ऋग्वेद - मण्डल 6/ सूक्त 17/ मन्त्र 7
ऋषिः - भरद्वाजो बार्हस्पत्यः
देवता - इन्द्र:
छन्दः - निचृत्त्रिष्टुप्
स्वरः - धैवतः
प॒प्राथ॒ क्षां महि॒ दंसो॒ व्यु१॒॑र्वीमुप॒ द्यामृ॒ष्वो बृ॒हदि॑न्द्र स्तभायः। अधा॑रयो॒ रोद॑सी दे॒वपु॑त्रे प्र॒त्ने मा॒तरा॑ य॒ह्वी ऋ॒तस्य॑ ॥७॥
स्वर सहित पद पाठप॒प्राथ॑ । क्षाम् । महि॑ । दंसः॑ । वि । उ॒र्वीम् । उप॑ । द्याम् । ऋ॒ष्वः । बृ॒हत् । इ॒न्द्र॒ । स्त॒भा॒यः॒ । अधा॑रयः । रोद॑सी॒ इति॑ । दे॒वपु॑त्रे॒ इति॑ दे॒वऽपु॑त्रे । प्र॒त्ने इति॑ । मा॒तरा॑ । य॒ह्वी इति॑ । ऋ॒तस्य॑ ॥
स्वर रहित मन्त्र
पप्राथ क्षां महि दंसो व्यु१र्वीमुप द्यामृष्वो बृहदिन्द्र स्तभायः। अधारयो रोदसी देवपुत्रे प्रत्ने मातरा यह्वी ऋतस्य ॥७॥
स्वर रहित पद पाठपप्राथ। क्षाम्। महि। दंसः। वि। उर्वीम्। उप। द्याम्। ऋष्वः। बृहत्। इन्द्र। स्तभायः। अधारयः। रोदसी इति। देवपुत्रे इति देवऽपुत्रे। प्रत्ने इति। मातरा। यह्वी इति। ऋतस्य ॥७॥
ऋग्वेद - मण्डल » 6; सूक्त » 17; मन्त्र » 7
अष्टक » 4; अध्याय » 6; वर्ग » 2; मन्त्र » 2
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अष्टक » 4; अध्याय » 6; वर्ग » 2; मन्त्र » 2
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भाष्य भाग
संस्कृत (1)
विषयः
पुनस्तमेव विषयमाह ॥
अन्वयः
हे इन्द्र ! यथा सूर्य्यो महि दंस उर्वी क्षां द्याञ्च व्युप पप्राथ ऋष्वः सन् बृहत् स्तभायस्तथा त्वं प्राहि यथायं सूर्य्य ऋतस्य जाते देवपुत्रे प्रत्ने मातरा यह्वी रोदसी धारयति तथा त्वमधारयः ॥७॥
पदार्थः
(पप्राथ) प्राति पूरयति (क्षाम्) भूमिम् (महि) महत् (दंसः) कर्म्म (वि) (उर्वीम्) विस्तृताम् (उप) (द्याम्) प्रकाशम् (ऋष्वः) महान् (बृहत्) (इन्द्र) सूर्य इवैश्वर्य्यकारक (स्तभायः) स्तभ्नाति (अधारयः) धारयसि (रोदसी) भूमिसूर्य्यलोकौ (देवपुत्रे) देवानां विदुषां पुत्र इव वर्त्तमाने (प्रत्ने) पुरातन्यौ (मातरा) मातृवन्मान्यकर्त्र्यौ (यह्वी) महत्यौ (ऋतस्य) सत्यस्य कारणस्य सकाशात् ॥७॥
भावार्थः
अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। हे मनुष्या ! यथा सूर्य्यो भूगोलान् धृत्वा पितृवत्सर्वाः प्रजाः पालयति तथैव यूयमत्र वर्त्तध्वम् ॥७॥
हिन्दी (3)
विषय
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥
पदार्थ
हे (इन्द्र) सूर्य्य के सदृश ऐश्वर्य्य करनेवाले ! जैसे सूर्य्य (महि) बड़े (दंसः) कर्म्म को (उर्वीम्) विस्तृत (क्षाम्) भूमि को और (द्याम्) प्रकाश को (वि, उप, पप्राथ) विशेष कर समीप में पूरित करता है और (ऋष्वः) बड़ा महात्मा जन (बृहत्) बड़े को (स्तभाय) स्तम्भित करता है, वैसे आप पूरित कीजिये और जैसे यह सूर्य्य (ऋतस्य) सत्य कारण के समीप से प्रकट हुए (देवपुत्रे) विद्वानों के पुत्र के समान वर्त्तमान (प्रत्ने) प्राचीन (मातरा) माता के सदृश आदर करनेवाले (यह्वी) बड़े (रोदसी) भूमि और सूर्य्य लोक को धारण करता है, वैसे आप (अधारयः) धारण करते हो ॥७॥
भावार्थ
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! जैसे सूर्य्य भूगोलों को धारण करके पिता के सदृश सम्पूर्ण प्रजाओं का पालन करता है, वैसे ही आप लोग यहाँ वर्त्ताव करो ॥७॥
विषय
बृहत् सैन्य धारण और प्रजा के शासन का उपदेश ।
भावार्थ
हे ( इन्द्र ) राजन् ! आप (महि दंसः ) बड़े भारी कर्मकौशल से ( उर्वीम् क्षां पप्राथ ) बड़ी भारी भूमि को विविध ऐश्वर्यों से पूर्ण करो और आप ( ऋण्वः ) महान् होकर (उर्वी द्याम् ) बड़ी भारी ज्ञानप्रकाश से युक्त राजसभा को वा शत्रु विजय करने वाली सेना को और (बृहत् ) बड़े भारी राज्य को भी ( उप स्तभायः ) थाम । (ऋतस्य) सत्य न्याय के बल पर ( यह्वीः ) बड़ी, वा अपने पुत्रों के समान (मातरा ) सबकी माता, पिता के तुल्य माननीय, ( प्रत्ने ) सनातन से विद्यमान, ( देवपुत्रे ) विद्वान्, बलवान् उत्तम पुरुषों को पुत्रवत् उत्पन्न करने चाली, ( रोदसी) सूर्य और पृथ्वी के तुल्य परस्पर सम्बद्ध स्त्री पुरुषों तथा राज प्रजावर्ग दोनों को तू ( अधारयः ) धारण कर । ( २ ) हे परमेश्वर तू महान् है । तू अपने बड़े सामर्थ्य से (ऊर्वी: द्यां क्षां पप्राथ ) भूमि और आकाश को रचता और थामता है । ( देवपुत्रे ) तेजस्वी सूर्यादि के भी उत्पादक, सनातन से मातृ पितृवत् जगत् के उत्पादक आकाश भूमि को भी धारण करता है ।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
