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ऋग्वेद मण्डल - 1 के सूक्त 61 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 1/ सूक्त 61/ मन्त्र 12
    ऋषिः - नोधा गौतमः देवता - इन्द्र: छन्दः - पङ्क्तिः स्वरः - पञ्चमः

    अ॒स्मा इदु॒ प्र भ॑रा॒ तूतु॑जानो वृ॒त्राय॒ वज्र॒मीशा॑नः किये॒धाः। गोर्न पर्व॒ वि र॑दा तिर॒श्चेष्य॒न्नर्णां॑स्य॒पां च॒रध्यै॑ ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अ॒स्मै । इत् । ऊँ॒ इति॑ । प्र । भ॒र॒ । तूतु॑जानः । वृ॒त्राय॑ । वज्र॑म् । ईशा॑नः । कि॒ये॒धाः । गोः । न । पर्व॑ । वि । र॒द॒ । तिर॑श्चा । इष्य॑न् । अर्णां॑सि । अ॒पाम् । च॒रध्यै॑ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    अस्मा इदु प्र भरा तूतुजानो वृत्राय वज्रमीशानः कियेधाः। गोर्न पर्व वि रदा तिरश्चेष्यन्नर्णांस्यपां चरध्यै ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    अस्मै। इत्। ऊँ इति। प्र। भर। तूतुजानः। वृत्राय। वज्रम्। ईशानः। कियेधाः। गोः। न। पर्व। वि। रद। तिरश्चा। इष्यन्। अर्णांसि। अपाम्। चरध्यै ॥

    ऋग्वेद - मण्डल » 1; सूक्त » 61; मन्त्र » 12
    अष्टक » 1; अध्याय » 4; वर्ग » 29; मन्त्र » 2
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    पुनः स कीदृश इत्युपदिश्यते ॥

    अन्वयः

    हे सभाद्यध्यक्ष ! कियेधा ईशानस्तूतुजानस्त्वं सूर्योऽपामर्णांसि चरध्यै निपातयन् वृत्रायेवास्मै शत्रवे वृत्राय वज्रं प्रभर तिरश्चा वज्रेण गोर्न वाचो विभागमिव तस्य पर्वाङ्गमङ्गं छेत्तुमिष्यन्निदु विरद विविधतया हिन्धि ॥ १२ ॥

    पदार्थः

    (अस्मै) वक्ष्यमाणाय (इत्) अपि (उ) उक्तार्थे (प्र) प्रकृष्टतया (भर) धर (तूतुजानः) त्वरमाणः (वृत्राय) मेघायेव शत्रवे (वज्रम्) शस्त्रसमूहम् (ईशानः) ऐश्वर्यवानैश्वर्यहेतुर्वा (कियेधाः) कियतो गुणान् धरतीति (गोः) वाचः (न) इव (पर्व) अङ्गमङ्गम् (वि) विशेषार्थे (रद) संसेध (तिरश्चा) तिर्यग्गत्या (इष्यन्) जानन् (अर्णांसि) जलानि (अपाम्) जलानाम् (चरध्यै) चरितुं भक्षितुं गन्तुम् ॥ १२ ॥

    भावार्थः

    अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। हे सेनेश ! त्वं यथा प्राणवायुना ताल्वादिषु ताडनं कृत्वा भिन्नान्यक्षराणि पदानि विभज्यन्ते, तथैव शत्रोर्बलं छिन्नं भिन्नं कृत्वाङ्गानि विभक्तानि कृत्वैवं विजयस्व ॥ १२ ॥

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    हिन्दी (4)

    विषय

    फिर वह कैसा है, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ॥

    पदार्थ

    हे सभाध्यक्ष (कियेधाः) कितने गुणों को धारण करनेवाला (ईशानः) ऐश्वर्ययुक्त (तूतुजानः) शीघ्र करनेहारे आप जैसे सूर्य्य (अपाम्) जलों के सम्बन्ध से (अर्णांसि) जलों के प्रवाहों को (चरध्यै) बहाने के अर्थ (वृत्राय) मेघ के वास्ते वर्त्तता है, वैसे (अस्मै) इस शत्रु के वास्ते शस्त्र को (प्र) अच्छे प्रकार (भर) धारण कर (तिरश्चा) टेढ़ी गतिवाले वज्र से (गोर्न) वाणियों के विभाग के समान (पर्व) उस के अङ्ग-अङ्ग को काटने को (इष्यन्) इच्छा करता हुआ (इदु) ऐसे ही (विरद) अनेक प्रकार हनन कीजिये ॥ १२ ॥

