Loading...
ऋग्वेद मण्डल - 6 के सूक्त 17 के मन्त्र
1 2 3 4 5 6 7 8 9 10 11 12 13 14 15
मण्डल के आधार पर मन्त्र चुनें
अष्टक के आधार पर मन्त्र चुनें
  • ऋग्वेद का मुख्य पृष्ठ
  • ऋग्वेद - मण्डल 6/ सूक्त 17/ मन्त्र 13
    ऋषिः - भरद्वाजो बार्हस्पत्यः देवता - इन्द्र: छन्दः - स्वराट्पङ्क्ति स्वरः - पञ्चमः

    ए॒वा ता विश्वा॑ चकृ॒वांस॒मिन्द्रं॑ म॒हामु॒ग्रम॑जु॒र्यं स॑हो॒दाम्। सु॒वीरं॑ त्वा स्वायु॒धं सु॒वज्र॒मा ब्रह्म॒ नव्य॒मव॑से ववृत्यात् ॥१३॥

    स्वर सहित पद पाठ

    ए॒व । ता । विश्वा॑ । च॒कृ॒ऽवांस॑म् । इन्द्र॑म् । म॒हाम् । उ॒ग्रम् । अ॒जु॒र्यम् । स॒हः॒ऽदाम् । सु॒ऽवीर॑म् । त्वा॒ । सु॒ऽआ॒यु॒धम् । सु॒ऽवज्र॑म् । आ । ब्रह्म॑ । नव्य॑म् । अव॑से । व॒वृ॒त्या॒त् ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    एवा ता विश्वा चकृवांसमिन्द्रं महामुग्रमजुर्यं सहोदाम्। सुवीरं त्वा स्वायुधं सुवज्रमा ब्रह्म नव्यमवसे ववृत्यात् ॥१३॥

    स्वर रहित पद पाठ

    एव। ता। विश्वा। चकृऽवांसम्। इन्द्रम्। महाम्। उग्रम्। अजुर्यम्। सहःऽदाम्। सुऽवीरम्। त्वा। सुऽआयुधम्। सुऽवज्रम्। आ। ब्रह्म। नव्यम्। अवसे। ववृत्यात् ॥१३॥

    ऋग्वेद - मण्डल » 6; सूक्त » 17; मन्त्र » 13
    अष्टक » 4; अध्याय » 6; वर्ग » 3; मन्त्र » 3
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    पुना राजप्रजाजनाः कथं वर्त्तेयुरित्याह ॥

    अन्वयः

    हे राजन् ! यस्ता विश्वा चकृवांसं महामुग्रमजुर्य्यं सहोदां स्वायुधं सुवज्रं सुवीरमिन्द्रं त्वैवाऽवसे न्यायकरणायाऽऽववृत्यात् स नव्यं ब्रह्म वर्धयितुं शक्नुयात् ॥१३॥

    पदार्थः

    (एवा) (ता) तानि (विश्वा) सर्वाणि (चकृवांसम्) कुर्वन्तम् (इन्द्रम्) परमैश्वर्य्यवन्तं शत्रुविदारकं वा (महाम्) महान्तम् (उग्रम्) तेजस्विनम् (अजुर्य्यम्) अजीर्णम् (सहोदाम्) बलप्रदम् (सुवीरम्) उत्तमवीरावृतम् (त्वा) त्वाम् (स्वायुधम्) उत्तमायुधप्रक्षेपकुशलम् (सुवज्रम्) प्रशस्तवज्रास्त्रचालनसमर्थम् (आ) (ब्रह्म) महद्धनमन्नं वा (नव्यम्) नवेषु भवम् (अवसे) रक्षणाद्याय (ववृत्यात्) वर्त्तयेत् ॥१३॥

    भावार्थः

    पितृवत्प्रजापालकं धनुर्वेदराजनीतियुद्धविद्याकुशलं राजानं सर्वे वर्धयन्तु तथैतानयं राजा सततं वर्धयेत् ॥१३॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    हिन्दी (3)

    विषय

    फिर राजा और प्रजाजन कैसा वर्त्ताव करें, इस विषय को कहते हैं ॥

    पदार्थ

    हे राजन् ! जो (ता) उन (विश्वा) सम्पूर्णों को और (चकृवांसम्) करते हुए (महाम्) बड़े (उग्रम्) तेजस्वी (अजुर्य्यम्) नहीं जीर्ण हुए (सहोदाम्) बल के देनेवाले (स्वायुधम्) उत्तम शस्त्र के चलाने में चतुर (सुवज्रम्) प्रशस्त वज्ररूप अस्त्र के चलाने में समर्थ (सुवीरम्) उत्तमवीरों से युक्त (इन्द्रम्) अत्यन्त ऐश्वर्य्यवाले शत्रु के नाशक (त्वा) आपको (एवा) ही (अवसे) रक्षण आदि के लिये और न्याय करने के लिये (आ, ववृत्यात्) सब ओर से वर्त्ताव करे वह (नव्यम्) नवीनों में हुए (ब्रह्म) बड़े धन वा अन्न को बढ़ाने को समर्थ होवे ॥१३॥

    भावार्थ

    पिता के सदृश प्रजाओं के पालन, धनुर्वेद, राजनीति और युद्धविद्या में कुशल राजा की सब लोग वृद्धि करें और इन लोगों की यह राजा निरन्तर वृद्धि करे ॥१३॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    विषय

