यजुर्वेद - अध्याय 30/ मन्त्र 16
ऋषिः - नारायण ऋषिः
देवता - राजेश्वरौ देवते
छन्दः - विराट् कृतिः
स्वरः - निषादः
171
सरो॑भ्यो धैव॒रमु॑प॒स्थाव॑राभ्यो॒ दाशं॑ वैश॒न्ताभ्यो॑ बै॒न्दं न॑ड्व॒लाभ्यः॒ शौष्क॑लं पा॒राय॑ मार्गा॒रम॑वा॒राय॑ के॒वर्त्तं॑ ती॒र्थेभ्य॑ऽआ॒न्दं विष॑मेभ्यो मैना॒ल स्वने॑भ्यः॒ पर्ण॑कं॒ गुहा॑भ्यः॒ किरा॑त॒ꣳ सानु॑भ्यो॒ जम्भ॑कं॒ पर्व॑तेभ्यः किम्पूरु॒षम्॥१६॥
स्वर सहित पद पाठसरो॑भ्य॒ इति॒ सरः॑ऽभ्यः। धै॒व॒रम्। उ॒प॒स्थाव॑राभ्य॒ इत्यु॑प॒ऽस्थाव॑राभ्यः। दाश॑म्। वै॒श॒न्ताभ्यः॑। बै॒न्दम्। न॒ड्व॒लाभ्यः॑। शौष्क॑लम्। पा॒राय॑। मा॒र्गा॒रम्। अ॒वा॒राय॑। कै॒वर्त्त॑म्। ती॒र्थेभ्यः॑। आ॒न्दम्। विष॑मेभ्य॒ इति॒ विऽस॑मेभ्यः। मै॒ना॒लम्। स्वने॑भ्यः। पर्ण॑कम्। गुहा॑भ्यः। किरा॑तम्। सानु॑भ्य॒ इति॒ सानु॑ऽभ्यः। जम्भ॑कम्। पर्व॑तेभ्यः। कि॒म्पू॒रु॒षम्। कि॒म्पु॒रु॒षमिति॑ किम्ऽपुरु॒षम् ॥१६ ॥
स्वर रहित मन्त्र
सरेभ्यो धैवरमुपस्थावराभ्यो दाशँ वैशन्ताभ्यो बैन्दन्नड्वलाभ्यः शौष्कलम्पाराय मार्गारमवराय कैवर्तन्तीतीर्थेभ्यऽआन्दँविषमेभ्यो मैनालँ स्वनेभ्यः पर्णकङ्गुहाभ्यः किरातँ सानुभ्यो जम्भकम्पर्वतेभ्यः किम्पूरुषम् ॥
स्वर रहित पद पाठ
सरोभ्य इति सरःऽभ्यः। धैवरम्। उपस्थावराभ्य इत्युपऽस्थावराभ्यः। दाशम्। वैशन्ताभ्यः। बैन्दम्। नड्वलाभ्यः। शौष्कलम्। पाराय। मार्गारम्। अवाराय। कैवर्त्तम्। तीर्थेभ्यः। आन्दम्। विषमेभ्य इति विऽसमेभ्यः। मैनालम्। स्वनेभ्यः। पर्णकम्। गुहाभ्यः। किरातम्। सानुभ्य इति सानुऽभ्यः। जम्भकम्। पर्वतेभ्यः। किम्पूरुषम्। किम्पुरुषमिति किम्ऽपुरुषम्॥१६॥
भाष्य भाग
संस्कृत (1)
विषयः
पुनस्तमेव विषयमाह॥
अन्वयः
हे जगदीश्वर राजन् वा! त्वं सरोभ्यो धैवरमुपस्थावराभ्यो दाशं वैशन्ताभ्यो बैन्दं नड्वलाभ्यः शौष्कलं विषमेभ्यो मैनालमवाराय कैवर्त्तं तीर्थेभ्य आन्दमासुव। पाराय मार्गारं स्वनेभ्यः पर्णकं गुहाभ्यः किरातं सानुभ्यो जम्भकं पर्वतेभ्यः किम्पूरुषं परासुव॥१६॥
पदार्थः
(सरोभ्यः) तडागेभ्यस्तारणाय (धैवरम्) धीवरस्यापत्यम् (उपस्थावराभ्यः) उपस्थिताभ्योऽवराभ्यो निकृष्टक्रियाभ्यः (दाशम्) दाशत्यस्मै तम् (वैशन्ताभ्यः) वेशन्ता अल्पजलाशयास्ता एव ताभ्यः (बैन्दम्) निषादस्यापत्यम् (नड्वलाभ्यः) नडा विद्यन्ते यासु भूमिषु ताभ्यः (शौष्कलम्) यश्शुष्कलैर्मत्स्यैर्जीवति तम् (पाराय) मृगकर्मसमाप्त्यर्थं प्रवृत्तम् (मार्गारम्) यो