    भावार्थ

    इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे सेनापते ! आप जैसे प्राणवायु से तालु आदि स्थानों में जीभ का ताड़न कर भिन्न-भिन्न अक्षर वा पदों के विभाग प्रसिद्ध होते हैं, वैसे ही सभाध्यक्ष शत्रु के बल को छिन्न-भिन्न और अङ्गों को विभागयुक्त करके इसी प्रकार शत्रुओं को जीता करे ॥ १२ ॥

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    विषय

    गो - पर्व - विदारण

    पदार्थ

    १. हे परमात्मन् ! (तूतुजानः) = शीघ्रता से कार्यों को करते हुए अथवा शत्रुओं का संहार करते हुए (ईशानः) = सबका शासन करनेवाले (कियेधाः) = कियत् प्रमाण अनिर्वचनीय बल को धारण करनेवाले अथवा क्रममाण शत्रुओं को रोकनेवाले आप (अस्मै वृत्राय) = इस ज्ञान के आवरणभूत वासनारूप शत्रु के लिए (इत् उ) = निश्चय से (वज्रम्) = वज्र को प्रभर प्रहत कीजिए । वृत्र को वज्रप्रहार से नष्ट करके इस भक्त के जीवन को प्रकाशमय बनाइए । २. (गोः न पर्व) = गो - पृथिवी के पर्वों की भाँति वेदवाणी के पर्वों को (विरदा) = विश्लिष्ट करनेवाले होओ । एक - एक शब्द को विच्छिन्न करके - उसका निर्वचन करके (तिरश्चा) = [तिरः अञ्चति] छिपकर अन्दर गति करनेवाले (अर्णांसि) = ज्ञानजलों को (इष्यन्) = प्राप्त कराते हुए आप (अपां चरध्ये) = सरस्वती नदी के ज्ञानजलों के चरण के लिए हों । वासना के कारण सरस्वती नदी का जो प्रवाह सूख गया था, वह वासनात्मक वृत्र के विनाश के द्वारा फिर से प्रवाहित होने लगे । आप हमें ऐसी शक्ति प्राप्त कराइए कि हम एक - एक शब्द के अन्दर निहित भाव को उसके विश्लेषण से देखनेवाले बनें । शब्दों की व्युत्पत्ति को समझें और ज्ञान में व्युत्पन्न हो सकें ।

    भावार्थ

    भावार्थ - प्रभुकृपा से हमारी वासना नष्ट हो और हम शब्दों के विश्लेषण के साथ अपने ज्ञान को उज्ज्वल कर सकें ।

    विशेष / सूचना

    नोट - यहाँ 'गोर्न पर्व विरदा' - इस वाक्य से गौओं के पर्वों के विदारण का शब्दशः अर्थ लेकर पाश्चात्यों को आर्यों के गोमांस - भक्षण का सन्देह हो गया । वस्तुतः यहाँ वाणी के विश्लेषण से ज्ञानवृद्धि का संकेत है ।

