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ऋग्वेद मण्डल - 10 के सूक्त 30 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 10/ सूक्त 30/ मन्त्र 4
    ऋषिः - कवष ऐलूषः देवता - आप अपान्नपाद्वा छन्दः - विराट्त्रिष्टुप् स्वरः - धैवतः

    यो अ॑नि॒ध्मो दीद॑यद॒प्स्व१॒॑न्तर्यं विप्रा॑स॒ ईळ॑ते अध्व॒रेषु॑ । अपां॑ नपा॒न्मधु॑मतीर॒पो दा॒ याभि॒रिन्द्रो॑ वावृ॒धे वी॒र्या॑य ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    यः । अ॒नि॒ध्मः । दीद॑यत् । अ॒प्ऽसु । अ॒न्तः । यम् । विप्रा॑सः । ईळ॑ते । अ॒ध्व॒रेषु॑ । अपा॑म् । न॒पा॒त् । मधु॑ऽमतीः । अ॒पः । दाः॒ । याभिः॑ । इन्द्रः॑ । व॒वृ॒धे । वी॒र्या॑य ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    यो अनिध्मो दीदयदप्स्व१न्तर्यं विप्रास ईळते अध्वरेषु । अपां नपान्मधुमतीरपो दा याभिरिन्द्रो वावृधे वीर्याय ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    यः । अनिध्मः । दीदयत् । अप्ऽसु । अन्तः । यम् । विप्रासः । ईळते । अध्वरेषु । अपाम् । नपात् । मधुऽमतीः । अपः । दाः । याभिः । इन्द्रः । ववृधे । वीर्याय ॥ १०.३०.४

    ऋग्वेद - मण्डल » 10; सूक्त » 30; मन्त्र » 4
    अष्टक » 7; अध्याय » 7; वर्ग » 24; मन्त्र » 4
    Acknowledgment

    हिन्दी (3)

    पदार्थ

    (यः-अप्सु-अन्तः) राजपदस्थ जो राजा प्रजाओं के मध्य में (अनिध्मः-दीदयत्) रात-दिन की अपेक्षा करके अर्थात् निरन्तर अपने गुण प्रभावों से प्रकाशमान रहता है (यं विप्रासः-अध्वरेषु ईळते) जिसको ऋत्विज् राजसूययज्ञ के अवसरों में प्रशंसित करते हैं, प्रसिद्ध करते हैं (अपां नपात्) वह तू प्रजाओं का रक्षक राजन् ! (मधुमतीः-अपः-दाः) मधुरस्वभाववाली अनुशासन में रहनेवाली प्रजाओं के लिये सुख देता रह (याभिः-इन्द्रः-वीर्याय वावृधे) जिन प्रजाओं के द्वारा पराक्रम-प्राप्ति के लिये बढ़ा करता है ॥४॥

    भावार्थ

    स्वदेशी जनों में जो जन अपने गुणप्रभावों से प्रसिद्ध होता है, पुरोहितादि ऋत्विज् लोग राजसूय यज्ञ द्वारा राजपद पर उसे बिठाते हैं। प्रजाजनों द्वारा राजा बल पराक्रम को प्राप्त होता है, उसे सदा प्रजा को सुखी रखना चाहिये ॥४॥

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    विषय

    अनिध्म अग्नि

    पदार्थ

    [१] (यः) = जो प्रभु रूप अग्नि (अनिध्मः) = काष्ठों के बिना प्रज्वलित होनेवाली है और (अप्सुं अन्तः) = प्रजाओं के हृदयों में [आपो नारा इति प्रोक्ताः आपो वै नर सूनवः] (दीदयत्) = देदीप्यमान है । (यम्) = जिसको (विप्रासः) = अपना विशेषरूप से पूरण करनेवाले विद्वान् लोग (अध्वरेषु) = हिंसा रहित कर्मों में (ईडते) = उपासित करते हैं। वह (अपां नपात्) = हमारे रेतः कणों को न नष्ट होने देनेवाला है। [२] यह 'अपां न पात्' प्रभु (मधुमती:) = हमारे जीवनों को मधुर बनानेवाले (अपः) = रेतः कणों को (दाः) = हमारे लिये देते हैं । वस्तुतः रेतःकणों के रक्षण से शरीर ही स्वस्थ बनता हो यह बात नहीं है, इनके रक्षण के परिणाम रूप मन भी स्वस्थ बनता है और मन में किसी प्रकार के राग- द्वेष की भावना उत्पन्न नहीं होती, हमारे मन बड़े मधुर बने रहते हैं । [३] ये रेतःकण वे हैं (याभिः) = जिनसे (इन्द्रः) = एक जितेन्द्रिय पुरुष (वीर्याय) = शक्तिशाली कर्मों के करने के लिये (वावृधे) = बढ़ता है । वीर्य की स्थिरता ही मनुष्य के अन्दर उत्साह आदि गुणों का संचार करती है और उसे शक्तिशाली कर्मों को करने के लिये समर्थ करती है ।