मृगाणामरिर्व्याधस्तस्यापत्यम् (अवाराय) अर्वाचीनमागमनाय (कैवर्त्तम्) जले नौकायाः परावरयोर्गमकम् (तीर्थेभ्यः) तरन्ति यैस्तीर्यन्ते वा तेभ्यः (आन्दम्) बन्धितारम् (विषमेभ्यः) विकटदेशेभ्यः (मैनालम्) यो मैनं कामदेवमलति वारयति तं जितेन्द्रियम् (स्वनेभ्यः) शब्देभ्यः (पर्णकम्) यः पर्णेषु पालनेषु कुत्सितस्तम् (गुहाभ्यः) कन्दराभ्यः (किरातम्) जनविशेषम् (सानुभ्यः) शैलशिखरेभ्यः (जम्भकम्) यो जम्भयति नाशयति तम् (पर्वतेभ्यः) गिरिभ्यः (किम्पूरुषम्) जाङ्गलं कुत्सितं मनुष्यम्॥१६॥
भावार्थः
मनुष्या ईश्वरगुणकर्मस्वभावानुकूलैः कर्मभिर्धीवरादीन् संरक्ष्य व्याधादीन् परित्यज्योत्तमं सुखं प्राप्नुवन्तु॥१६॥
हिन्दी (3)
विषय
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है॥
पदार्थ
हे जगदीश्वर वा राजन्! आप (सरोभ्यः) बड़े तालाबों के लिए (धैवरम्) धीवर के लड़के को (उपस्थावराभ्यः) समीपस्थ निकृष्ट क्रियाओं के अर्थ (दाशम्) जिसको दिया जावे उस सेवक को (वैशन्ताभ्यः) छोटे-छोटे जलाशयों के प्रबन्ध के लिए (बैन्दम्) निषाद के अपत्य को (नड्वलाभ्यः) नरसल वाली भूमि के लिए (शौष्कलम्) मच्छियों से जीवने वाले को और (विषमेभ्यः) विकट देशों के लिए (मैनालम्) कामदेव को रोकने वाले को (अवाराय) अपनी ओर आने के लिए (कैवर्त्तम्) जल में नौका को इस पार उस पार पहुंचाने वाले को (तीर्थेभ्यः) तरने के साधनों के लिए (आन्दम्) बांधने वाले को उत्पन्न कीजिए (पाराय) हरिण आदि की चेष्टा को समाप्त करने को प्रवृत्त हुए (मार्गारम्) व्याध के पुत्र को (स्वनेभ्यः) शब्दों के लिए (पर्णकम्) रक्षा करने में निन्दित भील को (गुहाभ्यः) गुहाओं के अर्थ (किरातम्) बहेलिये को (सानुभ्यः) शिखरों पर रहने के लिए प्रवृत्त हुए (जम्भकम्) नाश करने वाले को और (पर्वतेभ्यः) पहाड़ों से (किम्पूरुषम्) खोटे जङ्गली मनुष्य को दूर कीजिए॥१६॥
भावार्थ
मनुष्य लोग ईश्वर के गुण-कर्म-स्वभावों के अनुकूल कर्मों से कहार आदि की रक्षा कर और बहेलिये आदि हिंसकों को छोड़ के उत्तम सुख पावें॥१६॥
विषय
ब्रह्मज्ञान, क्षात्रबल, मरुद् ( वैश्य ) विज्ञान आदि नाना ग्राह्य शिल्प पदार्थों की वृद्धि और उसके लिये ब्राह्मण, क्षत्रियादि उन-उन पदार्थों के योग्य पुरुषों की राष्ट्ररक्षा के लिये नियुक्ति । त्याज्य कार्यों के लिये उनके कर्त्ताओं को दण्ड का विधान ।
भावार्थ
