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अथर्ववेद के काण्ड - 5 के सूक्त 30 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 30/ मन्त्र 1
    ऋषिः - चातनः देवता - आयुः छन्दः - पथ्यापङ्क्तिः सूक्तम् - दीर्घायुष्य सूक्त
    178

    आ॒वत॑स्त आ॒वतः॑ परा॒वत॑स्त आ॒वतः॑। इ॒हैव भ॑व॒ मा नु गा॒ मा पूर्वा॒ननु॑ गाः पि॒तॄनसुं॑ बध्नामि ते दृ॒ढम् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    आ॒ऽवत॑: । ते॒ । आ॒ऽवत॑: । प॒रा॒ऽवत॑: । ते॒ । आ॒ उ॒न्मो॒च॒न॒प्र॒मो॒च॒ने इत्यु॑न्मोचनऽप्रमोच॒ने । उ॒भे इति॑ । वा॒चा । व॒दा॒मि॒ । ते॒ वत॑: । इ॒ह । ए॒व । भ॒व॒ । मा । नु । गा॒: । मा । पूर्वा॑न् । अनु॑ । गा॒: । पि॒तृन् । असु॑म् । ब॒ध्ना॒मि॒ । ते॒ । दृ॒ढम् ॥३०.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    आवतस्त आवतः परावतस्त आवतः। इहैव भव मा नु गा मा पूर्वाननु गाः पितॄनसुं बध्नामि ते दृढम् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    आऽवत: । ते । आऽवत: । पराऽवत: । ते । आ उन्मोचनप्रमोचने इत्युन्मोचनऽप्रमोचने । उभे इति । वाचा । वदामि । ते वत: । इह । एव । भव । मा । नु । गा: । मा । पूर्वान् । अनु । गा: । पितृन् । असुम् । बध्नामि । ते । दृढम् ॥३०.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 5; सूक्त » 30; मन्त्र » 1
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    आत्मा के उन्नति का उपदेश।

    पदार्थ

    (ते) तेरे (आवतः) समीप स्थान से, (आवतः) समीप से (ते) तेरे (परावतः) दूर देश से और (आवतः) अति समीप से [मैं प्रार्थना करता हूँ]। (इह एव) यहाँ ही (भव) रह, (नु) निश्चय करके (मा मा गाः) कभी भी मत जा, (पूर्वान्) पहिले (पितॄन्) पिता आदि लोगों के (अनु) पीछे (गाः=गच्छ) चल। (ते) तेरे (असुम्) प्राण को (दृढम्) दृढ़ (बध्नामि) मैं बाँधता हूँ ॥१॥

    भावार्थ

    मनुष्य विचारपूर्वक उत्साही पुरुषों में रहकर माननीय माता पिता गुरु आदि का अनुकरण करके बल और कीर्ति बढ़ावें ॥१॥

    टिप्पणी

    १−(आवतः) उपसर्गाच्छन्दसि धात्वर्थे। पा० ५।१।११८। इति उपसर्गाद् धात्वर्थे वर्त्तमानात् स्वार्थे वतिः। आगतात् समीपात् स्थानात् (ते) तव (आवतः) समीपात् (परावतः) परा-वति। दूरगतात् स्थानात् (ते) (आवतः) अतिसमीपात् (इह) उत्साहिनां मध्ये (एव) अवधारणे (भव) तिष्ठ। कीर्तिं प्राप्नुहि (नु) निश्चये (मा मा गाः) अ० ५।१९।९। कदापि मा गच्छ (पूर्वान्) पूर्वजान् (अनु) अनुसृत्य (गाः) लोडर्थे लुङ्। गच्छ (पितॄन्) पितृवत् सत्करणीयान् (असुम्) प्राणम् (बध्नामि) स्थापयामि (ते) तव (दृढम्) दृह वृद्धौ−क्त। प्रगाढम् ॥

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    विषय

    असुं बध्नामि ते दृढम्

    पदार्थ

    १. (ते आवतः आवत:) = हे पुरुष! तेरे समीप-से-समीप, (ते परावतः आवत:) = तुझसे दूर से-दूर देश से भी (ते असं दृढं बध्नामि) = तेरे प्राण को बलपूर्वक बाँधता हूँ। (इह एव भव) = तु यहाँ ही हो, (पूर्वान् मा नु गा:) = अपने मृत पुरुषों के पीछे मत हो जा। (पितृ मा अनु गा:) = तुझे जन्म देनेवाले अपने पितरों के पीछे मत चला जा।

    भावार्थ

    मैं तुझमें प्राणशक्ति का धारण करता हूँ। तू अपने पूर्वजों के पीछे शीघ्र जानेवाला मत हो। तू पूर्ण जीवन को प्राप्त कर।