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    विषय

    वायु मेघ और सूर्य के दृष्टान्त से शत्रु विजय का उपदेश ।

    भावार्थ

    ( तूतुजानः वृत्राय वज्रम् ) अति वेग से बहनेवाला वायु जिस प्रकार मेघ को वेगवान् आघात या विद्युत् का प्रहार करता है। और वह ( ईशानः कियेधाः ) मेघ पर शक्तिशाली होकर वेग से बहता हुआ उसे धारण किये रहता है उसी प्रकार सभा और सेना का अध्यक्ष भी ( तूतुजानः ) अति शीघ्रकारी, बिना विलम्ब के कार्य करने में चतुर, शत्रु पर प्रहार करता हुआ, ( ईशानः ) शक्तिशाली, ऐश्वर्यवान् ( कियेधाः ) कितने ही ऐश्वर्यों और बलों का धारण करनेवाला, अथवा पराक्रम करते हुए समस्त राष्ट्र को धारण करने में समर्थ होकर ( अस्मै ) इस प्रत्यक्ष में आगे खड़े, (वृत्राय इत् उ) शक्ति और बल में बढ़ते हुए शत्रु के विनाश के लिए तू ( वज्रम् ) शस्त्रास्त्रयुक्त सेनाबल का ( प्र भर) प्रयोग कर । सूर्य जिस प्रकार ( अपां ) सूक्ष्म जलों के संयोग से ( अर्णांसि चरध्यै ) जल प्रवाहों को बहा देने के लिए अपने (तिरश्चा) तिरछे प्रकाश और वेग से मेघ के अंग २ को छिन्न भिन्न कर देता है। और (तिरश्चा) तिरछी चाल से ( गोः पर्व न ) चर्मकार तिरछे शस्त्र से जिस प्रकार मृत पशु का जोड़ जोड़ काटता है और वक्ता (तिरश्चा) जिह्वा आदि के तिरछे आघात से (गोः पर्व न) वाणी के प्रत्येक अंग २, अर्थात् प्रत्येक वर्णों या पर्वों को ज्ञानपूर्वक विभक्त करता है उसी प्रकार (अपां अर्णासि चरध्यै ) शत्रु प्राप्त सेनाओं के प्रवाहों को भगा देने के लिए शत्रु बल के (पर्व) पोरु २ अंग प्रत्यंग को ( इष्यन् ) जानता हुआ ( वि रद ) विविध प्रकार से काट ।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    नोधा गौतम ऋषिः ॥ इन्द्रो देवता ॥ छन्दः–१, १४, १६ विराट् त्रिष्टुप् । २, ७, ९ निचृत् विष्टुप् । ३, ४, ६, ८, १०, १२ पंक्तिः । ५, १५ विराट पंक्तिः । ११ भुरिक् पंक्ति: । १३ निचृतपंक्तिः । षोडशर्चं सूक्तम् ॥

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    विषय

    फिर वह कैसा है, यह विषय इस मन्त्र में कहा है ॥

    सन्धिविच्छेदसहितोऽन्वयः

    हे सभाद्यध्यक्ष ! कियेधा ईशानः तूतुजानः त्वं सूर्यः अपाम् अर्णांसि चरध्यै निपातयन् वृत्राय इव अस्मै वक्ष्यमाणाय शत्रवे वृत्राय वज्रं प्र भर तिरश्चा वज्रेण गोः न वाचः विभागम् इव तस्य पर्व अङ्गमङ्गं छेत्तुम् इष्यन् इत् अपि उ उक्तार्थे विरद विविधतया हिन्धि ॥१२॥

    पदार्थ

    हे (सभाद्यध्यक्ष)=सभा आदि के अध्यक्ष ! (कियेधाः) कियतो गुणान् धरतीति=कई प्रकार के गुण धारण करनेवाला, (ईशानः) ऐश्वर्यवानैश्वर्यहेतुर्वा=ऐश्वर्यवान्, (तूतुजानः) त्वरमाणः=शीघ्रता से करनेवाले, (त्वम्)=तुम, (सूर्यः)= सूर्य, (अपाम्) जलानाम्=जलों के, (अर्णांसि) जलानि=जल, (चरध्यै) चरितुं भक्षितुं गन्तुम्=खाने के लिये जाने में, (निपातयन्)=गिराते हुए, (वृत्राय)=बादल के लिये, (इव)=समान, (अस्मै) वक्ष्यमाणाय=कहे हुए, (शत्रवे)=शत्रु के लिये, (वज्रम्) शस्त्रसमूहम्= शस्त्र के समूह को, (प्र) प्रकृष्टतया=प्रकृष्ट रूप से, (भर) धर=धारण करो, (तिरश्चा) तिर्यग्गत्या=तिरछी गतिवाले, (वज्रेण)=वज्र के द्वारा, (गोः) वाचः=वाणी के, (न) इव=समान, (वाचः)= वाणी के, (वि) विशेषार्थे=विशेष, (भागम्)= भाग के, (इव)=समान, (तस्य) =उसके, (पर्व) अङ्गमङ्गम्= अङ्ग-अङ्ग का, (छेत्तुम्)=छेदन करने की , (इष्यन्) जानन्=जानते हुए, (इत्) अपि=भी, (उ) उक्तार्थे= उक्त अर्थ में, (वि) विशेषार्थे=विशेष रूप से, (रद) संसेध=विभाजित कर दे, (विविधतया)= विविध रूप से, (हिन्धि)=मार दीजिये ॥१२॥