( १११ ) ( सरोभ्यः) सरोवरों को स्वच्छ रखने के लिये ( धैवरम् ) धीवर को नियुक्त करो । अथवा (सरोभ्यः) उत्तम ज्ञानों के प्राप्त और शिक्षण के लिये 'धीवर' बुद्धि में श्रेष्ठ पुरुष को नियुक्त करो । (११२) (उपस्थावराभ्यः) उपवन में लगे छोटे-छोटे स्थावर वृक्षों की वाटिकाओं या छोटे २ कार्यों के लिये ( दाशम्) वेतनबद्ध भृत्य को नियुक्त -करो । ( ११३) (वैशन्ताम्यः चैन्दम् ) छोटे-छोटे ताल-तलैयों के प्रबन्ध और रक्षा के लिये वैन्द अर्थात् उससे लाभ लेने वाले पुरुष को नियुक्त 'करे । उन ताल तलैयों को वे ही अच्छा रक्खें जो उससे कुछ फायदा उठाते हैं । (११४) (नड्वलाभ्यः शौष्कलम् ) जिन भूमियों में - सरकण्डे आदि उत्पन्न हों उन दलदल वाली भूमियों को बसाने के लिये शोषण करने या उनके सुखा डालने वाले उपायों से विज्ञ पुरुष को नियुक्त करे । ( ११५ ) ( पाराय मार्गारम् ) परले पार या दूर देशों को जाने के लिये जल जन्तुओं के शत्रु, उनके नाशक पुरुष को नियुक्त करे । और — (११६ ) ( आवाराय के वर्तम् ) उरले पार आने के लिये जल के भीतर रहने वाले, उसी में अजीविका करने वाले को नियुक्त करो। "(११७) ( तीर्थेभ्य: आन्दम् ) तीर्थ, जलों के भीतर उतरने की सीढ़ियों या घाटों के बनाने के लिये बांध लगाने में चतुर, जो किनारा दृढ़ता से बांध दे ऐसे पुरुष को नियुक्त करो । ( ११८ ) ( विषमेभ्यः मैनालम् ) ऊंचे-नीचे विषम संकटमय स्थानों के लिये भी हिंसक जन्तुओं के नाश करने वाले पुरुष को नियुक्त करो । ( ११९ ) ( स्वनेभ्यः) नाना प्रकार के शब्दों को उत्पन्न करने के लिये ( पर्णकम् ) जो पुरुष रक्षा और युद्धादि कार्य में कुशल हो ऐसे को नियुक्त करो । ( १२० ) ( गुहाभ्य: किरातम् ) पर्वतों की गुहाओं की रक्षा और प्रबन्ध के लिये, तुच्छ कर देने वाले पुरुषों को लगावें । वे उन स्थानों में रहें । ( १२१ ) ( सानुभ्यः जम्भकम् ) पर्वत शिखरों के प्रबन्ध के लिये हिंसक जन्तुओं के नाशक पुरुष को नियुक्त करे । (१२२) (पर्वतेभ्यः) पर्वतों में बसने के लिये (किम्पुरुपम् ) अल्प शक्ति और व्यवसाय वाले अथवा पुरुष प्रमाण से भी छोटे कद वाले पुरुषों को बसावे ।
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
स्वराडुत्कृतिः । षड्जः ॥
विषय
सरों के लिए धीवर को
पदार्थ
