाठमु॒ञ्चामि॑ । त्वा॒ । ह॒विषा॑ । जीव॑नाय । कम् । अ॒ज्ञा॒त॒य॒क्ष्मात् । उ॒त । रा॒ज॒ऽय॒क्ष्मात् ॥ ग्राहि॑: । ज॒ग्राह॑ । यदि॑ । ए॒तत् । ए॒न॒म् । तस्या॑: । इ॒न्द्र॒ग्नी इति॑ । प्र । मु॒मु॒क्त॒म् । ए॒न॒म् ॥९६.६॥
स्वर रहित मन्त्र
मुञ्चामि त्वा हविषा जीवनाय कमज्ञातयक्ष्मादुत राजयक्ष्मात्। ग्राहिर्जग्राह यद्येतदेनं तस्या इन्द्राग्नी प्र मुमुक्तमेनम् ॥
स्वर रहित पद पाठमुञ्चामि । त्वा । हविषा । जीवनाय । कम् । अज्ञातयक्ष्मात् । उत । राजऽयक्ष्मात् ॥ ग्राहि: । जग्राह । यदि । एतत् । एनम् । तस्या: । इन्द्रग्नी इति । प्र । मुमुक्तम् । एनम् ॥९६.६॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
रोग नाश करने का उपदेश।
पदार्थ
[हे प्राणी !] (त्वा) तुझको (हविषा) भक्ति के साथ (कम्) सुख से (जीवनाय) जीवन के लिये (अज्ञातयक्ष्मात्) अप्रकट रोग से (उत) और (राजयक्ष्मात्) राजरोग से (मुञ्चामि) मैं छुड़ाता हूँ। (यदि) जो (ग्राहिः) जकड़नेवाली पीड़ा [गठिया रोग] ने (एतत्) इस समय (एनम्) इस प्राणी को (जग्राह) पकड़ लिया है, (तस्याः) उस [पीड़ा] से, (इन्द्राग्नी) हे सूर्य और अग्नि (एनम्) इस [प्राणी] को (प्र मुमुक्तम्) तुम छुड़ाओ ॥६॥
भावार्थ
सद्वैद्य गुप्त और प्रकट रोगों से विचारपूर्वक रोगी को अच्छा करता है, ऐसे ही प्रत्येक मनुष्य (इन्द्राग्नी) सूर्य और अग्नि अर्थात् सूर्य से लेकर अग्निपर्यन्त अर्थात् दिव्य और पार्थिव सब पदार्थों से उपकार लेकर, अथवा सूर्य और अग्नि के समान तेजस्वी विद्वानों से मिलकर, अपने दोषों को मिटाकर यशस्वी होवें ॥६॥
टिप्पणी
मन्त्र ६-९ आचुके हैं-अ० ३।११।१-४ ॥ ६-९−व्याख्याताः-अ० ३।११।१-४ ॥
विषय
अग्निहोत्र से रोगमुक्ति
पदार्थ
१. (त्वा) = तुझे हविषा हवि के द्वारा-अग्निकुण्ड में डाली गई आहुतियों के द्वारा-अज्ञात (यक्ष्मात्) = अज्ञात रोगों से (उत) = और (राजयक्ष्मात्) = क्षयरोग से (मुञ्चामि) = मुक्त करता हूँ। जीवनाय जिससे तू उत्कृष्ट जीवन को प्रास कर सके तथा तेरा जीवन (कम्) = सुखमय हो। २. अथवा (यदि) = यदि (एनम्) = इसको एतत् [एतस्मिन् काले सा०] अब (ग्राहि:) = अंगों को पकड़-सा लेनेवाला वातरोग (जग्राह) = जकड़ लेता है, तो (एनम्) = इसको (इन्द्राग्नी) = इन्द्र और अग्नि (तस्या:) = उस ग्राहि नामक रोग से (प्रमुमुक्तम्) = मुक्त करें। अग्निहोत्र में दौस होता हुआ अग्नि हविर्द्रव्यों को सूक्ष्मकणों में विभक्त करके सूर्यलोक तक पहुँचाता है 'अग्नौ प्रास्ताहुतिः सम्यगादित्यमुपतिष्ठते'। सूर्य [इन्द्र] जलों को वाष्पीभूत करके इन सूक्ष्मकों के चारों ओर प्रास कराता है। इसप्रकार वृष्टि के बिन्दु इन इविद्रव्यों को केन्द्रों में लिये हुए होते हैं। उनके वर्षण से उत्पन्न अन्न-कण भी उन्हीं हविर्द्रव्यों के गुणों से युक्त हुए-हुए रोगों के निवारक बनते हैं। इसप्रकार इन्द्र और अग्नि हमें रोगमुक्त करके दीर्घजीवन प्राप्त कराते हैं।
भावार्थ
अग्निहोत्र में डाले गये हविर्द्रव्यों से हम रोगमुक्त हो पाते हैं। सब अज्ञातरोग राजयक्ष्मा व ग्राहि नामक रोग सूर्य व अग्नि के द्वारा दूर किये जाते हैं।
भाषार्थ
हे रोगी! (जीवनाय) तेरे जीने के लिए (त्वा) तुझे (अज्ञातयक्ष्मात्) जिसके लक्षण अभी प्रकट नहीं हुए ऐसे यक्ष्म-रोग से, तथा (राजयक्ष्मात्) प्रकट हुए यक्ष्मरोग से, (हविषा) यक्ष्मा की निवारक हवि द्वारा, (मुञ्चामि) छुड़ाता हूँ। हे सम्बन्धी-जनो! (यदि) अगर (एनम्) इस तुम्हारे सम्बन्धी को (ग्राहिः) जकड़नेवाले यक्ष्मरोग ने (जग्राह) पकड़ लिया है, जकड़ लिया है, तो भी (एतत्) इस हवि द्वारा, (तस्याः) उस रोग से (एनम्) इस रोगी को (इन्द्राग्नी) परमेश्वरीय-कृपा तथा यज्ञाग्नि (प्र मुमुक्तम्) पूर्णतया छुड़ा देते हैं।
टिप्पणी
