Loading...
ऋग्वेद मण्डल - 10 के सूक्त 30 के मन्त्र
1 2 3 4 5 6 7 8 9 10 11 12 13 14 15
मण्डल के आधार पर मन्त्र चुनें
अष्टक के आधार पर मन्त्र चुनें
  • ऋग्वेद का मुख्य पृष्ठ
  • ऋग्वेद - मण्डल 10/ सूक्त 30/ मन्त्र 7
    ऋषिः - कवष ऐलूषः देवता - आप अपान्नपाद्वा छन्दः - त्रिष्टुप् स्वरः - धैवतः

    यो वो॑ वृ॒ताभ्यो॒ अकृ॑णोदु लो॒कं यो वो॑ म॒ह्या अ॒भिश॑स्ते॒रमु॑ञ्चत् । तस्मा॒ इन्द्रा॑य॒ मधु॑मन्तमू॒र्मिं दे॑व॒माद॑नं॒ प्र हि॑णोतनापः ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    यः । वः॒ । वृ॒ताभ्यः॑ । अकृ॑णोत् । ऊँ॒ इति॑ । लो॒कम् । यः । वः॒ । म॒ह्याः । अ॒भिऽश॑स्तेः । अमु॑ञ्चत् । तस्मै॑ । इन्द्रा॑य । मधु॑ऽमन्तम् । ऊ॒र्मिम् । दे॒व॒ऽमाद॑नम् । प्र । हि॒णो॒त॒न॒ । आ॒पः ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    यो वो वृताभ्यो अकृणोदु लोकं यो वो मह्या अभिशस्तेरमुञ्चत् । तस्मा इन्द्राय मधुमन्तमूर्मिं देवमादनं प्र हिणोतनापः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    यः । वः । वृताभ्यः । अकृणोत् । ऊँ इति । लोकम् । यः । वः । मह्याः । अभिऽशस्तेः । अमुञ्चत् । तस्मै । इन्द्राय । मधुऽमन्तम् । ऊर्मिम् । देवऽमादनम् । प्र । हिणोतन । आपः ॥ १०.३०.७

    ऋग्वेद - मण्डल » 10; सूक्त » 30; मन्त्र » 7
    अष्टक » 7; अध्याय » 7; वर्ग » 25; मन्त्र » 2
    Acknowledgment

    हिन्दी (3)

    पदार्थ

    (यः) जो राजा (वः-वृताभ्यः-लोकम्-अकृणोत्-उ) तुम वरण की हुई-प्रजाभाव से स्वीकार की हुई प्रजाओं के लिये सुखप्रद स्थान सम्पन्न करता है (यः) और जो (वः) तुम्हें (मह्याः-अभिशस्तेः-अमुञ्चत्) शत्रु द्वारा प्रेरित महती हिंसा से छुड़ाता है-बचाता है (तस्मै-इन्द्राय) उस राजा के लिए (आपः-मधुमन्तं देवमादनम्-ऊर्मिं प्र हिणोतन) हे प्रजाओं-प्रजाजनों ! तुम इन्द्रियप्रसादक मधु उन्नत अर्थात् उत्तम उपहार को समर्पित करो ॥७॥

    भावार्थ

    राजा जैसे प्रजाओं को कृपा और रक्षा से स्वीकार करता है-अपनाता है तथा विरोधी के प्रहारों से बचाता है, वैसे ही प्रजा को भी राजा के लिये भाँति-भाँति की उत्तम वस्तुएँ भेंट देनी चाहिये ॥७॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    विषय

