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ऋग्वेद मण्डल - 1 के सूक्त 91 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 1/ सूक्त 91/ मन्त्र 9
    ऋषिः - गोतमो राहूगणः देवता - सोमः छन्दः - निचृद्गायत्री स्वरः - षड्जः

    सोम॒ यास्ते॑ मयो॒भुव॑ ऊ॒तय॒: सन्ति॑ दा॒शुषे॑। ताभि॑र्नोऽवि॒ता भ॑व ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    सोम॑ । याः । ते॒ । म॒यः॒ऽभुवः॑ । ऊ॒तयः॑ । सन्ति॑ । दा॒शुषे॑ । ताभिः॑ । नः॒ । अ॒वि॒ता । भ॒व॒ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    सोम यास्ते मयोभुव ऊतय: सन्ति दाशुषे। ताभिर्नोऽविता भव ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    सोम। याः। ते। मयःऽभुवः। ऊतयः। सन्ति। दाशुषे। ताभिः। नः। अविता। भव ॥ १.९१.९

    ऋग्वेद - मण्डल » 1; सूक्त » 91; मन्त्र » 9
    अष्टक » 1; अध्याय » 6; वर्ग » 20; मन्त्र » 4
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    स कं रक्षतीत्युपदिश्यते ।

    अन्वयः

    हे सोम यास्ते तवास्य वा मयोभुव ऊतयो दाशुषे सन्ति ताभिर्नोऽस्माकमविता भव भवति वा ॥ ९ ॥

    पदार्थः

    (सोम) (याः) (ते) तव तस्य वा (मयोभुवः) सुखकारिका (ऊतयः) रक्षणादिकाः क्रियाः (सन्ति) भवन्ति (दाशुषे) दानशीलाय मनुष्याय (ताभिः) (नः) अस्माकं (अविता) रक्षणादिकर्त्ता (भव) भवति वा ॥ ९ ॥

    भावार्थः

    येषां प्राणिनां परमेश्वरो विद्वांसः सुनिष्पादिता ओषधिसमूहाश्च रक्षका भवन्ति कुतस्ते दुःखं पश्येयुः ॥ ९ ॥

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    हिन्दी (4)

    विषय

    वह किनसे रक्षा करता है, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ।

    पदार्थ

    हे (सोम) परमेश्वर ! (याः) जो (ते) आपकी वा सोम आदि ओषधिगण की (मयोभुवः) सुख को उत्पन्न करनेवाली (ऊतयः) रक्षा आदि क्रिया (दाशुषे) दानी मनुष्य के लिये (सन्ति) हैं (ताभिः) उनसे (नः) हमलोगों के (अविताः) रक्षा आदि के करनेवाले (भव) हूजिये वा जो यह ओषधिगण होता है, इनका उपयोग हम लोग सदा करें ॥ ९ ॥

    भावार्थ

    जिन प्राणियों की परमेश्वर, विद्वान् और अच्छी सिद्ध की हुई ओषधि रक्षा करनेवाली होती हैं, वे कहाँ से दुःख देखें ॥ ९ ॥

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    पदार्थ

    पदार्थ = हे  ( सोम ) = परमेश्वर  ( ते ) = आपकी  ( याः ) =  जो ( मयोभुवः ) = सुख की उत्पन्न करनेवाली  ( ऊतयः ) = रक्षणादि क्रियाएँ  ( दाशुषे सन्ति ) = दानी धर्मात्मा मनुष्य के लिए हैं  ( ताभिः ) = उनसे  ( न: ) = हमारे  ( अविता भव ) = अपने रक्षा आदि के करनेवाले हूजिये। 

     

    भावार्थ

    भावार्थ = हे परमात्मन्! आप का नियम है, कि जो यज्ञ दानादि उत्तम वैदिक कर्म करनेवाले धर्मात्मा पुरुष हैं, उनकी आप सदा रक्षा करते हैं। उन रक्षा आदि क्रियाओं से आप हम भक्तों की रक्षा कीजिये ।

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    विषय

    प्रभुरक्षण का पात्र 'दाश्वान्'