[यक्ष्मा-रोग-निवारक ओषधियों की हवि अग्नि में देते रहने से यक्ष्मरोग से छुटकारा हो जाता है। परन्तु इस सम्बन्ध में एतत्सम्बन्धी प्रार्थनाएँ भी परमेश्वर से करनी चाहिएँ।]
विषय
राजा,आत्मा और परमेश्वर।
भावार्थ
(६-९) इन ४ मन्त्रों की व्याख्या देखो अथर्व० ३। ११ । १-४॥
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
१-५ पूरणो वैश्वामित्रः। ६-१० यक्ष्मनाशनः प्राजापत्यः। ११-१६ रक्षोहा ब्राह्मः। १७-२३ विवृहा काश्यपः। २४ प्रचेताः॥ १-५ इन्द्रो देवता। ६-१० राजयक्ष्मघ्नम्। ११-१६ गर्भसंस्रावे प्रायश्चितम्। १७-२३ यक्ष्मघ्नम्। २४ दुःस्वप्नघ्नम्॥ १-१० त्रिष्टुभः। ११-२४ अनुष्टुभः। चतुर्विंशत्यृचं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Brhaspati Devata
Meaning
I cure you and release you from the consumptive killer disease even of the highest severity and immunize you against such disease, known or unknown, with the administration of medicine and tonics by homa so that you may live a full and happy life. And if stroke, atrophy or paralysis has seized this patient, then let Indra, penetrative beams of nature’s energy, and Agni, vital heat of life in the body, light of the sun and magnetic force of the earth cure and release the patient.
Translation
O man, I, the physician set you free by this medicinal oblatory preparation from the unknown decline and from consumption for your life. Let the electricity and fire free him from rehenumatic affection if it has grasped this man.
Translation
O man, I, the physician set you free by this medicinal oblatory preparation from the unknown decline and from consumption for your life. Let the electricity and fire free him from rheumatic affection if it has grasped this man.
Translation
See Ath. 3.11. 2
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
मन्त्र ६-९ आचुके हैं-अ० ३।११।१-४ ॥ ६-९−व्याख्याताः-अ० ३।११।१-४ ॥
बंगाली (2)
मन्त्र विषय
৬-১০-রোগনাশনোপদেশঃ
भाषार्थ
[হে প্রাণী !] (ত্বা) তোমাকে (হবিষা) ভক্তি সহকারে (কম্) সুখময় (জীবনায়) জীবনের জন্য (অজ্ঞাতয়ক্ষ্মাৎ) অপ্রকট রোগ থেকে (উত) এবং (রাজয়ক্ষ্মাৎ) রাজ রোগ থেকে (মুঞ্চামি) আমি মুক্ত করি। (যদি) যে (গ্রাহিঃ) বন্ধনকারী পীড়া [গাঁটের রোগ] (এতৎ) এই সময়ে (এনম্) এই প্রাণী কে (জগ্রাহ) ধরেছে, (তস্যাঃ) সেই [পীড়া] থেকে (ইন্দ্রাগ্নী) হে সূর্য এবং অগ্নি ! (এনম্) এই [প্রাণী] কে (প্র মুমুক্তম্) তুমি মুক্ত করো ॥৬॥
भावार्थ
সদ্বৈদ্য/পূর্ণ বিদ্বান গুপ্ত ও প্রকট রোগগুলো থেকে বিচারপূর্বক রোগী কে সুস্থ করে, এভাবেই প্রত্যেক মনুষ্য (ইন্দ্রাগ্নী) সূর্য ও অগ্নি অর্থাৎ সূর্য থেকে শুরু করে অগ্নি পর্যন্ত অর্থাৎ দিব্য এবং পার্থিব সমস্ত পদার্থ থেকে উপকার নিয়ে, অথবা সূর্য ও অগ্নির সমান তেজস্বী বিদ্বানদের সাথে মিলে, নিজেদের দোষ কে মিটিয়ে যশস্বী হোক॥৬॥
भाषार्थ
হে রোগী! (জীবনায়) তোমার জীবনধারণের জন্য (ত্বা) তোমাকে (অজ্ঞাতযক্ষ্মাৎ) যার লক্ষণ এখনও প্রকট হয়নি এমন যক্ষ্মা-রোগ থেকে, তথা (রাজযক্ষ্মাৎ) প্রকটিত যক্ষ্মারোগ থেকে, (হবিষা) যক্ষ্মা নিবারক হবি দ্বারা, (মুঞ্চামি) মুক্ত করি। হে সম্বন্ধীগণ! (যদি) যদি (এনম্) এই তোমাদের সম্বন্ধী/আত্মীয়কে (গ্রাহিঃ) বন্ধনকারী যক্ষ্মারোগ (জগ্রাহ) লিপ্ত করেছে, জড়িয়ে ধরেছে, তবুও (এতৎ) এই হবি দ্বারা, (তস্যাঃ) সেই রোগ থেকে (এনম্) এই রোগীকে (ইন্দ্রাগ্নী) পরমেশ্বরীয়-কৃপা তথা যজ্ঞাগ্নি (প্র মুমুক্তম্) পূর্ণরূপে মুক্ত করে দেয়।
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