१११. (सरोभ्यः) = तलाबों के लिए (धैवरम्) = धीवर सन्तानों को नियत करे। तालाबों को स्वच्छ रखना इनका कार्य हो । ११२. (उपस्थावराभ्यः) = तालाबों के समीप [उप] लगी वाटिकाओं के लिए [स्थावराभ्यः] (दाशम्) = माली आदि भृत्यों को प्राप्त करे। उन पौधों में नियमपूर्वक पानी आदि देना इनका कार्य हो। ११३. (वैशन्ताभ्यः) = जोहड़ों के लिए [Pools] (बैन्दम्) = उन जोहड़ों से कमलगट्टे व सिंघाड़े आदि प्राप्त करनेवालों को [विद् लाभे] नियत करे। ११४. (नड्वलाभ्यः) = नड़ों व सरकण्डोंवाले प्रदेशों के लिए (शौष्कलम्) = [शुष्= कला] उन तृणों को सुखाकर कलात्मक वस्तुएँ बनानेवाले को नियत करे। ११५. (पाराय मार्गारम्) = पार जाने के लिए मार्ग को जाननेवाले को अथवा जल-जन्तुओं का शिकार कर सकनेवालों को नियत करे [मृगणाम् अरिः, तस्यापत्यम्] ११६. अवाराय नदी में उरले किनारे पर लौट आने के लिए (कैवर्तम्) = केवट को नियत करे। ११७. (तीर्थेभ्य:) = तीर्थों के लिए, घाट आदि के लिए अथवा तीर्थस्थानों के लिए जोकि प्रायः नदी के किनारे होते हैं (आन्दम्) = [अदि बन्धने] बाँध बाँधनेवाले को नियत करे। ११८. (विषमेभ्यः) = विषम स्थानों के लिए, जलों में संकटयुक्त स्थानों के लिए, जहाँ कि मगरमच्छ आदि का भय हो (मैनालम्) -ज= लों द्वारा [मीनान् अलति वारयति] मछली आदि के निवारण करनेवाले को नियत करे। ११९. (स्वनेभ्यः) = नाना प्रकार के शब्दों के लिए (पर्णकम्) = पहरेदार को [ पृ पालनपूरणयोः] नियुक्त करे अथवा (स्वनेभ्यः) = उत्तम स्वरों के लिए (पर्णकम्) = तुरही [वाद्यविशेष] बजानेवाले को प्राप्त करे। १२. (गुहाभ्यः) = पर्वत कन्दराओं के लिए, पर्वत- कन्दराओं में शेर आदि के खतरे से बचने के लिए (किरातम्) = भीलों को प्राप्त करे। १२१. (सानुभ्यः) = पर्वत-शिखरों के लिए (जम्भकम्) = [जभि नाशने] हिंस्र - पशुओं के नाश करनेवाले को नियत करे और १२२. (पर्वतेभ्यः) = पर्वतों के लिए (किम्पुरुषम्) = छोटे कदवाले पुरुषों को प्राप्त करें, पर्वतों पर ऐसे ही व्यक्ति सुविधा से कार्य कर सकते हैं, पर्वतारोही पुरुष छोटे कद के ही होने चाहिएँ ।
भावार्थ
भावार्थ-तालाबों व पहाड़ों पर कार्यव्यवस्था के लिए तदुपयुक्त पुरुषों को नियत करना चाहिए। तालाबों के लिए धीवर आदि तो पर्वतों के लिए किरात आदि।
मराठी (2)
भावार्थ
हे राजा ! कोळी, सेवक, निषाद (जलाशयाचा प्रबंधक) मच्छीमार, नाविक, भोई इत्यादींचे रक्षण करावे व शिकारी, शब्दवेधी बाण मारणारे, पशू पक्षांचा व्यापार करणारे, त्यांना मारणारे इत्यादी हिंसक लोकांना दूर करून सुख प्राप्त करावे.
