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अथर्ववेद > काण्ड 15 > सूक्त 5

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  • अथर्ववेद - काण्ड 15/ सूक्त 5/ मन्त्र 7
    सूक्त - रुद्र देवता - द्विपदा प्राजापत्या अनुष्टुप्,त्रिपदा ब्राह्मी गायत्री छन्दः - अथर्वा सूक्तम् - अध्यात्म प्रकरण सूक्त

    प॑शु॒पति॑रेनमिष्वा॒सः प्र॒तीच्या॑ दि॒शो अ॑न्तर्दे॒शाद॑नुष्ठा॒तानु॑ तिष्ठति॒नैनं॑ श॒र्वो न भ॒वो नेशा॑नः। नास्य॑ प॒शून्न स॑मा॒नान्हि॑नस्ति॒ य ए॒वं वेद॑॥

    स्वर सहित पद पाठ

    प॒शु॒ऽपति॑: । ए॒न॒म् । इ॒षु॒ऽआ॒स: । प्र॒तीच्या॑: । दि॒श: । अ॒न्त॒:ऽदे॒शात् । अ॒नु॒ऽस्था॒ता । अनु॑ । ति॒ष्ठ॒ति॒ । न । ए॒न॒म् । श॒र्व: । न । भ॒व: । न । ईशा॑न: । न । अ॒स्य॒ । प॒शून् । न । स॒मा॒नम् । हि॒न॒स्ति॒ । य: । ए॒वम् । वेद॑ ॥५.७॥


    स्वर रहित मन्त्र

    पशुपतिरेनमिष्वासः प्रतीच्या दिशो अन्तर्देशादनुष्ठातानु तिष्ठतिनैनं शर्वो न भवो नेशानः। नास्य पशून्न समानान्हिनस्ति य एवं वेद॥

    स्वर रहित पद पाठ

    पशुऽपति: । एनम् । इषुऽआस: । प्रतीच्या: । दिश: । अन्त:ऽदेशात् । अनुऽस्थाता । अनु । तिष्ठति । न । एनम् । शर्व: । न । भव: । न । ईशान: । न । अस्य । पशून् । न । समानम् । हिनस्ति । य: । एवम् । वेद ॥५.७॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 15; सूक्त » 5; मन्त्र » 7

    भाषार्थ -
    (अनुष्ठाता) निरन्तर साथ रहने वाला (पशुपतिः) पशुओं का पति अर्थात् रक्षक परमेश्वर; (इष्वासः) मानो इषुप्रहारी या धनुर्धारी होकर, (प्रतीच्याः दिशः) पश्चिम दिशा सम्बन्धी (अन्तर्देशात्) अवान्तर अर्थात् पश्चिम-और उत्तर के मध्यवर्ती वायव्य प्रदेश से (एनम्) इस व्रात्य के साथ (अनुतिष्ठति) निरन्तर स्थित रहता है। (एनम्) इसे (न शर्वः) न दुःखनाशक परमेश्वर, (न भवः) न सुखोत्पादक परमेश्वर, (न ईशानः) न सर्वाधीश्वर परमेश्वर (हिनस्ति, मन्त्र ३) हिंसित करता या हिंसित होने देता है। (न) और न (अस्य) इस के (पशून्) पशुओं की, (न समानान्) न समान आदि प्राण वायुओं की (हिनस्ति) हिंसा होने देता है। (यः) जो व्रात्य कि (एवम्) इस प्रकार के तथ्य को (वेद) जानता तथा जीवनचर्या करता है ।।७।। (व्याख्या मन्त्र १-३)। [मन्त्र में पशुपति पद द्वारा ईशान का वर्णन हुआ है]

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