ऋग्वेद - मण्डल 10/ सूक्त 63/ मन्त्र 4
नृ॒चक्ष॑सो॒ अनि॑मिषन्तो अ॒र्हणा॑ बृ॒हद्दे॒वासो॑ अमृत॒त्वमा॑नशुः । ज्यो॒तीर॑था॒ अहि॑माया॒ अना॑गसो दि॒वो व॒र्ष्माणं॑ वसते स्व॒स्तये॑ ॥
स्वर सहित पद पाठनृ॒ऽचक्ष॑सः । अनि॑ऽमिषन्तः । अ॒र्हणा॑ । बृ॒हत् । दे॒वासः॑ । अ॒मृ॒त॒ऽत्वम् । आ॒न॒शुः॒ । ज्यो॒तिःऽर॑थाः । अहि॑ऽमायाः । अना॑गसः । दि॒वः । व॒र्ष्माण॑म् । व॒स॒ते॒ । स्व॒स्तये॑ ॥
स्वर रहित मन्त्र
नृचक्षसो अनिमिषन्तो अर्हणा बृहद्देवासो अमृतत्वमानशुः । ज्योतीरथा अहिमाया अनागसो दिवो वर्ष्माणं वसते स्वस्तये ॥
स्वर रहित पद पाठनृऽचक्षसः । अनिऽमिषन्तः । अर्हणा । बृहत् । देवासः । अमृतऽत्वम् । आनशुः । ज्योतिःऽरथाः । अहिऽमायाः । अनागसः । दिवः । वर्ष्माणम् । वसते । स्वस्तये ॥ १०.६३.४
ऋग्वेद - मण्डल » 10; सूक्त » 63; मन्त्र » 4
अष्टक » 8; अध्याय » 2; वर्ग » 3; मन्त्र » 4
Acknowledgment
अष्टक » 8; अध्याय » 2; वर्ग » 3; मन्त्र » 4
Acknowledgment
भाष्य भाग
हिन्दी (3)
पदार्थ
(देवासः) वे विद्वान् (नृचक्षसः) नरों के चेतानेवाले (अनिमिषन्तः) अपने कर्त्तव्यों में निमेष-अन्तर न करते हुए (अर्हणा) सर्वथा योग्य (बृहत्-अमृतत्वम्-आनशुः) महान् अमृत तत्त्व-मोक्षसुख को प्राप्त करते हैं (ज्योतिः-रथाः) ज्ञानप्रकाश में रमण जिनका है, वे (अहिमायाः) न हनन करने योग्य प्रज्ञावाले (अनागसः) पापरहित (दिवः-वर्ष्माणम्) मोक्ष के सुखवर्षक पद को (स्वस्तये वसते) कल्याण करने के लिए आच्छादन करते हैं ॥४॥
भावार्थ
अकुण्ठित बुद्धिवाले अपने कर्त्तव्यों में अन्तर न करनेवाले पापरहित होकर मोक्षसुख को प्राप्त करते हैं और संसार में भी कल्याण को, जो अपने ऊपर आच्छादित है ॥४॥
विषय
मोक्षसेवी ज्ञानी पुरुषों के लक्षण।
भावार्थ
(नृचक्षसः) समस्त मनुष्यों को ज्ञान का दर्शन कराने वाले सब के नेत्र के तुल्य, एवं सब को सूर्यकिरणवत् देखने वाले, (अनिमिषन्तः) कभी निमेष न करने वाले, सदा अप्रमादी, सावधान, (देवासः) तेजस्वी विद्वान् पुरुष, (अर्हणा) योग्य पूजा उपासना द्वारा ही (बृहत्) उस महान् (अमृतत्वम् आनशुः) अमृतमय पद, मोक्ष को प्राप्त करते हैं। वे (ज्योतिः-रथाः) ज्योतिर्मय बल वा रस को प्राप्त होकर वा तेजस्वी शरीर होकर (अहि-मायाः) अप्रतिहत बुद्धि, मेघ वा सूर्यवत् परोपकारक ज्ञान-प्रकाशक बुद्धि से युक्त और (अनागसः) निष्पाप होकर (दिवः) तेजोमय प्रभु के (वर्ष्माणं) परम स्थान को (स्वस्तये) सुख कल्याणार्थ (वसते) प्राप्त होते, उसी में रहते हैं।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
गयः प्लात ऋषिः। देवता—१—१४,१७ विश्वेदेवाः। १५, १६ पथ्यास्वस्तिः॥ छन्द:–१, ६, ८, ११—१३ विराड् जगती। १५ जगती त्रिष्टुप् वा। १६ आर्ची स्वराट् त्रिष्टुप्। १७ पादनिचृत् त्रिष्टुप्॥ सप्तदशर्चं सूक्तम्॥
विषय
अहीन-यज्ञ व निष्पाप
पदार्थ