    महर्षिकृत भावार्थ का भाषानुवाद

    इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे सेना के स्वामी ! आप जैसे प्राणवायु से तालु आदि स्थानों में ताड़न करके भिन्न-भिन्न अक्षर और पदों का विभाजन करते हैं, वैसे ही शत्रु के बल को छिन्न-भिन्न करके, अङ्गों को विभाजित करते हुए ही विजित होवें ॥१२॥

    पदार्थान्वयः(म.द.स.)

    हे (सभाद्यध्यक्ष) सभा आदि के अध्यक्ष ! (कियेधाः) कई प्रकार के गुण धारण करनेवाले, (ईशानः) ऐश्वर्यवान्, (तूतुजानः) शीघ्रता से कार्य करनेवाले (त्वम्) तुम (सूर्यः) सूर्य, (अपाम्) जलों को (चरध्यै) उपभोग करने के लिये जाने में, (निपातयन्) गिराते हुए (वृत्राय) बादल के (इव) समान, (अस्मै) कहे हुए (शत्रवे) शत्रु के लिये, (वज्रम्) शस्त्र के समूह को (प्र) प्रकृष्ट रूप से (भर) धारण करो। (तिरश्चा) तिरछी गतिवाले (वज्रेण) वज्र के द्वारा, (गोः) वाणी के (वि) विशेष (भागम्) भाग के (इव) समान, (तस्य) उसके (पर्व) अङ्ग-अङ्ग को (छेत्तुम्) छेदन करने के लिये, (इष्यन्) जानते हुए (इत्) भी, (वि) विशेष रूप से (रद) विभाजित कर दे और (विविधतया) विविध रूप से (हिन्धि) मार दीजिये ॥१२॥

    संस्कृत भाग

    पदार्थः(महर्षिकृतः)- (अस्मै) वक्ष्यमाणाय (इत्) अपि (उ) उक्तार्थे (प्र) प्रकृष्टतया (भर) धर (तूतुजानः) त्वरमाणः (वृत्राय) मेघायेव शत्रवे (वज्रम्) शस्त्रसमूहम् (ईशानः) ऐश्वर्यवानैश्वर्यहेतुर्वा (कियेधाः) कियतो गुणान् धरतीति (गोः) वाचः (न) इव (पर्व) अङ्गमङ्गम् (वि) विशेषार्थे (रद) संसेध (तिरश्चा) तिर्यग्गत्या (इष्यन्) जानन् (अर्णांसि) जलानि (अपाम्) जलानाम् (चरध्यै) चरितुं भक्षितुं गन्तुम् ॥१२॥ विषयः- पुनः स कीदृश इत्युपदिश्यते ॥ अन्वयः- हे सभाद्यध्यक्ष ! कियेधा ईशानस्तूतुजानस्त्वं सूर्योऽपामर्णांसि चरध्यै निपातयन् वृत्रायेवास्मै शत्रवे वृत्राय वज्रं प्रभर तिरश्चा वज्रेण गोर्न वाचो विभागमिव तस्य पर्वाङ्गमङ्गं छेत्तुमिष्यन्निदु विरद विविधतया हिन्धि ॥१२॥ भावार्थः(महर्षिकृतः)- अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। हे सेनेश ! त्वं यथा प्राणवायुना ताल्वादिषु ताडनं कृत्वा भिन्नान्यक्षराणि पदानि विभज्यन्ते, तथैव शत्रोर्बलं छिन्नं भिन्नं कृत्वाङ्गानि विभक्तानि कृत्वैवं विजयस्व ॥१॥

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. हे सेनापती ! जसे प्राणवायूद्वारे टाळू इत्यादी स्थानी जिभेचे ताडन करून भिन्न भिन्न अक्षर किंवा पदांचे विभाग प्रकट होतात. तसेच सभाध्यक्षाने शत्रूचे बल नष्ट करून त्यांच्या अंगांना छेदून शत्रूंना जिंकावे. ॥ १२ ॥

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    इंग्लिश (3)

    Meaning

    Indra, ruling lord of manifold power, fast and impetuous, wields the thunderbolt of sunrays for this Vritra, cloud of vapours and darkness, and releasing the waters for the streams to flow on earth, breaks the layers of vapours with the thunderbolt as lightning breaks things into pieces bit by bit.