भरद्वाजो बार्हस्पत्य ऋषिः ।। इन्द्रो देवता ॥ छन्दः -१ , २, ३, ४, ११ त्रिष्टुप् । ५, ६, ८ विराट् त्रिष्टुप् । ७, ९, १०, १२, १४ निचृत्त्रिष्टुप् । १३ स्वराट् पंक्ति: । १५ आच् र्युष्णिक् ।।
विषय
उर्वीक्षा, बृहत् द्यौः
पदार्थ
[१] हे (इन्द्र) = परमैश्वर्यशालिन् प्रभो! आप (उर्वी क्षाम्) = विशाल पृथिवी को, इस पृथिवीरूप शरीर को (पप्राथ) = विस्तृत करते हो। इस शरीर के द्वारा (महि दंस:) [ पप्राथ] = महत्त्वपूर्ण कार्यों को भी आप ही करते हो । (ऋष्वः) = महान् आप ही (बृहत् द्याम्) = इस विशाल द्युलोक को, मस्तिष्करूपी द्युलोक को (उपस्तभायः) = थामते हैं। मस्तिष्क का धारण भी आप ही करते हैं । [२] हे प्रभो! इस प्रकार (रोदसी) = इन द्यावापृथिवी को आप ही (अधारयः) = धारण करते हैं, हमारे शरीरों व मस्तिष्कों का धारण करनेवाले आप ही हैं। उन द्यावापृथिवी को, जो (देवपुत्रे) = दिव्य गुणों के जन्म देनेवाले हैं, देव जिनके पुत्र हैं। (प्रत्ने) = जो पुराण हैं, चिरकाल तक रहनेवाले हैं। (यह्वी) = महान् महत्त्वपूर्ण कार्यों को करनेवाले हैं और (ऋतस्य मातरः) = हमारे जीवन में यज्ञों का निर्माण करनेवाले हैं, अर्थात् उत्तम कर्मों को सिद्ध करनेवाले हैं।
भावार्थ
भावार्थ– प्रभु हमारे मस्तिष्क रूप द्युलोक शरीररूप पृथिवी को इस प्रकार धारण करते हैं कि ये दिव्य गुणों व यज्ञों को सिद्ध करते हुए दीर्घकाल तक सुरक्षित रहते हैं ।
मराठी (1)
भावार्थ
या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. हे माणसांनो ! जसा सूर्य भूगोलांना धारण करून पित्याप्रमाणे संपूर्ण प्रजेचे पालन करतो तसे तुम्ही लोक वागा. ॥ ७ ॥
इंग्लिश (2)
Meaning
Indra, almighty lord of glorious action and potential, you create, pervade and sustain the wide earth and heaven and you sustain, support and order the compact earth, heaven and the expansive universe, and you sustain the compact earth, firmament and the solar sphere, ancient, great and generous mothers of the children of divinity and themselves the children of mother Prakrti and the divine law of nature.
Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]
The theme of men's duties is further developed.
Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]
O sun-like king ! causer of prosperity, the sun does a marvelous act by filling the vast earth and the heaven with its light. It being very great, upholds great worlds, so you should fill all with the light of knowledge. As the sun upholds the old earth add heaven which are born of true cause-matter, and are like the children of the enlightened men, and are like mothers, so you should also uphold all.
Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]
N/A
Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]
O men! as the sun upholds the worlds and supports all like the father, so you should also behave.
Foot Notes
(क्षाम्) भूमिम् । क्षा इति पृथिवोनाम (NG 1, 1)। = Earth. (यह्वी) महत्यौ । यह्न इति महन्नाम (NG 3, 3 ) = Great. (ऋष्वः) महान् । ऋष्व इति महन्नाम (NG 3, 3) = Great saint.
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