    मधुमान् ऊर्मि

    पदार्थ

    [१] हे (आपः) = रेतः कणो ! (यः) = जो भी युवक (वृताभ्यः) = वरण किये गये, स्वीकार किये गये (वः) = आपके लिये (लोकम्) = शरीर में स्थान को (अकृणोत्)= बनाता है, अर्थात् जो आपको शरीर में ही सुरक्षित करता है और (यः) = जो (वः) = आपको (मह्या:) = इस पृथिवी के (अभिशस्ते) = हिंसन से, अर्थात् पार्थिव भोगों में आसक्ति के कारण विनाश से (अमुञ्चत्) = मुक्त करता है, पार्थिव भोगों में फँसकर कभी तुम रेतः कणों का नाश नहीं होने देता । [२] (तस्मा) = [ तस्मै] उस (इन्द्राय) = जितेन्द्रिय पुरुष के लिये (मधुमन्तम्) = अत्यन्त माधुर्यवाली (ऊर्मिम्) = तरंग को (प्रहिणोत) = प्रकर्षेण प्राप्त कराओ, अर्थात् इसके जीवन को उत्साह सम्पन्न करो, परन्तु इस उत्साह से उसका जीवन माधुर्यमय हो । इसमें स्फूर्ति हो, स्फूर्ति के साथ मधुरता हो। यह माधुर्य व स्फूर्ति से युक्त होकर सब कार्यों को करनेवाला हो। यह ऊर्मि (देवामादनम्) = देवों को हर्षित करनेवाली हो, अर्थात् इसके इस मधुर उत्साह को देखकर इसके माता, पिता, आचार्य आदि सब देव प्रसन्न हों। (अनात) = इसकी यह मधुमान् ऊर्मि उस देवाधिदेव परमात्मा को भी प्रसन्न करनेवाली हो, इसके कारण यह प्रभु का भी प्रिय बने ।

    भावार्थ

    भावार्थ- जो रेतः कणों का रक्षण करता है वह रक्षित रेतः कणों के कारण मधुर व उत्साह सम्पन्न जीवनवाला होता है, इससे मधुर उत्साह सम्पन्न जीवन से यह सब देवों को प्रीणित करनेवाला होता है ।

    इस भाष्य को एडिट करें

    विषय

    संकट से रक्षा करने वाले का आदर करने का आदेश।

    भावार्थ

    हे (आपः) आप्त जनो ! जलवत् शान्तिदायक सहयोगी जनो वा व्यापक गुणों से युक्त प्रभो ! (यः) जो (वृताभ्यः) वरण किये गये (वः) जो आपके लिये (लोकं अकृणोत्) स्थान वा गृह बनाता है, (यः वः) जो आप लोगों को (मह्याः अभिशस्तेः) बड़ी निंदा और आक्रमण, कष्टादि से (अमुञ्चत्) सब प्रकार से मुक्त करता है, (तस्मै इन्द्राय) उस ऐश्वर्यवान् प्रभु, स्वामी वा आत्मा के लिये (देव-मादनं) सब उत्तम जनों, विद्वानों वा प्राणगण को सुखी, हर्षित करने वाले (मधुमन्तं ऊर्मिम्) मधुर मधु से युक्त उत्तम तरंग या उत्साह वा अन्न-जल से युक्त उत्तम पदार्थ (प्र-हिणोतन) प्रदान करो।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    कवष ऐलूष ऋषिः॥ देवताः- आप अपान्नपाद्वा॥ छन्दः— १, ३, ९, ११, १२, १५ निचृत् त्रिष्टुप्। २, ४, ६, ८, १४ विराट् त्रिष्टुप्। ५, ७, १०, १३ त्रिष्टुप्। पञ्चदशर्चं सूक्तम्॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    संस्कृत (1)

    पदार्थः

    (यः) इन्द्रः-राजा (वः वृताभ्यः लोकम्-अकृणोत् उ) युष्मभ्यं वृताभ्यः प्रजात्वेन स्वीकृताभ्यः खलु सुखलोकं सुखप्रदस्थानं करोति (यः) यश्च राजा (वः) युष्मान् (मह्याः-अभिशस्तेः-अमुञ्चत्) महत्याः परेण शत्रुणा प्रयुक्ताया हिंस्रायाः-मुञ्चति-वारयति (तस्मै-इन्द्राय) तस्मै राज्ञे (आपः-मधुमन्तं देवमादनम्-ऊर्मिम् प्रहिणोतन) हे प्रजाः-प्रजाजनाः ! यूयं मधुरम्-इन्द्रियप्रसादकरमुन्नतमुपहारं प्रेरयत-उपहरत ॥७॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    इंग्लिश (1)

    Meaning

    O people of the social order of the world, committed to honesty and loyalty, the ruler who opens the doors of freedom against inhibition and creates a beautiful world for you, for that Indra, mighty ruler, create honey sweet fragrances of exhilarating environment and offer him divinely joyous foods and drinks of self-fulfilment.

    इस भाष्य को एडिट करें

    मराठी (1)

    भावार्थ

    राजा जसा प्रजेवर कृपा करून त्यांचे रक्षण करतो. त्यांना आपलेसे करतो व विरोधकांच्या प्रहारापासून वाचवितो, तसेच प्रजेनेही राजासाठी निरनिराळ्या उत्तम वस्तू भेट द्याव्यात. ॥७॥

    इस भाष्य को एडिट करें
    Top