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    Etymology and English translation based on Anvaya (logical connection of words) of Maharshi Dayanad Saraswati (M.D.S)-

    He=O! (sabhādyadhyakṣa) =Chairman of the Assembly etc., (kiyedhāḥ)=having many types of qualities, (īśānaḥ) = full of majesty, (tūtujānaḥ)=quick in working, (tvam)=you, (sūryaḥ) =Sun, (apām) =to waters, (caradhyai)=In going to consume, (nipātayan) = while dropping, (vṛtrāya) =of cloud, (iva) =like, (asmai) =said, (śatrave) =for the enemy, (vajram) =to group of weapons, (pra) =eminently, (bhara) =possess, (tiraścā) =having oblique motion, (vajreṇa) =by thunderbolt, (goḥ) =of speech, (vi) =special, (bhāgam) =part of, (iva) =like, (tasya) =its, (parva) =to every part, (chettum) =for piercing, (iṣyan) =knowingly, (it) =also, (vi) =specially, (rada) =must devide and, (vividhatayā)=in various ways, (hindhi)= kill.

    English Translation (K.K.V.)

    O Chairman of the Assembly etc.! You, the Sun, possessing many qualities, full of majesty and swift action, in going to consume the waters, like a dropping cloud, wield a group of weapons eminently against the enemy. In order to pierce each and every part of it, like a special part of speech, by a thunderbolt moving obliquely, despite knowing it, divide it specially and kill it in various ways.

    TranslaTranslation of gist of the mantra by Maharshi Dayanandtion of gist of the mantra by Maharshi Dayanand

    There is silent vocal simile as a figurative in this mantra. O commander of the army! Just as you divide different letters and syllables by piercing the palate etc. with the life-breath, similarly, you should be victorious by disintegrating the enemy's strength and dividing its body parts.

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    Subject of the mantra

    Subject of the mantra- Then how is that Chairman of the Assembly etc., this matter is mentioned in this mantra.

    Etymology and English translation based on Anvaya (logical connection of words) of Maharshi Dayanad Saraswati (M.D.S)-

    He=O! (sabhādyadhyakṣa) =Chairman of the Assembly etc., (kiyedhāḥ)=having many types of qualities, (īśānaḥ) = full of majesty, (tūtujānaḥ)=quick in working, (tvam)=you, (sūryaḥ) =Sun, (apām) =to waters, (caradhyai)=In going to consume, (nipātayan) = while dropping, (vṛtrāya) =of cloud, (iva) =like, (asmai) =said, (śatrave) =for the enemy, (vajram) =to group of weapons, (pra) =eminently, (bhara) =possess, (tiraścā) =having oblique motion, (vajreṇa) =by thunderbolt, (goḥ) =of speech, (vi) =special, (bhāgam) =part of, (iva) =like, (tasya) =its, (parva) =to every part, (chettum) =for piercing, (iṣyan) =knowingly, (it) =also, (vi) =specially, (rada) =must devide and, (vividhatayā)=in various ways, (hindhi)= kill.

    English Translation (K.K.V.)

    O Chairman of the Assembly etc.! You, the Sun, possessing many qualities, full of majesty and swift action, in going to consume the waters, like a dropping cloud, wield a group of weapons eminently against the enemy. In order to pierce each and every part of it, like a special part of speech, by a thunderbolt moving obliquely, despite knowing it, divide it specially and kill it in various ways.

    TranslaTranslation of gist of the mantra by Maharshi Dayanandtion of gist of the mantra by Maharshi Dayanand

    There is silent vocal simile as a figurative in this mantra. O commander of the army! Just as you divide different letters and syllables by piercing the palate etc. with the life-breath, similarly, you should be victorious by disintegrating the enemy's strength and dividing its body parts.

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