ऋग्वेद मण्डल - 7 के सूक्त 59 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 7/ सूक्त 59/ मन्त्र 1
    ऋषि: - वसिष्ठः देवता - मरुतः छन्दः - निचृद्बृहती स्वरः - मध्यमः
    पदार्थ -

    हे (मरुतः) प्राणों के सदृश अग्रणी (देवासः) विद्वान् ! आप लोग (इदमिदम्) इस-इस वचन को सुनाय के वा कर्म करके (यम्) जिसको (नयथ) प्राप्त कराइये (यम्, च) और जिस मनुष्य की (त्रायध्वे) रक्षा करें (तस्मै) उसके लिये (शर्म) सुख वा गृह (यच्छत) दीजिये और हे (अग्ने) अग्नि के समान तेजस्वी (वरुण) श्रेष्ठ (मित्र) मित्र (अर्यमन्) न्यायकारी ! आप इन्हीं की सदा सेवा करिये ॥१॥

    भावार्थ -

    हे विद्वान् जनो ! आप लोग सत्य उपदेश, उत्तम शिक्षा और विद्या दान से सब मनुष्यों की उत्तम प्रकार रक्षा करके वृद्धि करिये, जिससे सब सुखी होवें ॥१॥

    अन्वय -

    हे मरुतो देवासो ! यूयमिदमिदं यन्नयथ यं च त्रायध्ये तस्मै शर्म यच्छत, हे अग्ने वरुण मित्रार्यमँस्त्वमेतानेव सदा सेवस्व ॥१॥

    पदार्थ -

    (यम्) (त्रायध्वे) रक्षथ (इदमिदम्) वचनं श्रावयिता कर्म कृत्वा वा (देवासः) प्राणा इव विद्वांसः (यम्) नरम् (च) (नयथ) प्रापयथ (तस्मै) (अग्ने) (वरुण) श्रेष्ठ (मित्र) सखे (अर्यमन्) न्यायकारिन् (मरुतः) प्राण इव नेतारः (शर्म) सुखं गृहं वा (यच्छत) दत्त ॥१॥

    भावार्थ -

    हे विद्वांसो ! भवन्तस्सत्योपदेशसुशिक्षाविद्यादानेन सर्वान् मनुष्यान् सम्यग्रक्षित्वा वर्धन्तु येन सर्वे सुखिनः स्युः ॥१॥

    भावार्थ -

    भावार्थ - हे विद्वानांनो ! तुम्ही सत्य उपदेश, उत्तम शिक्षण व विद्यादानाने सर्व माणसांचे उत्तम प्रकारे रक्षण करून उन्नती करा. ज्यामुळे सर्व सुखी व्हावेत. ॥ १ ॥

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