    पदार्थ

    १. हे (सोम) = शान्त प्रभो ! (या) = जो (ते) = आपकी (मयोभुवः) = कल्याण करनेवाली (ऊतयः) = रक्षाएँ (दाशुषे) = दाश्वान् पुरुष के लिए (सन्ति) = हैं, (ताभिः) उन रक्षाओं से (नः) = हमारे (अविता) = रक्षक (भव) = होओ । २. दाश्वान् पुरुष को प्रभु का रक्षण प्राप्त होता है । दाश्वान् पुरुष वह है जोकि [क] प्रभु के प्रति अपना अर्पण करनेवाला है, प्रभु की इच्छा में अपनी इच्छा को मिला देता है [ख] प्रभु पर आश्रय रखने के कारण ही यह दान देनेवाला है । यह यज्ञादि में धन का विनियोग करनेवाला है । इस दाश्वान् की प्रभु अवश्य रक्षा करते हैं । दाश्वान् का जीवन बड़ा सुखी चलता है । हम भी दाश्वान् बनें और प्रभु के रक्षणों को प्राप्त करें ।

    भावार्थ

    भावार्थ = प्रभु दाश्वान् पुरुष का रक्षण करते हैं ।

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    विषय

    पक्षान्तर में उत्पादक परमेश्वर और विद्वान् का वर्णन ।

    भावार्थ

    हे ( सोम ) सोम, राजन् ! प्रभो ! ( याः ) जो ( ते ) तेरे ( मयोभुवः ) सुखजनक ( ऊतयः ) रक्षा के साधन और ज्ञान ( दाशुषे ) दानशील पुरुष के हित के लिये ( सन्ति ) हैं ( ताभिः ) उनसे तू ( नः ) हमारा ( अविता ) रक्षक (भव ) हो । वीर्य तथा ओषधिरस के सुखजनक गुणों से देह की रक्षा होती है ।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    गोतमो रहूगणपुत्र ऋषिः ॥ सोमो देवता ॥ छन्दः—१, ३, ४ स्वराट्पङ्क्तिः ॥ - २ पङ्क्तिः । १८, २० भुरिक्पङ्क्तिः । २२ विराट्पंक्तिः । ५ पादनिचृद्गायत्री । ६, ८, ९, ११ निचृद्गायत्री । ७ वर्धमाना गायत्री । १०, १२ गायत्री। १३, १४ विराङ्गायत्री । १५, १६ पिपीलिकामध्या निचृद्गायत्री । १७ परोष्णिक् । १९, २१, २३ निचृत् त्रिष्टुप् ॥ त्रयोविंशत्यृचं सूक्तम् ॥

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    ज्या प्राण्यांचे रक्षण परमेश्वर, विद्वान व औषधांचे समूह करतात. त्यांना दुःख कसे भोगावे लागणार? ॥ ९ ॥

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    इंग्लिश (2)

    Meaning

    Soma, whatever safeguards, protections and immunities of yours there be, refreshing and rejuvenating for the generous and the charitable, with those be the saviour and protector for us too.

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    Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]

    How God protects is taught in the ninth Mantra.

    Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]

    (1) O Soma God, Creator of the world be our Protector with those aids which are sources of happiness to a man of charitable disposition. (2) It is also applicable to a scholar of peaceful nature who protects all by his noble teachings, which cause happiness and to the soma and other medicinal herbs which when taken in properly give energy and protect from various diseases.

    Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]

    (दाशुषे) दानशीलाय मनुष्याय = For a man of charitable disposition.

    Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]

    Why should those persons suffer who are protected by God, great scholars and well-prepared medicinal herbs like Soma ?

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    बंगाली (1)

    পদার্থ

    সোম যাস্তে ময়োভুব ঊতয়ঃ সন্তি দাশুষে।

    তাভির্নোঽবিতা ভব।।৬৮।।

    (ঋগ্বেদ ১।৯১।৯)

    পদার্থঃ হে (সোম) পরমেশ্বর ! (তে) তোমার (যাঃ) যে (ময়োভুবঃ) সুখের উৎপন্নকারক (ঊতয়ঃ) রক্ষাণাদি ক্রিয়া (দাশুষে সন্তি) দানশীল ধর্মাত্মা ব্যক্তির জন্য, (তাভি) তার দ্বারা (নঃ) আমাদের (অবিতা ভব) রক্ষা আদির কারণ হও।

     

    ভাবার্থ

    ভাবার্থঃ হে পরমাত্মা! তোমার নিয়ম এই যে, যে ব্যাক্তি যজ্ঞ-দানাদি উত্তম বৈদিক কর্মে প্রবৃত্ত, তাঁদের তুমি সদা রক্ষা করো। তোমার সেই রক্ষাকারী ক্রিয়ার দ্বারা তুমি তোমার ভক্তের রক্ষা করো।।৬৮।।

     

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