Loading...
ऋग्वेद मण्डल - 9 के सूक्त 71 के मन्त्र
1 2 3 4 5 6 7 8 9
मण्डल के आधार पर मन्त्र चुनें
अष्टक के आधार पर मन्त्र चुनें
  • ऋग्वेद का मुख्य पृष्ठ
  • ऋग्वेद - मण्डल 9/ सूक्त 71/ मन्त्र 7
    ऋषिः - ऋषभो वैश्वामित्रः देवता - पवमानः सोमः छन्दः - विराड्जगती स्वरः - निषादः

    परा॒ व्य॑क्तो अरु॒षो दि॒वः क॒विर्वृषा॑ त्रिपृ॒ष्ठो अ॑नविष्ट॒ गा अ॒भि । स॒हस्र॑णीति॒र्यति॑: परा॒यती॑ रे॒भो न पू॒र्वीरु॒षसो॒ वि रा॑जति ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    परा॑ । विऽअ॑क्तः । अ॒रु॒षः । दि॒वः । क॒विः । वृषा॑ । त्रि॒ऽपृ॒ष्ठः । अ॒न॒वि॒ष्ट॒ । गाः । अ॒भि । स॒हस्र॑ऽनीतिः । यतिः॑ । प॒रा॒ऽयतिः॑ । रे॒भः । न । पू॒र्वीः । उ॒षसः॑ । वि । रा॒ज॒ति॒ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    परा व्यक्तो अरुषो दिवः कविर्वृषा त्रिपृष्ठो अनविष्ट गा अभि । सहस्रणीतिर्यति: परायती रेभो न पूर्वीरुषसो वि राजति ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    परा । विऽअक्तः । अरुषः । दिवः । कविः । वृषा । त्रिऽपृष्ठः । अनविष्ट । गाः । अभि । सहस्रऽनीतिः । यतिः । पराऽयतिः । रेभः । न । पूर्वीः । उषसः । वि । राजति ॥ ९.७१.७

    ऋग्वेद - मण्डल » 9; सूक्त » 71; मन्त्र » 7
    अष्टक » 7; अध्याय » 2; वर्ग » 26; मन्त्र » 2
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    पदार्थः

    (अरुषः) प्रकाशस्वरूपः (वृषा) आनन्दवर्षकः (कविः) सर्वज्ञः (व्यक्तः) स्फुटः परमात्मा (दिवः परा) द्युलोकादपि परोऽस्ति। तथा (त्रिपृष्ठः) त्रिकालज्ञः परमात्मा (गाः) उपासनारूपा वाणीः (अभि) अभिलक्ष्य (अन्विष्ट) स्थिरोऽस्ति। अथ स परमेश्वरः (सहस्रणीतिः) अनन्तशक्तिमानस्ति। तथा (यतिः) लोकमर्यादाहेतुरस्ति। तथा (परायतिः) सर्वत्र व्याप्तोऽस्ति। परमात्मा (पूर्वी उषसः) अनादिषूषस्सु (रेभो न) प्रकाशमानः सूर्य इव (विराजति) विराजमानोऽस्ति ॥७॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    हिन्दी (3)

    पदार्थ

    (अरुषः) प्रकाशस्वरूप (वृषा) आनन्द का वर्षक (कविः) सर्वज्ञ (व्यक्तः) स्फुट परमात्मा (दिवः परा) द्युलोक से भी परे है। तथा (त्रिपृष्ठः) त्रिकालज्ञ परमात्मा (गाः) उपासनारूपी वाणी को (अभि) लक्ष्य करके (अन्विष्ट) स्थिर है और वह परमेश्वर (सहस्रणीतिः) अनन्त शक्तिवाला है और (यतिः) लोकमर्यादा का हेतु और (परायतिः) सर्वत्र व्याप्त है। परमात्मा (पूर्वी उषसः) अनादिकाल की उषाओं में (रेभो न) प्रकाशमान सूर्य के समान (विराजति) विराजमान है ॥७॥

    भावार्थ

    अनादिकाल से परमात्मा अनेक उषःकालों को प्रकाशित करता हुआ सर्वत्र विद्यमान है ॥७॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    विषय

