ऋग्वेद - मण्डल 10/ सूक्त 119/ मन्त्र 3
उन्मा॑ पी॒ता अ॑यंसत॒ रथ॒मश्वा॑ इवा॒शव॑: । कु॒वित्सोम॒स्यापा॒मिति॑ ॥
स्वर सहित पद पाठउत् । मा॒ । पी॒ताः । अ॒यं॒स॒त॒ । रथ॑म् । अश्वाः॑ऽइव । आ॒शवः॑ । कु॒वित् । सोम॑स्य । अपा॑म् । इति॑ ॥
स्वर रहित मन्त्र
उन्मा पीता अयंसत रथमश्वा इवाशव: । कुवित्सोमस्यापामिति ॥
स्वर रहित पद पाठउत् । मा । पीताः । अयंसत । रथम् । अश्वाःऽइव । आशवः । कुवित् । सोमस्य । अपाम् । इति ॥ १०.११९.३
ऋग्वेद - मण्डल » 10; सूक्त » 119; मन्त्र » 3
अष्टक » 8; अध्याय » 6; वर्ग » 26; मन्त्र » 3
Acknowledgment
अष्टक » 8; अध्याय » 6; वर्ग » 26; मन्त्र » 3
Acknowledgment
भाष्य भाग
हिन्दी (3)
पदार्थ
(पीताः) परमात्मा के आनन्दरस पिये हुए (मा) मुझे (उत्-अयंसत) ऊँचे ले जाते हैं-उन्नत करते हैं (आशवः) शीघ्रगामी (अश्वाः-इव) घोड़े जैसे (रथम्) रथ को उड़ा ले जाते हैं (कुवित् सोमस्य अपाम् इति) क्योंकि मैंने परमात्मा के आनन्दरस का बहुत पान किया ॥३॥
भावार्थ
परमात्मा के आनन्दरस का बहुत पान करनेवाले उपासक आत्मा को ऐसे ऊपर ले जाते हैं, जैसे शीघ्रगामी घोड़े रथ को उड़ाये ले जाते हैं ॥३॥
विषय
उन्नति के मार्ग पर
पदार्थ
[१] (कुवित्) = खूब ही (सोमस्य) = सोम का (अपाम्) = मैंने पान किया है (इति) = इस कारण (पीताः) = ये शरीर में ही व्याप्त किये हुए [= पिये हुए] सोम (मा) = मुझे, (आशवः) = शीघ्रगामी (अश्वाः) = घोड़े (रथं इव) = जिस प्रकार रथ को तीव्र गति से ले चलते हैं, उसी प्रकार (उत् अयंसत) = उन्नति के मार्ग पर ले चलते हैं । [२] सोम के पान से, वीर्यरक्षण से मनुष्य उन्नति के मार्ग पर इस प्रकार आगे बढ़ता है जैसे कि तीव्रगामी अश्व रथ को लेकर आगे बढ़ते हैं। आगे बढ़ता हुआ यह मनुष्य अधिक और अधिक उन्नत होता चलता है उन्नति का मार्ग सोमरक्षणामूलक ही है। मैं सोम का रक्षण करता हूँ। रक्षित सोम मुझे उन्नत करता है ।
भावार्थ
भावार्थ - उन्नति के मार्ग का आक्रमण सोमरक्षण पर ही निर्भर करता है।
विषय
सोमपान अर्थात् आत्मानन्द रस, ऐश्वर्य, ज्ञान आदि की प्राप्ति, आत्मा की शक्ति का उद्रेक।
भावार्थ
(आशवः अश्वाः इव) शीघ्रगामी घोड़े जिस प्रकार (रथम् उत् अयंसत) रथ को श्रमपूर्वक उठा कर लेजाते हैं उसी प्रकार (पीताः) सुरक्षित, परिपालित वीर्य, बलप्रद रस (मा उत् अयंसत्) मुझको ऊंचे उन्नत मार्ग की ओर ले जाते हैं। (इति) इसलिये (कुवित् सोमस्य अपाम्) मैं खूब अधिक वीर्य-बल का पालन करता हूं।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
ऋषिर्लब ऐन्द्रः। देवता—आत्मस्तुतिः॥ छन्दः—१–५, ७—१० गायत्री। ६, १२, १३ निचृद्गायत्री॥ ११ विराड् गायत्री।
संस्कृत (1)
पदार्थः
(पीताः-मा-उत्-अयंसत) पीताः-परमात्मानन्दरसाः-मामुन्नयन्ति (आशवः-अश्वाः-रथम्-इव) यथा-आशुगामिनोऽश्वा रथमुन्नयन्ति (कुवित् सोमस्य अपाम् इति) पूर्ववत् ॥३॥
इंग्लिश (1)
Meaning
The draughts of divine soma have raised me up in ecstasy of body, mind and spirit like swift horses carrying the chariot and the master, for I have drunk of the soma of the divine spirit.
मराठी (1)
भावार्थ
परमात्म्याच्या आनंदरसाचे अधिक पान करणारे उपासक आत्म्याला असे उच्च स्थानी घेऊन जातात, जसे शीघ्रगामी घोडे रथाला घेऊन जातात. ॥३॥
Acknowledgment
Book Scanning By:
Sri Durga Prasad Agarwal
Typing By:
N/A
Conversion to Unicode/OCR By:
Dr. Naresh Kumar Dhiman (Chair Professor, MDS University, Ajmer)
Donation for Typing/OCR By:
N/A
First Proofing By:
Acharya Chandra Dutta Sharma
Second Proofing By:
Pending
Third Proofing By:
Pending
Donation for Proofing By:
N/A
Databasing By:
Sri Jitendra Bansal
Websiting By:
Sri Raj Kumar Arya
Donation For Websiting By:
Shri Virendra Agarwal
Co-ordination By:
Sri Virendra Agarwal