अथर्ववेद के काण्ड - 5 के सूक्त 30 के मन्त्र

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  • अथर्ववेद - काण्ड 5/ सूक्त 30/ पर्यायः 0/ मन्त्र 1
    ऋषि: - चातनः देवता - आयुः छन्दः - पथ्यापङ्क्तिः सूक्तम् - दीर्घायुष्य सूक्त
    पदार्थ -

    (ते) तेरे (आवतः) समीप स्थान से, (आवतः) समीप से (ते) तेरे (परावतः) दूर देश से और (आवतः) अति समीप से [मैं प्रार्थना करता हूँ]। (इह एव) यहाँ ही (भव) रह, (नु) निश्चय करके (मा मा गाः) कभी भी मत जा, (पूर्वान्) पहिले (पितॄन्) पिता आदि लोगों के (अनु) पीछे (गाः=गच्छ) चल। (ते) तेरे (असुम्) प्राण को (दृढम्) दृढ़ (बध्नामि) मैं बाँधता हूँ ॥१॥

    भावार्थ -

    मनुष्य विचारपूर्वक उत्साही पुरुषों में रहकर माननीय माता पिता गुरु आदि का अनुकरण करके बल और कीर्ति बढ़ावें ॥१॥

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