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अथर्ववेद > काण्ड 15 > सूक्त 5

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  • अथर्ववेद - काण्ड 15/ सूक्त 5/ मन्त्र 10
    सूक्त - रुद्र देवता - भुरिग्विषमा गायत्री छन्दः - अथर्वा सूक्तम् - अध्यात्म प्रकरण सूक्त

    तस्मै॑ध्रु॒वाया॑ दि॒शो अ॑न्तर्दे॒शाद्रु॒द्रमि॑ष्वा॒सम॑नुष्ठा॒तार॑मकुर्वन् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    तस्मै॑ । ध्रु॒वाया॑: । दि॒श: । अ॒न्त॒:ऽदे॒शात् । रु॒द्रम् । इ॒षु॒ऽआ॒सम् । अ॒नु॒ऽस्था॒तार॑म् । अ॒कु॒र्व॒न् ॥५.१०॥


    स्वर रहित मन्त्र

    तस्मैध्रुवाया दिशो अन्तर्देशाद्रुद्रमिष्वासमनुष्ठातारमकुर्वन् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    तस्मै । ध्रुवाया: । दिश: । अन्त:ऽदेशात् । रुद्रम् । इषुऽआसम् । अनुऽस्थातारम् । अकुर्वन् ॥५.१०॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 15; सूक्त » 5; मन्त्र » 10

    भाषार्थ -
    (तस्मै) उस व्रात्य संन्यासी के लिए [वैदिक विधियों ने] (ध्रुवायाः दिशः) ध्रुवादिशा सम्बन्धी (अन्तर्देशात्) अवान्तर अर्थात् मध्यवर्ती प्रदेश से (इष्वासम्) मानो इषुप्रहारी या धनुर्धारी (रुद्रम्) रौद्ररूपवाले परमेश्वर को (अनुष्ठातारम्) व्रात्य के साथ निरन्तर स्थित रहने वाला (अकुर्वन) निर्दिष्ट किया है।

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