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अथर्ववेद के काण्ड - 20 के सूक्त 96 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 96/ मन्त्र 21
    ऋषिः - ब्रह्मा देवता - यक्ष्मनाशनम् छन्दः - उपरिष्टाद्विराड्बृहती सूक्तम् - सूक्त-९६
    46

    ऊ॒रुभ्यां॑ ते अष्ठी॒वद्भ्यां॒ पार्ष्णि॑भ्यां॒ प्रप॑दाभ्याम्। यक्ष्मं॑ भस॒द्यं श्रोणि॑भ्यां॒ भास॑दं॒ भंस॑सो॒ वि वृ॑हामि ते ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    ऊ॒रुऽभ्या॑म् । ते॒ । अ॒ष्ठी॒वत्ऽभ्या॑म् । पार्ष्णि॑ऽभ्याम् । प्रऽप॑दाभ्याम् ॥ यक्ष्म॑म् । भ॒स॒द्य॑म् । श्रोणि॑ऽभ्याम् । भास॑दम् । भंस॑स: । वि । वृ॒हा॒मि॒ । ते॒ ॥९६.२१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    ऊरुभ्यां ते अष्ठीवद्भ्यां पार्ष्णिभ्यां प्रपदाभ्याम्। यक्ष्मं भसद्यं श्रोणिभ्यां भासदं भंससो वि वृहामि ते ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    ऊरुऽभ्याम् । ते । अष्ठीवत्ऽभ्याम् । पार्ष्णिऽभ्याम् । प्रऽपदाभ्याम् ॥ यक्ष्मम् । भसद्यम् । श्रोणिऽभ्याम् । भासदम् । भंसस: । वि । वृहामि । ते ॥९६.२१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 20; सूक्त » 96; मन्त्र » 21
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    शारीरिक विषय में शरीररक्षा का उपदेश।

    पदार्थ

    (ते) तेरी (ऊरुभ्याम्) दोनों जंघाओं से, (अष्ठीवद्भ्याम्) दोनों घुटनों से (पार्ष्णिभ्याम्) दोनों एड़ियों से, (प्रपदाभ्याम्) दोनों पैरों के पंजों से और (ते) तेरे (श्रोणिभ्याम्) दोनों कूल्हों से [वा नितम्बों से] और (भंससः) गुह्य स्थान से (भसद्यम्) कटि [कमर] के और (भासदम्) गुह्य के (यक्ष्मम्) क्षयी रोग को (वि वृहामि) मैं जड़ से उखाड़ता हूँ ॥२१॥

    भावार्थ

    इस मन्त्र में कटि के नीचे के अवयवों का वर्णन है। भावार्थ मन्त्र १७ के समान है ॥२१॥

    टिप्पणी

    १७-२३−व्याख्याताः-अ० २।३३।१-७ ॥

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    विषय

    'उरु' आदि प्रदेशों की नीरोगता

    पदार्थ

    १. हे रोगात ! (ते) = तेरी (ऊरुभ्याम्) = जाँघों से (अष्ठीवद्भ्याम्) = घुटनों से (पाकॊिभ्याम्) = पाँवों के अधरभाग, अर्थात् एड़ियों से और (प्रपदाभ्याम्) = पाँवों के अग्नभाग से (यक्ष्मम्) = रोग को (विवृहामि) = पृथक् करता हूँ। २. (भसद्यम्) = कटिभाग में होनेवाले रोग को दूर करता हूँ। (श्रोणिभ्याम्) = कटि के अधरभाग से रोग को दूर करता हूँ। इसीप्रकार (ते) = तेरे (भासदम्) = गुह्यप्रदेश में होनेवाले रोग को (भंसस:) = [भस दीसौ] भासमान गुह्यस्थान से पृथक् करता हूँ।

    भावार्थ

    जाँघों आदि प्रदेशों में होनेवाले रोगों को नष्ट किया जाए।

    सूचना

    'भंससः' शब्द गुह्यप्रदेश की शुद्धता पर बल दे रहा है। इन प्रदेशों को शुद्ध रखना नितान्त आवश्यक है।

