अथर्ववेद - काण्ड 5/ सूक्त 26/ मन्त्र 2
सूक्त - ब्रह्मा
देवता - सविता
छन्दः - द्विपदा प्राजापत्या बृहती
सूक्तम् - नवशाला सूक्त
यु॒नक्तु॑ दे॒वः स॑वि॒ता प्र॑जा॒नन्न॒स्मिन्य॒ज्ञे म॑हि॒षः स्वाहा॑ ॥
स्वर सहित पद पाठयु॒नक्तु॑ । दे॒व: । स॒वि॒ता । प्र॒ऽजा॒नन् । अ॒स्मिन् । य॒ज्ञे । म॒हि॒ष: । स्वाहा॑ ॥२६.२॥
स्वर रहित मन्त्र
युनक्तु देवः सविता प्रजानन्नस्मिन्यज्ञे महिषः स्वाहा ॥
स्वर रहित पद पाठयुनक्तु । देव: । सविता । प्रऽजानन् । अस्मिन् । यज्ञे । महिष: । स्वाहा ॥२६.२॥
अथर्ववेद - काण्ड » 5; सूक्त » 26; मन्त्र » 2
भाषार्थ -
(प्रजानन्) प्रज्ञावाला, (महिषः) महान् ( सविता देव: ) सविता देव, (अस्मिन् यज्ञे) इस यज्ञ में (युनक्तु) तुम्हें नियुक्त करे, (स्वाहा) तथा स्वाहा वाणी का उच्चारण हो।
टिप्पणी -
[सविता=प्रेरक-देव परमेश्वर यज्ञकर्म के लिए तुम्हें प्रेरित करे। षू प्रेरणे (तुदादिः)। सविता को 'प्रजानन्' कहा है, अतः यह देव प्रज्ञानी है, चेतन है, प्रातःकालीन सूर्य नहीं। मन्त्र में कथित यज्ञाङ्ग हैं, (१) सविता देव द्वारा प्रेरणा; (२) तथा 'स्वाहा' शब्द का उच्चारण कर हविर्यज्ञों में दी जानेवाली आहुतियाँ।]