Loading...
अथर्ववेद > काण्ड 15 > सूक्त 5

काण्ड के आधार पर मन्त्र चुनें

  • अथर्ववेद का मुख्य पृष्ठ
  • अथर्ववेद - काण्ड 15/ सूक्त 5/ मन्त्र 6
    सूक्त - रुद्र देवता - त्रिपदा ककुप् उष्णिक् छन्दः - अथर्वा सूक्तम् - अध्यात्म प्रकरण सूक्त

    तस्मै॑प्र॒तीच्या॑ दि॒शो अ॑न्तर्दे॒शात्प॑शु॒पति॑मिष्वा॒सम॑नुष्ठा॒तार॑मकुर्वन् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    तस्मै॑ । प्र॒तीच्या॑: । दि॒श:। अ॒न्त॒:ऽदे॒शात् । प॒शु॒ऽपति॑म् । इ॒षु॒ऽआ॒सम् । अ॒नु॒ऽस्था॒तार॑म् । अ॒कु॒र्व॒न् ॥५.६॥


    स्वर रहित मन्त्र

    तस्मैप्रतीच्या दिशो अन्तर्देशात्पशुपतिमिष्वासमनुष्ठातारमकुर्वन् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    तस्मै । प्रतीच्या: । दिश:। अन्त:ऽदेशात् । पशुऽपतिम् । इषुऽआसम् । अनुऽस्थातारम् । अकुर्वन् ॥५.६॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 15; सूक्त » 5; मन्त्र » 6

    भाषार्थ -
    (तस्मै) उस व्रात्य संन्यासी के लिये [वैदिक विधियों ने] (उदीच्याः दिशः) पश्चिम दिशा सम्बन्धी (अन्तर्देशात्) अवान्तर अर्थात् पश्चिम-और-उत्तर के मध्यवर्ती वायव्य प्रदेश से (पशुपतिम्) पशुओं के पति अर्थात् रक्षक को (इष्वासम् मानो इषुप्रहारी या धनुर्धारीरूप में (अनुष्ठातारम्) व्रात्य के साथ निरन्तर स्थित रहने वाला (अकुर्वन्) निर्दिष्ट किया है।

    इस भाष्य को एडिट करें
    Top