ऋग्वेद - मण्डल 10/ सूक्त 63/ मन्त्र 14
ऋषिः - गयः प्लातः
देवता - विश्वेदेवा:
छन्दः - पादनिचृज्ज्गती
स्वरः - निषादः
यं दे॑वा॒सोऽव॑थ॒ वाज॑सातौ॒ यं शूर॑साता मरुतो हि॒ते धने॑ । प्रा॒त॒र्यावा॑णं॒ रथ॑मिन्द्र सान॒सिमरि॑ष्यन्त॒मा रु॑हेमा स्व॒स्तये॑ ॥
स्वर सहित पद पाठयम् । दे॒वा॒सः॒ । अव॑थ । वाज॑ऽसातौ । यम् । शूर॑ऽसाता । म॒रु॒तः॒ । हि॒ते । धने॑ । प्रा॒तः॒ऽयावा॑नम् । रथ॑म् । इ॒न्द्र॒ । सा॒न॒सिम् । अरि॑ष्यन्तम् । आ । रु॒हे॒म॒ । स्व॒स्तये॑ ॥
स्वर रहित मन्त्र
यं देवासोऽवथ वाजसातौ यं शूरसाता मरुतो हिते धने । प्रातर्यावाणं रथमिन्द्र सानसिमरिष्यन्तमा रुहेमा स्वस्तये ॥
स्वर रहित पद पाठयम् । देवासः । अवथ । वाजऽसातौ । यम् । शूरऽसाता । मरुतः । हिते । धने । प्रातःऽयावानम् । रथम् । इन्द्र । सानसिम् । अरिष्यन्तम् । आ । रुहेम । स्वस्तये ॥ १०.६३.१४
ऋग्वेद - मण्डल » 10; सूक्त » 63; मन्त्र » 14
अष्टक » 8; अध्याय » 2; वर्ग » 5; मन्त्र » 4
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अष्टक » 8; अध्याय » 2; वर्ग » 5; मन्त्र » 4
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भाष्य भाग
हिन्दी (3)
पदार्थ
(मरुतः-देवासः) हे जीवन्मुक्त विद्वानों ! (यं वाजसातौ) जिसको अमृतभोगप्राप्ति के निमित्त (यं शूरसाता) जिसको पापनाशनार्थ प्राप्ति के हेतु (हिते धने) हितकर अध्यात्मधन के निमित्त (अवथ) सुरक्षित रखते हो (इन्द्र) हे परमात्मन् ! (प्रातर्यावाणं रथम्) जीवन के प्रातः अर्थात् ब्रह्मचर्य से चलने की शक्तिवाले रमणीय (सानसिम्) शाश्वत सुखरूप (अरिष्यन्तम्) हिंसित न होनेवाले मोक्षधाम को (स्वस्तये-आरुहेम) कल्याण के लिए आरोहण करें-प्राप्त होवें ॥१४॥
भावार्थ
जीवन्मुक्त विद्वानों के सङ्ग से अमृत अन्न भोग प्राप्ति और पापरहित शुद्ध वृत्ति सम्पादन के लिए उपदेश ग्रहण करना चाहिए। उससे परमात्मा पूर्ण ब्रह्मचर्य से सम्पन्न को मुक्तिसुख प्रदान करता है ॥१४॥
विषय
वीरों विद्वानों के रक्षा-कुशल अध्यक्ष का वर्णन।
भावार्थ
हे (देवासः) विद्वान् जनो ! हे (मरुतः) वायुवद् बलवान् प्राणप्रद, वीर जनो ! आप लोग (वाज-सातौ) ज्ञान, ऐश्वर्य, बल आदि लाभ के संग्राम आदि अवसरों पर (यम् अवथ) जिसकी रक्षा करतें हो, और (शूर-साता) वीर पुरुषों के करने योग्य संग्राम में (हिते धने) स्थिर धन को प्राप्त और उपभोग करने के लिये (यं अवथ) जिसकी रक्षा करते हो, हे (इन्द्र) ऐश्वर्यवन् ! उस (रथम्) वेगवान् रथ के तुल्य उद्देश्य तक पहुंचाने वाले, (सानसिं) उत्तम रीति से सेवन करने योग्य, (अरिष्यन्तम्) किसी को पीड़ा न देने वाले, राष्ट्र में उत्तम पद या शासक वा प्रभु को हम (स्वस्तये) अपने कल्याणार्थ (आ रुहेम) अपना आश्रय करें।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
गयः प्लात ऋषिः। देवता—१—१४,१७ विश्वेदेवाः। १५, १६ पथ्यास्वस्तिः॥ छन्द:–१, ६, ८, ११—१३ विराड् जगती। १५ जगती त्रिष्टुप् वा। १६ आर्ची स्वराट् त्रिष्टुप्। १७ पादनिचृत् त्रिष्टुप्॥ सप्तदशर्चं सूक्तम्॥
विषय
शरीर-रथ
पदार्थ
