अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 96/ मन्त्र 18
ग्री॒वाभ्य॑स्त उ॒ष्णिहा॑भ्यः॒ कीक॑साभ्यो अनू॒क्यात्। यक्ष्मं॑ दोष॒ण्यमंसा॑भ्यां बा॒हुभ्यां॒ वि वृ॑हामि ते ॥
स्वर सहित पद पाठग्री॒वाभ्य॑: । ते॒ । उ॒ष्णिहा॑भ्य: । कीक॑साभ्य: । अ॒नू॒क्या॑त् ॥ यक्ष्म॑म् । दो॒ष॒ण्य॑म् । अंसा॑भ्याम् । बा॒हुऽभ्या॑म् । वि । वृ॒हा॒मि॒ । ते॒ ॥९६.१८॥
स्वर रहित मन्त्र
ग्रीवाभ्यस्त उष्णिहाभ्यः कीकसाभ्यो अनूक्यात्। यक्ष्मं दोषण्यमंसाभ्यां बाहुभ्यां वि वृहामि ते ॥
स्वर रहित पद पाठग्रीवाभ्य: । ते । उष्णिहाभ्य: । कीकसाभ्य: । अनूक्यात् ॥ यक्ष्मम् । दोषण्यम् । अंसाभ्याम् । बाहुऽभ्याम् । वि । वृहामि । ते ॥९६.१८॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
शारीरिक विषय में शरीररक्षा का उपदेश।
पदार्थ
(ते) तेरे (ग्रीवाभ्यः) गले की नाड़ियों से, (उष्णिहाभ्यः) गुद्दी की नाड़ियों से, (कीकसाभ्यः) हँसली की हड्डियों से, (अनूक्यात्) रीढ़ से और (ते) तेरे (अंसाभ्याम्) दोनों कंधों से, और (बाहुभ्याम्) दोनों भुजाओं से, (दोषण्यम्) मुड्ढे वा चक्खे से (यक्ष्मम्) क्षयी रोग को (वि वृहामि) मैं उखाड़े देता हूँ ॥१८॥
भावार्थ
इस मन्त्र में ग्रीवा के अवयवों का वर्णन है। भावार्थ मन्त्र १७ के समान है ॥१८॥
टिप्पणी
१७-२३−व्याख्याताः-अ० २।३३।१-७ ॥
विषय
दोषण्य दोष का निराकरण
पदार्थ
१. हे व्याधिगृहीत पुरुष! मैं (ते) = तेरी (ग्रीवाभ्यः) = गले में विद्यमान नाड़ियों से (यक्ष्मम्) = रोग को (विवृहामि) = दूर करता हूँ। (उष्णिहाभ्य:) = ऊपर की ओर जानेवाली धमनियों से (कीक साभ्यः) = अस्थियों से (अनूक्यात्) = अस्थिसंधियों से भी रोग को दूर करता हूँ। २. (दोषण्यम्) = भुजाओं में होनेवाले रोग को दूर करता हूँ और (अंसाभ्याम्) = कन्धों से तथा (बाहुभ्याम्) = भुजाओं के अधोभागरूप हाथों से (ते) = तेरे रोग को दूर करता हूँ।
भावार्थ
ज्ञानी वैद्य भुजाओं के सब रोगों को दूर कर देता है।
भाषार्थ
हे रोगी! (ते) तेरे (ग्रीवाभ्यः) गले के भागों से, (उष्णिहाभ्यः) कण्ठ से स्निग्ध भागों से, (कीकसाभ्यः) हंसली के भागों से, (अनूक्यात्) पृष्ठवंश के मूल अर्थात् उपरि भाग से, (अंसाभ्याम्) दोनों कन्धों से, (बाहूभ्याम्) दोनों बाहुओं से (ते) तेरे (दोषण्यं यक्ष्मम्) भुजा-संस्थान सम्बन्धी रोग को (वि वृहामि) दूर करता हूँ।
टिप्पणी
[ग्रीवाभ्यः=गले की हड्डियों से । उष्णिहाभ्यः=उ+स्निह (स्नेहने), कण्ठ-नाली कफ़ के कारण स्निग्ध रहती है। अनूक्य=अनु (एक-दूसरे के पीछे)+उच् समवाये, परस्पर लगी हुई छोटी-छोटी हड्डियाँ, अर्थात् पृष्ठवंश की।]
विषय
राजा,आत्मा और परमेश्वर।
भावार्थ
(१७-२३) इन ७ मन्त्रों की व्याख्या देखो अथर्व० २। २३। १-७॥
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
१-५ पूरणो वैश्वामित्रः। ६-१० यक्ष्मनाशनः प्राजापत्यः। ११-१६ रक्षोहा ब्राह्मः। १७-२३ विवृहा काश्यपः। २४ प्रचेताः॥ १-५ इन्द्रो देवता। ६-१० राजयक्ष्मघ्नम्। ११-१६ गर्भसंस्रावे प्रायश्चितम्। १७-२३ यक्ष्मघ्नम्। २४ दुःस्वप्नघ्नम्॥ १-१० त्रिष्टुभः। ११-२४ अनुष्टुभः। चतुर्विंशत्यृचं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Brhaspati Devata
Meaning
I remove and uproot the consumptive, cancerous disease related to the arms, from your neck arteries and veins, nape, collar and chest bones, spine, shoulders and arms.
Translation
I drive away disease from your necktendons and neck, from the breast-bones and from the spine, from shoulders and from upper lower arms.
Translation
I drive away disease from your neck tendons and neck, from the breast-bones and from the spine, from shoulders and from upper lower arms.
Translation
See Atha, 2.33. 3.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
१७-२३−व्याख्याताः-अ० २।३३।१-७ ॥
बंगाली (2)
मन्त्र विषय
মন্ত্রাঃ ১৭-২৩-শারীরিকবিষয়ে শরীররক্ষোপদেশঃ
भाषार्थ
(তে) তোমার (গ্রীবাভ্যঃ) গলার নাড়ি থেকে, (উষ্ণিহাভ্যঃ) মাথার পেছনের নাড়ি থেকে, (কীকসাভ্যঃ) কন্ঠনালীর অস্থি থেকে, (অনূক্যাৎ) পাঁজর থেকে ও (তে) তোমার (অংসাভ্যাম্) দুই কাঁধ থেকে এবং (তে) তোমার (বাহুভ্যাম্) দুই বাহু থেকে, (দোষণ্যম্) বক্ষ থেকে (যক্ষ্মম্) ক্ষয়ী রোগ (বি বৃহামি) আমি উৎখাত করে দিই॥১৮॥
भावार्थ
এই মন্ত্রে গ্রীবার অবয়বের বর্ণনা হয়েছে। ভাবার্থ ম০ ১ এর সমান ॥১৮॥
भाषार्थ
হে রোগী! (তে) তোমার (গ্রীবাভ্যঃ) গ্রীবা থেকে, (উষ্ণিহাভ্যঃ) কণ্ঠের স্নিগ্ধ ভাগ থেকে, (কীকসাভ্যঃ) কণ্ঠাস্থি ভাগ থেকে, (অনূক্যাৎ) পৃষ্ঠবংশের মূল অর্থাৎ উপরিভাগ থেকে, (অংসাভ্যাম্) দুই কাঁধ থেকে, (বাহূভ্যাম্) দুই বাহু থেকে (তে) তোমার (দোষণ্যং যক্ষ্মম্) ভুজা-সংস্থান সম্বন্ধীয় রোগ (বি বৃহামি) দূর করি।
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