    ऐसे राजा का वरण ।

    भावार्थ

    ( एव ) इस प्रकार ( ता विश्वा ) उन २ समस्त कर्मों को ( चक्रवांसम् ) करते हुए, ( इन्द्रम् ) ऐश्वर्य युक्त, ( महाम् ) महान्, ( उग्रम् ) उग्र, बलवान्, (अजुर्यम्) बुढ़ापे से रहित, सदा युवा, (सहोदाम् ) बलप्रद ( सुवीरं ) उत्तम वीर, ( स्वायुधम् ) उत्तम शस्त्रास्त्र से सम्पन्न, पुरुष को प्रजा ( अवसे ) रक्षा, पालन और ऐश्वर्य प्राप्ति के लिये ( आववृत्यात् ) सब प्रकार से प्राप्त करे और वह ( नव्यम् ) उत्तम से उत्तम ( ब्रह्म ) महान्, बल, धन और अन्नादि को प्राप्त करे ।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    भरद्वाजो बार्हस्पत्य ऋषिः ।। इन्द्रो देवता ॥ छन्दः -१ , २, ३, ४, ११ त्रिष्टुप् । ५, ६, ८ विराट् त्रिष्टुप् । ७, ९, १०, १२, १४ निचृत्त्रिष्टुप् । १३ स्वराट् पंक्ति: । १५ आच् र्युष्णिक् ।।

    इस भाष्य को एडिट करें

    विषय

    स्तवन के द्वारा रक्षण

    पदार्थ

    [१] हे प्रभो ! (एवा) = इस प्रकार (ता विश्वा) = ऊपर के मन्त्रों में वर्णित उन प्रसिद्ध सब कर्मों को (चकृवांसम्) = करनेवाले (इन्द्रम्) = परमैश्वर्यशाली आपको हमारे से अपनाया गया यह (नव्यं ब्रह्म) = स्तुत्य ज्ञानपूर्वक किया गया स्तोत्र [स्तवन] (आववृत्यात्) = हमारे अभिमुख करे। हम इन स्तोत्रों के द्वारा आपको प्राप्त करनेवाले हों, और इस प्रकार अवसे रक्षण के लिए हों, आपके द्वारा हम इन वासनारूप शत्रुओं के आक्रमण से बचे रहें। [२] उन आपको हम अपने अभिमुख कर पाएँ, जो आप (महाम्) = महान् हैं, (उग्रम्) = तेजस्वी हैं, (अजुर्यम्) = कभी न जीर्ण होनेवाले हैं और (सहोदाम्) = बल को देनेवाले हैं। जो आप (सुवीरम्) = उत्तम वीर हैं उन (त्वा) = आपको हम अपने अभिमुख करें जो (स्वायुधम्) = उत्तम 'इन्द्रिय प्रनव बुद्धि' रूप आयुधों को देनेवाले हैं तथा (सुवज्रम्) = उत्तम क्रियाशीलतारूप वज्र को प्राप्त कराते हैं [शोभनम् वज्रं यस्मात्] ।

    भावार्थ

    भावार्थ- स्तवन द्वारा हम प्रभु को प्राप्त करें। ये प्रभु हमें बल, उत्तम इन्द्रियाँ, मन व बुद्धि को प्राप्त कराएँगे। इनके द्वारा वे हमें रक्षण के योग्य बनाते हैं ।

    इस भाष्य को एडिट करें

    मराठी (1)

    भावार्थ

    पित्याप्रमाणे प्रजेचा पालक, धनुर्वेद, राजनीती व युद्धविद्येत कुशल राजाची वृद्धी सर्व लोकांनी करावी व त्यांचीही राजाने वृद्धी करावी. ॥ १३ ॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    इंग्लिश (2)

    Meaning

    Thus may our new homage of praise, prayer and yajnic service reach Indra, omnipotent lord of the universe, absolute doer of all actions, mighty, refulgent, unaging and imperishable, giver of strength and forbearance, commander of heroes, all armed and wielder of the thunderbolt of nature’s cyclic energy, and may our prayer move the lord for our protection and progress.

    इस भाष्य को एडिट करें

    Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]

    How should the kings and their subjects deal with one another is told.

    Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]

    O king ! who is very prosperous or destroyer of enemies, that man who deals with you (approaches you) and who makes all necessary arrangements, are great. They are full of splendor, young (not old), giver of strength, surrounded by many good heroes; expert in wielding good weapons or well armed hero, able to use thunderbolt like powerful arms, for protection and justice, can multiply great wealth or good materials.

    Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]

    N/A

    Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]

    All should always strengthen the hands of a king who is protector of the subjects like their own father and who is expert in the science of archery, politics and military science.

    Foot Notes

    (इन्द्रम्) परमेश्वर्यवन्तं शत्रुविदारकं वा । इदि-परमेश्वर्ये (भ्वा०) इन्द्रम् शत्रूणां दारयिता वा द्रखयिता वेति (NKT 7, 10, 1, 8) = Endowed with much wealth of destroyer of the enemies. (ब्रह्मा) महत् धनम् अन्नं वा । ब्रह्म इति धननाम (NG 2, 10) ब्रह्म इति अन्ननाम (NG 2, 7) = Great wealth or food.

    इस भाष्य को एडिट करें
    Top