    भावार्थ

    भावार्थ - प्रभु अग्नि हैं, इनके उपासन से वीर्य का रक्षण होकर हम आगे बढ़ने के योग्य होते हैं ।

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    विषय

    मेघ और विद्युत् के तुल्य तेजस्वी महापुरुष का वर्णन।

    भावार्थ

    (यः) जो (अनिध्मः) विना काठ के (अप्सु अन्तः) जलों या अन्तरिक्ष के बीच विद्युत् के समान (दीदयत्) प्रजाओं के बीच प्रकाशित होता है (विप्रासः यं) विद्वान्, बुद्धिमान् जन जिसको (अध्वरेषु ईडते) यज्ञों और प्रजा के रक्षणादि कार्यों में चाहते और जिसकी स्तुति करते हैं वह (अपां नपात्) आप्त जनों को एकत्र बांधने वाला पुरुष मेघ के समान (मधुमतीः अपः) मधुर जलों से युक्त धाराओं के समान ही मधुर अन्नादि से समृद्ध आप्त प्रजाओं का प्रदान करे, (याभिः) जिन से (इन्द्रः) ऐश्वर्यवान् राजा सूर्य के समान तेजस्वी होकर (वीर्याय वावृधे) वीर्य की वृद्धि के लिये और बढ़े।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    कवष ऐलूष ऋषिः॥ देवताः- आप अपान्नपाद्वा ॥ छन्दः— १, ३, ९, ११, १२, १५ निचृत् त्रिष्टुप्। २, ४, ६, ८, १४ विराट् त्रिष्टुप्। ५, ७, १०, १३ त्रिष्टुप्। पञ्चदशर्चं सूक्तम्॥

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    संस्कृत (1)

    पदार्थः

    (यः-अप्सु-अन्तः) यो राजपदस्थो राजा प्रजासु मध्ये (अनिध्मः-दीदयत्) अहोरात्रमनपेक्षमाणो निरन्तरमित्यर्थः “अहोरात्राणीध्मः” [काठ० ६।६]  प्रकाशते (यं विप्रासः-अध्वरेषु-ईळते) यं खल्वृत्विजो राजसूययज्ञावसरेषु प्रशंसन्ति (अपां नपात्) प्रजाजनानां न पातयिता तेषां रक्षकः सः (मधुमतीः-अपः दाः) मधुमतीभ्योऽद्भ्यः, चतुर्थ्यर्थे द्वितीया व्यत्ययेन मधुरस्वभाववतीभ्यः प्रजाभ्यः सुखं देहि-ददासि (याभिः-इन्द्रः-वीर्याय वावृधे) याभिः प्रजाभिः सह पराक्रमकरणाय राजा भृशं वर्धते ॥४॥

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    इंग्लिश (1)

    Meaning

    O sun who burn and shine in space without fuels of fire, whom priests and scientists serve and adore in yajna, who never allow liquid energies of the world to exhaust, pray give us the honey sweets of liquid energies by which Indra, ruler of the world order on earth, may rise to strength and accomplish great deeds for humanity.

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    स्वदेशी जनात जो आपल्या गुणप्रभावाने प्रसिद्ध होतो. पुरोहित इत्यादी ऋत्विज लोक राजसूय यज्ञाद्वारे राज्यावर त्याला बसवितात अशा प्रकारे राजा प्रजेकडून बल पराक्रम प्राप्त करतो. त्याने प्रजेला नेहमी सुखी ठेवावे. ॥४॥

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