[१] हे (इन्द्र) = परमात्मन् ! (रथम्) = हम उस शरीर रथ पर (आरुहेम) = आरोहण करें जो (प्रातर्या-वाणम्) - प्रातः से ही गतिमय है, अर्थात् इस शरीर रथ पर आरूढ़ होकर हम सदा क्रियाशील जीवन बिताएँ । (सानसिम्) = जो सम्भजनशील हैं, जिस शरीररथ पर आरूढ़ होकर हम प्रातः - सायं उस प्रभु का सम्भजन करनेवाले होते हैं। इस प्रभु-सम्भजन से ही हम स्वस्थ शरीरवाले रहते हैं, (अरिष्यन्तम्) = जो शरीर रथ हिंसित नहीं होता, विविध आधि-व्याधियों का शिकार नहीं होता । [२] एवं हम उस शरीर रथ पर आरोहण करते हैं जो कि 'गतिमय, उपासनामय व नीरोगता' वाला है। इस शरीर रथ पर आरोहण करके हम (स्वस्तये) = जीवन में उत्तम स्थितिवाले होते हैं । यह शरीर - रथ वह है (यम्) = जिसको (देवासः) = सब प्राकृतिक शक्तियाँ, सूर्य, चन्द्र, पृथिवी, जल आदि (वाजसातौ) = शक्ति प्राप्ति के निमित्त अवथ-रक्षित करते हैं। सूर्यादि की अनुकूलता के होने पर शरीर की शक्ति बढ़ती है । [२] यह शरीररथ वह है (यम्) = जिसको (मरुतः) = प्राण (शूरसातौ) = इस संसार संग्राम में (हितेधने) = हितकर धन की प्राप्ति के निमित्त (अवथ) = रक्षित करते हैं । प्राणसाधना से हमारे शरीर, मन व बुद्धि की शक्तियाँ बढ़ती हैं, हम संसार - संग्राम में विजयी होते हैं और हितकर धनों को प्राप्त करनेवाले होते हैं। प्रत्येक कोश का धन पृथक्-पृथक् है, वह धन हमें इस प्राणसाधना से प्राप्त होता है। यह धन वेद के शब्दों में 'अन्नमयकोश का तेज, प्राणमयकोश का वीर्य, मनोमयकोश का ओज व बल, विज्ञानमयकोश का मन्यु-ज्ञान तथा आनन्दमयकोश का सहस्' है । प्राणसाधना से यह सब धन प्राप्त होता है। इस प्रकार हमारे इस शरीर रथ को सब देव सुरक्षित करते हैं और मरुत् इसे उत्कृष्ट धनों से परिपूर्ण करते हैं ।
भावार्थ
भावार्थ- हम इस शरीर को 'गतिमय, उपासनामय व स्वस्थ' बनायें। सब प्राकृतिक शक्तियों की अनुकूलता से यह स्वस्थ हो तथा प्राणसाधना से यह हितकर धनों से परिपूर्ण हो ।
संस्कृत (1)
पदार्थः
(मरुतः-देवासः) हे जीवन्मुक्ता विद्वांसः ! ‘मरुतो ह वै देवविशः’ [कौ० ७।८] (यं वाजसातौ) यममृतभोगप्राप्तौ “अमृतोऽन्नं वै वाजः” [जै० २।१९३] (यं शूरसाता) यं पापहिंसनप्राप्तौ (हिते धने) हितकरेऽध्यात्मधननिमित्ते (अवथ) रक्षथ (इन्द्र) हे परमात्मन् ! (प्रातर्यावाणं रथम्) जीवनस्य प्रातर्ब्रह्मचर्येण गमनशक्तिमन्तं रमणीयं (सानसिम्) शाश्वतं सुखरूपम् “सानसिं पुराणम्” [यजु० १२।११० दयानन्दः] (अरिष्यन्तम्) हिंसादोषरहितं (स्वस्तये-आरुहेम) कल्याणाय समन्तात् प्राप्नुयाम ॥१४॥
इंग्लिश (1)
Meaning
O Lord Almighty, Indra, O Maruts, vibrant and enlightened heroes of nature and humanity, let us ride that chariot of life, unhurt, inviolable and victorious, taking off early morning at dawn, which you protect in the battle of the brave when the action is on for the victory and attainment of food, energy, culture and advancement of all for the good life and well being all round. (The chariot here is the human body for the individual, and the social, economic and the organismic commonwealth of humanity on the political level.)
मराठी (1)
भावार्थ
जीवनमुक्त विद्वानांच्या संगतीत अमृत अन्न भोग प्राप्ती होते तेव्हा पापरहित शुद्ध वृत्ती संपादन करण्यासाठी विद्वानांचा उपदेश ग्रहण केला पाहिजे. परमात्मा पूर्ण ब्रह्मचर्ययुक्त असणाऱ्याला मुक्तिसुख प्रदान करतो. ॥१४॥
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