    राष्ट्र-शासकवत् सर्वेश्वर प्रभु का वर्णन। उसका अनादि शासन।

    भावार्थ

    वह सर्व जगत् का शासक, राष्ट्र शासक के समान ही (अरुषः) रोषरहित, वा तेजस्वी, (कविः) क्रान्तदर्शी, (दिवः) आकाश और भूमि पर सूर्य और अग्नि के तुल्य (परा) दूर २ तक (वि-अक्तः) विविध तेजों से प्रकाशित होने वाला, (त्रि-पृष्ठः) तीनों लोकों को पोषण करने वाला, (वृषा) बलवान्, प्रजाओं पर सुखों की मेघवत् वर्षा करने वाला, उत्तम प्रबन्धक, होकर (गाः अभि अनविष्ट) वाणियों, आज्ञाओं को प्रदान करता है। वह (सहस्र-नीतिः) सहस्रों बलवान् नीतियों वा सहस्रों नेत्रों वाला, (यतिः) सर्वनियन्ता, यत्नवान्, (परायतिः) सबका परम प्राप्य स्थान, परायण है। वह (रेभः न) उपदेष्टा के समान (पूर्वीः उषसः) पूर्व के उषा कालों में भी सूर्यवत् पूर्ण समृद्ध, पाप-शत्रु आदि के दाहक शक्तियों को प्राप्त करके राजा के तुल्य अनादि कालों से (विराजति) प्रकाशित है।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    ऋषभो वैश्वामित्र ऋषिः। पवमानः सोमो देवता॥ छन्द:- १, ४, ७ विराड् जगती। २ जगती। ३, ५, ८ निचृज्जगती। ६ पादनिचृज्जगती। ९ विराट् त्रिष्टुप्॥ नवर्चं सूक्तम्॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    विषय

    यतिः परायतिः

    पदार्थ

    [१] सोम का रक्षण करनेवाला पुरुष (परा व्यक्तः) = पराविद्या [आत्मविद्या] से अलंकृत हुआ हुआ (अरुचः) = आरोचमान होता है । (दिवः कविः) = ज्ञान के द्वारा क्रान्तदर्शी बना हुआ, वस्तुतत्त्वों को देखनेवाला और अतएव उनमें न फँसनेवाला, (वृषा) = शक्तिशाली होता है। (त्रिपृष्ठः) = 'ऋग् यजु साम' रूप तीन आधारोंवाला (गाः अभि) = वेदवाणी रूप गौओं की ओर (अनविष्ट) = [ नव् गतौ] गतिवाला होता है। [२] (सहस्राणीतिः) = आनन्दमय प्रभु की ओर अपने को ले चलनेवाला, (यतिः) = संयमी, (परायतिः) = विषयों से दूर जानेवाला (रेभः न) = एक स्तोता के समान (पूर्वीः उषसः) = बहुत ही प्रात: प्रात: [ early in the morning] (विराजति) = अपने जीवन को व्यवस्थित करने में लगता है [regulates]। प्रातः काल उठकर अपने नित्य कृत्यों में प्रवृत्त हो जाता है।

    भावार्थ

    भावार्थ- सोमरक्षक पुरुष उत्कृष्ट ज्ञानवाला, विषयों में न फँसा हुआ, ज्ञान- प्रवण व संयमी होता है । यह बहुत ही उषाकाल में प्रबुद्ध होकर अपने नित्य कर्मों में प्रवृत्त हो जाता है ।

    इस भाष्य को एडिट करें

    इंग्लिश (1)

    Meaning

    The divine Soma Spirit of peace and power self- refulgent beyond the lights of heaven, omniscient creator, omnificent giver, visionary and watchful over the three orders of time and space, delights in the songs of adoration as a committed listener. It is omnipotent guide over a thousand ways, immanent and transcendent, and rules and illuminates the eternal dawns of light and vision like the sun.

    इस भाष्य को एडिट करें

    मराठी (1)

    भावार्थ

    अनादि काळापासून परमात्मा अनेक उष:कालांना प्रकाशित करत सर्वत्र विद्यमान आहे. ॥७॥

    इस भाष्य को एडिट करें
    Top