ऋग्वेद मण्डल - 4 के सूक्त 22 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 4/ सूक्त 22/ मन्त्र 1
    ऋषि: - वामदेवो गौतमः देवता - इन्द्र: छन्दः - निचृत्त्रिष्टुप् स्वरः - धैवतः
    पदार्थ -

    हे मनुष्यो ! (यत्) जो (इन्द्रः) अत्यन्त सुख का देनेवाला राजा (नः) हम लोगों की (जुजुषे) सेवा करता है (यत्, च) और जो (महान्) बड़ा ऐश्वर्यवाला (आ, वष्टि) कामना करता है (यः) जो (शुष्मी) अत्यन्त बलवान् (मघवा) अति उत्तम धनयुक्त राजा सूर्य्य (अश्मानम्) मेघ को जैसे वैसे (शवसा) बल से (ब्रह्म) बहुत धन वा अन्न (स्तोमम्) प्रशंसा करने योग्य (सोमम्) ओषधी आदि पदार्थसमूह से ऐश्वर्य्य और (उक्था) प्रशंसा करने योग्य वस्तुओं को (चित्) भी (बिभ्रत्) धारण करता हुआ राज्य को (एति) प्राप्त होता है (तत्) वह (नः) हम लोगों को सुख (करति) करता है, ऐसा जानो ॥१॥

    भावार्थ -

    इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! जैसे सूर्य्य मेघ को धारण करता और नाश करता है, वैसे ही जो राजा श्रेष्ठों को धारण करता और दुष्टों को दण्ड देता है, वही हम लोगों के पालन करने योग्य है ॥१॥

    अन्वय -

    हे मनुष्या ! यद्य इन्द्रो नो जुजुषे यद्यो महांश्चाऽऽवष्टि यः शुष्मी मघवा सूर्य्योऽश्मानमिव शवसा ब्रह्म स्तोमं सोममुक्था चिद्बिभ्रत् सन् राज्यमेति तत् स नस्सुखं करतीति विजानीत ॥१॥

    पदार्थ -

    (यत्) यः (नः) अस्मान् (इन्द्रः) परमसुखप्रदो राजा (जुजुषे) सेवते (यत्) यः (च) (वष्टि) कामयते (तत्) सः (नः) अस्मभ्यम् (महान्) (करति) कुर्य्यात् (शुष्मी) महाबलिष्ठः (आ) (चित्) अपि (ब्रह्म) महद्धनमन्नं वा (स्तोमम्) प्रशंसनीयम् (मघवा) परमपूजितधनः (सोमम्) ओषध्यादिगणैश्वर्य्यम् (उक्था) प्रशंसनीयानि वस्तूनि (यः) (अश्मानम्) मेघमिव राज्यम् (शवसा) बलेन (बिभ्रत्) धरन्त्सन् (एति) प्राप्नोति ॥१॥

    भावार्थ -

    अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। हे मनुष्या ! यथा सूर्य्यो मेघं धरति हन्ति च तथैव यो राजा श्रेष्ठान् दधाति दुष्टान् दण्डयति स एवाऽस्मान् पालयितुमर्हति ॥१॥

    भावार्थ -

    भावार्थ - या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. हे माणसांनो ! सूर्य जसा मेघाला धारण करतो व नाश करतो तसाच जो राजा श्रेष्ठांना धारण करतो व दुष्टांना दंड देतो तोच आमचे पालन करण्यायोग्य असतो. ॥ १ ॥

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