विषय
पुनश्च, त्याच विषयी -
शब्दार्थ
शब्दार्थ - हे जगदीश्वर वा हे राजन्, आपण (सरोभ्यः) मोठ्या जलाशयासाठी (धैवरम्) धीवरचे पुत्र म्हणजे कोळीचा पुत्र आणि (उपस्थावराभ्यः) काही गृणित वा हलकी (झाडणे, लोटणें, आदी कामें) करण्यासाठी (दाशम्) जवळ उभा असलेला सेवक (उत्पन्न करा-निर्माण करा) (वैशन्ताय) लहान जलाशयांचे प्रबन्ध करण्याासठी (वैन्दम्) निषादाची (नावाडी, कोळी) ची मुलें आणि (नड्वलाभ्यः) लव्हाळे, असलेल्या भूमीसाठी (शौष्कलम्) मासे खाऊन जीवन जगणारे (उत्पन्न करा वा निर्माण करा) (विषमेभ्यः) बिकट वा दुर्गम प्रदेशात कार्य करणार्यासाठी (मैनालम्) कामवृत्तीवर नियंत्रण ठेवणारे आणि (अवाराय) या पैलतीरावर जाण्यासाठी (केवर्त्तम्) कोळी वा नाविक (उत्पन्न करा-निर्माण करा) (तीर्थेभ्यः) तरूण जाण्याच्या साधनांसाठी (आन्दम्) नौका आदी तयार करणारे कारागीर आणि (पाराय) परिणांपासून (शेतकरी वा ग्रामीणजनांना होणारा त्रास समाप्त करण्यासाठी (मार्गारम्) जो शिकारी त्यांचा सर्वनाश करण्यास उद्यत आहे, त्याला त्या अपकर्मापासून दूर करा. (स्वनेभ्यः) शब्द वा ध्वनी निर्माण करण्यापासून (पर्णकम्) रतक भील जातीला (घोर व त्रावदायक नाद करणारे वन्य जाती-जमातीचे लोक) आणि (गुहाभ्यः) गुहांपासून (किरातम्) व्याध वा शिकारी यांना दूर करा. (सानुभ्यः) पर्वत शिखरांवर राहण्यापासून (जम्भकम्) (पर्वतांचा वृक्ष-वनादीचा) नाश करणार्याला परावृत्त करा तसेच (पर्वतेभ्यः) पर्वतांपासून (किम्पूरुषम्) कपटी वन्य लोकांना दूर ठेवा ॥16॥
भावार्थ
भावार्थ - मनुष्यानी ईश्वराच्या गुण, कर्म, स्वभावशी अनुकूल राहून भोई व पाणके यांची रक्षा करावी आणि व्याघ, शिकारी यांना (अनावश्यक शिकार) करण्यापासून दूर ठेवून राज्यात सुख नांदवावे. ॥16॥
इंग्लिश (3)
Meaning
O God. create the son of a fisherman for crossing ponds ; a paid servant for menial service ; the son of a Nishada for managing small tanks ; a dry fish clearer for reed-beds a celibate who controls passions for uneven impassable places ; a boatsman for crossing watery places; an engineer for constructing bridges over rivers. O God, drive away a hunters son bent upon killing deer ; a contemptible Bhil for sounds ; a Kirata for caverns ; a destructive savage for living on mountain-heights; a wild man for living in mountains.
Meaning
For the lakes, the ferryman; for the tanks close by, a knowledgeable caretaker; for the pools, a forest man; for the reed beds, a dryer; for crossing over, the knowing forester; for damps and marshes, the man of marshes; for tourist and sacred places, the bridge and dam maker; for unknown lands, the man of self- discipline; for forest sounds, the man specialising in leaves; for the caves, the caveman; for the mountain peaks, the ferocious guard; for the mountains, the hill ranger.
Translation
(One should seek) for lakes a fisherman (dhivara). (1) For standing waters (near river or sea) a fisher (dasa). (2) For ponds a son of a tribal (nisada). (3) For reedbeds a fish-seller (sauskala). (4) For the yonder bank of the river a deer-hunter (margara). (5) For this bank of the river a boatman (kaivarta). (6) For fords a barragemaker (anda). (7) For unpredictable waters a skilled fisher (mainala). (8) For catching sounds a tribal (bhilla) who wears tree-leaves for clothes. (9) For caverns a hunter (kirata). (10) For hills a rock-blaster (jambhaka). (11) For high mountains a beardless hillman (kimpurusa). (12)
Notes
Upasthāvarābhyaḥ, for standing waters. Nadvalabhyaḥ, for ponds. Vaindam, विंदो निषादापत्यं, son of a tribal. Sauşkala, a fish-seller (मत्स्यजीविनम्). Mārgāram, a deer-hunter; or one who gropes for fish. Kaivartam, a boatman; or a fisherman. Tirthebhyaḥ, for fords. Andam, बंधनकर्तारं, a builder of barrages. Mainālam, a skilled fisher. Svanebhyaḥ, for catching sounds. Parṇakam, भिल्लं, a tribal; Bhila. Sānu, hill. Jambhakam, path-maker. Kimpūruşam, imperfect man; a man without a beard.
