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ऋग्वेद मण्डल - 10 के सूक्त 30 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 10/ सूक्त 30/ मन्त्र 9
    ऋषिः - कवष ऐलूषः देवता - आप अपान्नपाद्वा छन्दः - निचृत्त्रिष्टुप् स्वरः - धैवतः

    तं सि॑न्धवो मत्स॒रमि॑न्द्र॒पान॑मू॒र्मिं प्र हे॑त॒ य उ॒भे इय॑र्ति । म॒द॒च्युत॑मौशा॒नं न॑भो॒जां परि॑ त्रि॒तन्तुं॑ वि॒चर॑न्त॒मुत्स॑म् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    तम् । सि॒न्ध॒वः॒ । म॒त्स॒रम् । इ॒न्द्र॒ऽपान॑म् । ऊ॒र्मिम् । प्र । हे॒त॒ । यः । उ॒भे इति॑ । इय॑र्ति । म॒द॒ऽच्युत॑म् । औ॒शा॒नम् । न॒भः॒ऽजाम् । परि॑ । त्रि॒ऽतन्तु॑म् । वि॒ऽचर॑न्तम् । उत्स॑म् ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    तं सिन्धवो मत्सरमिन्द्रपानमूर्मिं प्र हेत य उभे इयर्ति । मदच्युतमौशानं नभोजां परि त्रितन्तुं विचरन्तमुत्सम् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    तम् । सिन्धवः । मत्सरम् । इन्द्रऽपानम् । ऊर्मिम् । प्र । हेत । यः । उभे इति । इयर्ति । मदऽच्युतम् । औशानम् । नभःऽजाम् । परि । त्रिऽतन्तुम् । विऽचरन्तम् । उत्सम् ॥ १०.३०.९

    ऋग्वेद - मण्डल » 10; सूक्त » 30; मन्त्र » 9
    अष्टक » 7; अध्याय » 7; वर्ग » 25; मन्त्र » 4
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    हिन्दी (3)

    पदार्थ

    (सिन्धवः) हे राष्ट्र को थामनेवाली आधारभूत प्रजाओं ! (तं मत्सरम्-इन्द्रपानम्-ऊर्मिं प्रहेत) उस हर्षानेवाले राजा के ग्रहण करने योग्य बढ़े-चढ़े रक्षासाधन भाग को राजा के लिये दो (यः-उभे-इयर्त्ति) जो राजा के लिये तुम्हारे द्वारा देने योग्य भाग है, वह दोनों प्रकार के ऐहिक और पारलौकिक सुखों को प्राप्त कराता है। (मदच्युतम्-औशानं नभोजाम्) राष्ट्र में हर्ष-प्रचारक कामनाओं का पूरक और आकाश में प्रसिद्धि फैलानेवाला (त्रितन्तुम्-उत्सं परि विचरन्तम्) पितामह, पिता और पुत्र के यश को देनेवाले उत्कर्षकारक अपने योगक्षेम से ऊपर-अधिक देने योग्य ही है ॥९॥

    भावार्थ

    प्रजाओं द्वारा राजा के लिये अपने योगक्षेम से बचे हुए दातव्यभाग को देना ही चाहिये। वह राजा के लिए साधिकार प्राप्त करने योग्य है। राजा और प्रजा के लिये राष्ट्र में सुख का संचार करनेवाला उभयलोक-सिद्धि के लिए दातव्य है ॥९॥

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    विषय

    त्रि-तन्तु

    पदार्थ

    [१] हे (सिन्धवः) = शरीर में रुधिर के साथ सर्वत्र स्यन्दनशील रेतः कणो ! (तं ऊर्मिम्) = उस तरङ्ग को (प्रहेत) = हमें प्रकर्षेण प्राप्त कराओ जो (भत्सरम्) = [मादयितारं] जीवन के अन्दर उल्लास को उत्पन्न करनेवाली है, (इन्द्रपानम्) = जितेन्द्रिय पुरुष का रक्षण करनेवाली है। [२] उस ऊर्मि को प्राप्त कराओ (यः) = जो (उभे) = शरीर व मस्तिष्क दोनों को गतिमय बनाती है। जिसके कारण शरीर में गतिशीलता बनी रहती है और मस्तिष्क कहीं कुण्ठित नहीं होता। [३] उस ऊर्मि को प्राप्त कराओ जो कि 'मदच्युतं' शब्द की यह भावना भी सुन्दर है कि 'अभिमान को हमारे से दूर करनेवाली है'। (मदच्युतम्) = हमारे जीवनों में मद व हर्ष को टपकानेवाली है, (औशानम्) = उस प्रभु की प्राप्ति की कामना को हमारे में उत्पन्न करनेवाली है, (नभोजाम्) = मस्तिष्क रूप द्युलोक में प्रकाश के प्रादुर्भाव को करनेवाली है, (परि) = [ सर्वतः ] सब दृष्टिकोणों से (त्रितन्तुम्) = शरीर, मन व बुद्धि तीनों का विस्तार करनेवाली है, (विचरन्तम्) = विशेषरूप से जीवन को क्रियाशील बनानेवाली है, (उत्सम्) = उत्स्यन्दनं [=देवानां प्रति ऊर्ध्वं गन्तारं सा० ] हमें उत्कृष्ट गतिवाला करके दिव्य गुणों को प्राप्त करानेवाली है।