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    भाषार्थ

    [हे रुग्ण ब्रह्मचारिन् ! ] (आवतः) समीप के गुरुजन तो (आवतः) तेरे समीप विद्यमान् हैं ही, (परावतः) दूर के भी ( ते ) तेरे लिए ( आवतः) समीप के ही हैं। (इह एव) इस आश्रम में ही ( भव ) तू रह, ( मानु गा:) निश्चय से तू न जा, अर्थात् (पूर्वा पितृन् ) पूर्व के पितरों का अनुगामी१ न हो, (ते ) तेरे (असुम्) प्राण को [ तेरे साथ] (दृढम्, बध्नामि) मैं दृढ़बद्ध करता हूँ। मैं अर्थात् आचार्य।

    टिप्पणी

    [१. पूर्वान् पितृन् = पितर दो प्रकार के हैं, वर्तमान पितर अर्थात् ब्रह्मचर्याश्रम के गुरुजन और उन की पत्नियां, तथा पूर्व के पितर अर्थात् जन्मदाता माता-पति आदि। रोगो-पचार के लिए रुग्ण ब्रह्मचारी पूर्व के पितरों के पास जाना चाहता है, परन्तु वर्तमान पितर अर्थात् गुरुजन उसे रोगोन्मुक्त हो जाने का विश्वास दिलाते हैं। अथवा 'मा अनु गाः'= मृत पूर्व पितरों का तू अनुगामी न बन, तू न मर।]

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    विषय

    आरोग्य और सुख की प्राप्ति का उपदेश।

    भावार्थ

    हे पुरुष ! (ते आवतः आवतः) तेरे समीप से समीप और (ते परावतः) तेरे दूर से भी (आवतः) दूर देश से (ते असुं) तेरे प्राण को और आत्मा को (दृढं) खूब बलपूर्वक (बध्नामि) बांधता हूं। तू (इह एव) यहां ही (भव) रह। (मा पूर्वान् अनुगाः) अपने पूर्व के विनष्ट हुए पुरुषों के पीछे मत जा। (मा अनु गाः पितॄन) अपने उत्पादक, पालक मां बाप चाचा, फूफा आदि के पीछे भी मत जा, प्रत्युत मुझ आचार्य के पास ब्रह्मचर्य और विद्या का लाभ कर।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    आयुष्काम उन्मोचन ऋषिः। आयुर्देवता। १ पथ्यापंक्तिः। १-८, १०, ११, १३, १५, १६ अनुष्टुभः। ९ भुरिक्। १२ चतुष्पदा विराड् जगती। १४ विराट् प्रस्तारपंक्तिः। १७ त्र्यवसाना षट्पदा जगती। सप्तदशर्चं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    God Health and Full Age

    Meaning

    O man, I strengthen and fully fortify your life energy against any danger which may be closer than the closest or farther than the farthest. Stay here, alive and strong. Do not follow the forefathers dead and gone. Do not follow the parents either, for they too would go earlier. Follow them alive and keep up their tradition.

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    Subject

    Ayuh - span of life

    Translation

    From proximity to your proximity, from far distance to your proximity, I bind your life fast. Stay just here, Do not depart. Do not go after your earlier ancestors.

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    Translation

    O man! from your vicinity, from your near, from far off and from far near I pray you live here, depart not and die not, follow the path of your forefathers, I bind fast your vital spirit in your body.

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    Translation

    From thy vicinity, I call, from near at hand, from far, from nigh athand, stay here with me, depart not; follow not the fathers of the olden time. I bind thy soul fast.

    Footnote

    Thy: A Brahmchari ‘I, me’ refer to the Acharya, preceptor. A pupil is instructed notto die early and go in the wake of his dead ancestors but to live with his teacher and carry on his study.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    १−(आवतः) उपसर्गाच्छन्दसि धात्वर्थे। पा० ५।१।११८। इति उपसर्गाद् धात्वर्थे वर्त्तमानात् स्वार्थे वतिः। आगतात् समीपात् स्थानात् (ते) तव (आवतः) समीपात् (परावतः) परा-वति। दूरगतात् स्थानात् (ते) (आवतः) अतिसमीपात् (इह) उत्साहिनां मध्ये (एव) अवधारणे (भव) तिष्ठ। कीर्तिं प्राप्नुहि (नु) निश्चये (मा मा गाः) अ० ५।१९।९। कदापि मा गच्छ (पूर्वान्) पूर्वजान् (अनु) अनुसृत्य (गाः) लोडर्थे लुङ्। गच्छ (पितॄन्) पितृवत् सत्करणीयान् (असुम्) प्राणम् (बध्नामि) स्थापयामि (ते) तव (दृढम्) दृह वृद्धौ−क्त। प्रगाढम् ॥

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