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    भाषार्थ

    (ते) तेरी (ऊरुभ्याम्) जंघाओं से, (अष्ठीवद्भ्याम्) दोनों घुटनों से, (पार्ष्णिभ्याम्) दोनों एडियों से, (प्र पदाभ्याम्) पैर के दोनों पंजों से, (श्रोणिभ्याम्) दोनों कूल्हों से, (भंससः) गुप्त इन्द्रिय से, (भासदम्) गुप्त संस्थान सम्बन्धी रोग को, तथा (भसद्यं यक्ष्मम्) उक्त अधराङ्ग सम्बन्धी (ते) तेरे रोगों को (वि वृहामि) मैं चिकित्सक दूर करता हूँ।

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    विषय

    राजा,आत्मा और परमेश्वर।

    भावार्थ

    (१७-२३) इन ७ मन्त्रों की व्याख्या देखो अथर्व० २। २३। १-७॥

    टिप्पणी

    ‘यक्ष्मं श्रोणिभ्या भासादाद् भससो वि वृहामिते’ इति ऋ०। राथाभिमतश्च।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    १-५ पूरणो वैश्वामित्रः। ६-१० यक्ष्मनाशनः प्राजापत्यः। ११-१६ रक्षोहा ब्राह्मः। १७-२३ विवृहा काश्यपः। २४ प्रचेताः॥ १-५ इन्द्रो देवता। ६-१० राजयक्ष्मघ्नम्। ११-१६ गर्भसंस्रावे प्रायश्चितम्। १७-२३ यक्ष्मघ्नम्। २४ दुःस्वप्नघ्नम्॥ १-१० त्रिष्टुभः। ११-२४ अनुष्टुभः। चतुर्विंशत्यृचं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Brhaspati Devata

    Meaning

    I remove and uproot the consumptive, cancerous disease from your thighs, knees, heels, fore-feet and toes, hips, lower back and genitalia.

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    Translation

    l drive away disease from thighs, from knee-caps, from heals and from the fore part of feet, from hips, from stomach and from groin.

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    Translation

    I drive away disease from thighs, from knee-caps, from heals and from the fore part of feet, from hips, from stomach and from groin.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    १७-२३−व्याख्याताः-अ० २।३३।१-७ ॥

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    बंगाली (2)

    मन्त्र विषय

    মন্ত্রাঃ ১৭-২৩-শারীরিকবিষয়ে শরীররক্ষোপদেশঃ

    भाषार्थ

    (তে) তোমার (উরুভ্যাম্) দুই উরু থেকে, (অষ্ঠীবদ্ভ্যাম্) দুই হাঁটু থেকে, (পার্ষ্ণিভ্যাম্) দুই গোড়ালি থেকে, (প্রপদাভ্যাম্) দুই পায়ের থাবা থেকে এবং (তে) তোমার (শ্রোণিভ্যাম্) দুই শ্রোণী থেকে [বা নিতম্ব থেকে] এবং (ভংসসঃ) গুহ্য স্থান থেকে (ভসদ্যম্) কটি [কোমরের] এবং (ভাসদম্) গুহ্যের (যক্ষ্মম্) ক্ষয়ী রোগকে (বি বৃহামি) আমি সমূলে উৎপাটন করি ॥২১॥

    भावार्थ

    এই মন্ত্রে কটি থেকে নীচের অবয়বের বর্ণনা হয়েছে। ভাবার্থ মন্ত্র ১ এর সমান॥২১॥

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    भाषार्थ

    (তে) তোমার (ঊরুভ্যাম্) ঊরুদ্বয় থেকে, (অষ্ঠীবদ্ভ্যাম্) দুই হাঁটু থেকে, (পার্ষ্ণিভ্যাম্) দুই গোড়ালি থেকে, (প্র পদাভ্যাম্) পায়ের দুই তালু থেকে, (শ্রোণিভ্যাম্) দুই পাছা থেকে, (ভংসসঃ) গুপ্ত ইন্দ্রিয় থেকে, (ভাসদম্) গুপ্ত সংস্থান সম্বন্ধীয় রোগকে, তথা (ভসদ্যং যক্ষ্মম্) উক্ত অধরাঙ্গ সম্বন্ধীয় (তে) তোমার রোগ-সমূহ (বি বৃহামি) আমি চিকিৎসক দূর করি।

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