    भावार्थ

    भावार्थ - रेतः कणों का रक्षण हमें उन्नतवाला, सुन्दर शरीर व मस्तिष्कवाला निरभिमान प्रभु- प्रवण, क्रियाशील व ऊर्ध्व गतिवाला बनाता है।

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    विषय

    नदी सूर्यवत् राजा प्रजा का व्यवहार।

    भावार्थ

    (सिन्धवः मत्सरम् इन्द्रपानम् ऊर्मिं प्र हिन्वन्ति) जिस प्रकार नदियां आनन्द-संचारक, सूर्य द्वारा पान करने योग्य ऊर्ध्वगामी जल को बढ़ाती हैं उसी प्रकार हे (सिन्धवः) वेग से जाने वाले सैन्यादि प्रजाओ ! (तं) उस (मत्सरम्) हर्षदायक, (इन्द्र-पानं) ऐश्वर्ययुक्त राष्ट्र के पालक, (ऊर्मिम्) उन्नत, आज्ञापक पुरुष को (प्र हेत) खूब बढ़ाओ, (यः) जो (उभे) राजा और प्रजा वर्गों को (इयर्त्ति) सन्मार्ग में चलाता है, और (मद-च्युतम्) हर्षजनक (औशानं) समृद्धि की कामना करते हुए (नभः-जाम्) आकाश में सूर्यवत् उदय होने वाले (त्रि-तन्तुम्) तीन तन्तुओं वाले, यज्ञोपवीती दीक्षित और (उत्सम्) उत्तम मार्ग पर चलने वाले, (परि वि-चरन्तं) सर्वोपरि विचरने वाले पूज्य को (प्र हेत) बढ़ाओ। (२) अध्यात्म में—महान् आत्मा, प्रकृति के तीन गुणों को धारण करता, वह सर्वत्र व्यापता है।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    कवष ऐलूष ऋषिः॥ देवताः- आप अपान्नपाद्वा॥ छन्दः— १, ३, ९, ११, १२, १५ निचृत् त्रिष्टुप्। २, ४, ६, ८, १४ विराट् त्रिष्टुप्। ५, ७, १०, १३ त्रिष्टुप्। पञ्चदशर्चं सूक्तम्॥

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    संस्कृत (1)

    पदार्थः

    (सिन्धवः) हे राष्ट्रस्य बन्धयित्र्यः ! (तं मत्सरम्-इन्द्रपानम्-ऊर्मिं प्रहेत) तं हर्षकरं राजपेयं राजग्राह्यं प्रवृद्धं रक्षणसाधनं राज्ञे प्रेरयत-प्रयच्छत (यः-उभे-इयर्ति) यो राज्ञे युष्माभिर्दातव्यो भाग उभे सुखे इहलोकपरलोकविषयके सुखे प्रेरयति प्रयच्छति (मदच्युतम्-औशानं नभोजाम्) राष्ट्रे हर्षप्रचारकं कामना-पूरकमाकाशे प्रसिद्धिप्रसारकम् (त्रितन्तुम्-उत्सं परिविचरन्तम्) त्रयस्तन्तवः पितामह-पितृपुत्राः, तेषां यशो लोके येन भवति तथाभूतम्-उत्कृष्टकरं निजयोगक्षेमत उपरिगतं देयं दातव्यमेव ॥९॥

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    इंग्लिश (1)

    Meaning

    O streams of life, dynamic people of the world, inspire and set in motion that joyous wave of living and working worthy of all ruling Indra which helps to realise both ends of life, fulfilment over here and freedom of moksha hereafter, overflowing with divine ecstasy, admirable, heavenly, universal, good for earth, heaven and the middle regions, continuous for three living generations, dynamic as the river and deep as ocean.

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    प्रजेने आपला योगक्षेम करून वाचलेला दातव्यभाग राजाला दिलाच पाहिजे. राजाला तो प्राप्त करण्याचा अधिकार आहे. राजा व प्रजेचा राष्ट्रात सुखाने संसार करण्यासाठी उभयलोक (ऐहिक व पारलौकिक) सिद्धीसाठी दातव्य आहे. ॥९॥

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