[१] (नृचक्षसः) = सब मनुष्यों का ध्यान करनेवाले, केवल अपने स्वार्थ को न देखनेवाले, (अनिमिषन्तः) = प्रमाद व आलस्य न करनेवाले, (अर्हणा) = प्रभु अर्चना के द्वारा (बृहद् देवास:) = वर्धनशील देववृत्ति के पुरुष (अमृतत्वम्) = अमृतत्व को (आनशुः) = प्राप्त करते हैं। अमृतत्व की प्राप्ति के लिये आवश्यक है कि [क] हम केवल अपने लिये न जियें, [ख] प्रमाद व आलस्य से रहित हों, [ग] पूजा की वृत्ति को अपनाकर अपने में दिव्यगुणों का वर्धन करें। [२] (ज्योतीरथाः) = ज्योतिर्मय रथवाले, जिनका यह शरीर रथ ज्ञान के प्रकाश से प्रकाशित हो रहा है। (अहि मायाः) = अहीन प्रज्ञावाले, जिनकी बुद्धि में किसी प्रकार की न्यूनता नहीं । (अनागसः) = जिनका जीवन निष्पाप है । ऐसे ये व्यक्ति (दिवः वर्ष्माणम्) = द्युलोक के समुच्छ्रित प्रदेश में, अर्थात् ज्ञान के शिखर पर वसते-निवास करते हैं, ऊँच से ऊँचे ज्ञानी होते हैं। ये ज्ञानी पुरुष स्वस्तये उत्तम जीवन की स्थिति के लिये होते हैं।
भावार्थ
ये भावार्थ - ज्ञानी पुरुष केवल अपने लिये नहीं जीते। प्रभु-पूजन से दिव्यगुणों का वर्धन करके अमृतत्व को प्राप्त करते हैं। ये प्रकाशमय अहीनप्रज्ञ व निष्पाप होते हैं।
संस्कृत (1)
पदार्थः
(देवासः) ते विद्वांसः (नृचक्षसः) नराणां ख्यापकाः (अनिमिषन्तः) स्वकर्तव्येषु निमेषमन्तरं न कुर्वन्तः (अर्हणा) सर्वथा योग्याः “आकारादेशश्छान्दसः” (बृहत्-अमृतत्वम्-आनशुः) महदमृतत्वं मोक्षसुखं प्राप्नुवन्ति (ज्योतिः रथाः) ज्योतिषि ज्ञानप्रकाशे रमणं येषां ते (अहिमायाः) अहन्तव्यप्रज्ञाकाः (अनागसः) पापरहिताः (दिवः-वर्ष्माणम्) मोक्षस्य सुखवर्षकं पदं (स्वस्तये वसते) कल्याणकरणायाच्छादयन्ति ॥४॥
इंग्लिश (1)
Meaning
Ever watchful inspirers of humanity, active without a wink, adorable in their own right, mighty brilliant and generous, they attain to the freedom of immortality. They ride the chariot of light and, inviolable of might and free from sin and evil, they abide on top of heaven. May they come and bless our yajna for the good and all round well being of life. Serve them, exhilarate them, be grateful and rejoice.
मराठी (1)
भावार्थ
अकुंठित बुद्धीचे विद्वान, कर्तव्यदक्ष व पापरहित होऊन मोक्ष प्राप्त करतात. या जगातही ते कल्याणासाठी कार्यरत असतात. ॥४॥
Acknowledgment
Book Scanning By:
Sri Durga Prasad Agarwal
Typing By:
N/A
Conversion to Unicode/OCR By:
Dr. Naresh Kumar Dhiman (Chair Professor, MDS University, Ajmer)
Donation for Typing/OCR By:
N/A
First Proofing By:
Acharya Chandra Dutta Sharma
Second Proofing By:
Pending
Third Proofing By:
Pending
Donation for Proofing By:
N/A
Databasing By:
Sri Jitendra Bansal
Websiting By:
Sri Raj Kumar Arya
Donation For Websiting By:
Shri Virendra Agarwal
Co-ordination By:
Sri Virendra Agarwal