ऋग्वेद - मण्डल 10/ सूक्त 119/ मन्त्र 4
उप॑ मा म॒तिर॑स्थित वा॒श्रा पु॒त्रमि॑व प्रि॒यम् । कु॒वित्सोम॒स्यापा॒मिति॑ ॥
स्वर सहित पद पाठउप॑ । मा । म॒तिः । अ॒स्थि॒त॒ । वा॒श्रा । पु॒त्रम्ऽइ॑व । प्रि॒यम् । कु॒वित् । सोम॑स्य । अपा॑म् । इति॑ ॥
स्वर रहित मन्त्र
उप मा मतिरस्थित वाश्रा पुत्रमिव प्रियम् । कुवित्सोमस्यापामिति ॥
स्वर रहित पद पाठउप । मा । मतिः । अस्थित । वाश्रा । पुत्रम्ऽइव । प्रियम् । कुवित् । सोमस्य । अपाम् । इति ॥ १०.११९.४
ऋग्वेद - मण्डल » 10; सूक्त » 119; मन्त्र » 4
अष्टक » 8; अध्याय » 6; वर्ग » 26; मन्त्र » 4
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अष्टक » 8; अध्याय » 6; वर्ग » 26; मन्त्र » 4
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भाष्य भाग
हिन्दी (3)
पदार्थ
(मा) मुझे (मतिः) मानसिक शक्ति या बुद्धि (उप-अस्थित) उपस्थित हो गयी मन्त्रकरण-मनन के लिये (वाश्रा) कामना-करती हुयी माता (प्रियं पुत्रम्-इव) प्रिय पुत्र-को जैसे उपस्थित हो जाती है, क्योंकि मैंने परमात्मा के आनन्दरस का बहुत पान किया ॥४॥
भावार्थ
परमात्मा के आनन्दरस का बहुत पान करनेवाले की मानसिक शक्ति या बुद्धि उसको ऐसे सङ्गत हो जाती है, जैसे प्रिय पुत्र को चाहती हुयी माता सङ्गत होती है ॥४॥
विषय
बुद्धि की तीव्रता
पदार्थ
[१] (वाश्रा) = शब्दायमाना-रम्भाती हुई, धेनु (इव) = जैसे (प्रियं पुत्रम्) = अपने प्रिय वत्स [बछड़े] को प्राप्त होती है, अथवा वाश्रा उत्साहवर्धक शब्द बोलती हुई जैसे माता प्रिय पुत्र के समीप आती हैं, उसी प्रकार (मा) = मुझे (मतिः) = बुद्धि (उप अस्थित) = प्राप्त हो। (इति) = इसी कारण, इसी उद्देश्य से ही तो (कुवित्) = खूब ही (सोमस्य अपाम्) = मैंने सोम का पान किया है। सोमरक्षण से ही मुझे उत्कृष्ट बुद्धि प्राप्त हुई है। [२] रक्षित सोम ज्ञानाग्नि का ईंधन बनता है, ज्ञानाग्नि को दीप्त करनेवाला ईंधन यह सोम ही है। इस प्रकार सोमरक्षण से मैं तीव्र बुद्धि को प्राप्त करता हूँ ।
भावार्थ
भावार्थ- सोमरक्षण से हमारी बुद्धि तीव्र होती है ।
विषय
आत्मदर्शन रूप सोमपान से ज्ञानवृद्धि।
भावार्थ
(वाश्रा) कामनायुक्त माता जिस प्रकार (प्रियम् पुत्रम् इव) प्यारे पुत्र को प्राप्त होती है उसी प्रकार (मतिः) उत्तम बुद्धि, ज्ञान (मा उप अस्थित) मुझे भी प्राप्त होता है। (इति) इस हेतु (कुवित् सोमस्य अपाम्) मैंने अपने आत्मा के स्वरूप का खूब २ पान अर्थात् मनन, ज्ञान और दर्शन किया है।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
ऋषिर्लब ऐन्द्रः। देवता—आत्मस्तुतिः॥ छन्दः—१–५, ७—१० गायत्री। ६, १२, १३ निचृद्गायत्री॥ ११ विराड् गायत्री।
संस्कृत (1)
पदार्थः
(मा मतिः-उप-अस्थित) मां मतिरुपतिष्ठते मन्त्रकरणाय मननाय (वाश्रा-प्रियं पुत्रम्-इव) कामयमाना माता प्रियं पुत्रमुपतिष्ठते तद्वत् (कुवित्०) पूर्ववत् ॥४॥
इंग्लिश (1)
Meaning
My heart, mind and intelligence is stable and has stabilised me in the object of my divine love like the loving mother cow having reached its darling calf, for I have drunk of the soma of the divine spirit.
मराठी (1)
भावार्थ
परमात्म्याच्या आनंदरसाचे पुष्कळ पान करणाऱ्याची मानसिक शक्ती किंवा बुद्धी अशी होते, की जशी प्रिय पुत्रासोबत त्याची माता त्याच्या संगतीत असते. ॥४॥
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