बंगाली (1)
विषय
পুনস্তমেব বিষয়মাহ ॥
পুনঃ সেই বিষয়কে পরবর্ত্তী মন্ত্রে বলা হইয়াছে ॥
पदार्थ
পদার্থঃ–হে জগদীশ্বর বা রাজন্! আপনি (সরোভ্যঃ) বৃহৎ পুকুরগুলির জন্য (ধৈবরম্) ধীবরের পুত্রকে (উপস্থাবরাভ্যঃ) সমীপস্থ নিকৃষ্ট ক্রিয়াগুলির জন্য (দাশম্) যাহাকে দেওয়া হয় সেই সেবককে (বৈশান্তভ্যঃ) ছোট-ছোট জলাশয়ের ব্যবস্থা হেতু (বৈন্দম্) নিষাদের অপত্যকে (নড্বলাভ্যঃ) নলের ভূমির জন্য (শৌষ্কলম্) মৎসা দ্বারা জীবনধারীকে এবং (বিষমেভ্যঃ) বিকট দেশের জন্য (মৈনালম্) কামদেবকে প্রতিহতকারীকে (অবারায়) নিজের দিকে আসিবার জন্য (কেবর্ত্তম্) জলে নৌকা লইয়া পারাপারকারীকে (তীর্থেভ্যঃ) সন্তরণের সাধনের জন্য (আন্দম্) বন্ধনকারীকে উৎপন্ন করুন । (পারায়) হরিণাদির চেষ্টাকে সমাপ্ত করিতে প্রবৃত্ত (মার্গারম্) ব্যাধের পুত্রকে (স্বনেভ্যঃ) শব্দের জন্য (পর্ণকম্) রক্ষা করিতে নিন্দিত ভীলকে (গুহাভ্যঃ) গুহাগুলির জন্য (কিরাতম্) কিরাতকে (সানুভ্যঃ) শিখরের উপর বাস করিতে প্রবৃত্ত (জম্ভকম্) বিনাশকারীকে এবং (পর্বতেভ্যঃ) পর্বতগুলি হইতে (কিম্পূরুষম্) ছোট বন্য মনুষ্যকে দূর করিয়া দিন ॥ ১৬ ॥
भावार्थ
ভাবার্থঃ–মনুষ্যগণ ঈশ্বরের গুণ-কর্ম-স্বভাবের অনুকূল কর্ম্ম দ্বারা ধীবরাদির রক্ষা করিয়া এবং ব্যাধাদি হিংসকদেরকে ত্যাগ করিয়া উত্তম সুখ লাভ করিবে ॥ ১৬ ॥
मन्त्र (बांग्ला)
সরো॑ভ্যো ধৈব॒রমু॑প॒স্থাব॑রাভ্যো॒ দাশং॑ বৈশ॒ন্তাভ্যো॑ বৈ॒ন্দং ন॑ড্ব॒লাভ্যঃ॒ শৌষ্ক॑লং পা॒রায়॑ মার্গা॒রম॑বা॒রায়॑ কৈ॒বর্ত্তং॑ তী॒র্থেভ্য॑ऽআ॒ন্দং বিষ॑মেভ্যো মৈনা॒লᳬं স্বনে॑ভ্যঃ॒ পর্ণ॑কং॒ গুহা॑ভ্যঃ॒ কিরা॑ত॒ꣳ সানু॑ভ্যো॒ জম্ভ॑কং॒ পর্ব॑তেভ্যঃ কিম্পূরু॒ষম্ ॥ ১৬ ॥
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
সরোভ্য ইত্যস্য নারায়ণ ঋষিঃ । রাজেশ্বরৌ দেবতে । বিরাট্ কৃতিশ্ছন্দঃ ।
নিষাদঃ স্বরঃ ॥
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