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यजुर्वेद अध्याय - 38

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  • यजुर्वेद - अध्याय 38/ मन्त्र 27
    ऋषिः - दीर्घतमा ऋषिः देवता - यज्ञो देवता छन्दः - पङ्क्तिः स्वरः - पञ्चमः
    108

    मयि॒ त्यदि॑न्द्रि॒यं बृ॒हन्मयि॒ दक्षो॒ मयि॒ क्रतुः॑।घ॒र्मस्त्रि॒शुग्वि रा॑जति वि॒राजा॒ ज्योति॑षा स॒ह ब्रह्म॑णा॒ तेज॑सा स॒ह॥२७॥

    स्वर सहित पद पाठ

    मयि॑। त्यत्। इ॒न्द्रि॒यम्। बृ॒हत्। मयि॑। दक्षः॑। मयि॑। क्रतुः॑ ॥ घ॒र्मः। त्रि॒शुगिति॑ त्रि॒ऽशुक्। वि। रा॒ज॒ति॒। वि॒राजेति॑ वि॒ऽराजा॑। ज्योति॑षा। स॒ह। ब्रह्म॑णा। तेज॑सा। स॒ह ॥२७ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    मयि त्यदिन्द्रियम्बृहन्मयि दक्षो मयि क्रतुः । घर्मस्त्रिशुग्वि राजति विराजा ज्योतिषा सह ब्रह्मणा तेजसा सह ॥


    स्वर रहित पद पाठ

    मयि। त्यत्। इन्द्रियम्। बृहत्। मयि। दक्षः। मयि। क्रतुः॥ घर्मः। त्रिशुगिति त्रिऽशुक्। वि। राजति। विराजेति विऽराजा। ज्योतिषा। सह। ब्रह्मणा। तेजसा। सह॥२७॥

    यजुर्वेद - अध्याय » 38; मन्त्र » 27
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    संस्कृत (1)

    विषयः

    अथ मनुष्यान् किं सुखयतीत्याह॥

    अन्वयः

    हे मनुष्याः! यथा विराजा ज्योतिषा सह ब्रह्मणा तेजसा सह च त्रिशुक् घर्मो विराजति, तथा मयि बृहत् त्यदिन्दियं मयि दक्षो मयि क्रतुर्विराजति तथा युष्मासु स्वयं विराजताम्॥२७॥

    पदार्थः

    (मयि) इन्द्रे जीवत्मानि (त्यत्) तत् (इन्द्रियम्) मन आदि (बृहत्) महत् (मयि) (दक्षः) बलम् (मयि) (क्रतुः) प्रज्ञा कर्म वा (घर्मः) प्रतापो यज्ञो वा (त्रिशुक्) तिस्रो मृदुमध्यतीव्रा दीप्तयो यस्य सः (वि राजति) विशेषेण प्रकाशते (विराजा) विशेषेण प्रकाशेन (ज्योतिषा) द्योतमानेन (सह) (ब्रह्मणा) धनेन (तेजसा) तीक्ष्णेन (सह)॥२७॥

    भावार्थः

    अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। हे मनुष्याः! यथाऽग्निविद्युत्सूर्य्यरूपेण त्रिविधः प्रकाशो जगत् प्रकाशयति, तथोत्तमं बलं कर्म प्रज्ञा धर्मसञ्चितं धनं जितमिन्द्रयं बृहत्सुखं प्रयच्छति॥२७॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    अब मनुष्यों को क्या वस्तु सुख देता है, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है॥

    पदार्थ

    हे मनुष्यो! जैसे (विराजा) विशेषकर प्रकाशक (ज्योतिषा) प्रदीप्त ज्योति के (सह) साथ और (ब्रह्मणा, तेजसा) तीक्ष्ण कार्यसाधक धन के (सह) साथ (त्रिशुक्) कोमल, मध्यम और तीव्र दीप्तियोंवाला (घर्मः) प्रताप (विराजति) विशेष प्रकाशित होता है, वैसे (मयि) मुझ जीवात्मा में (बृहत्) बड़े (त्यत्) उस (इन्द्रियम्) मन आदि इन्द्रिय (मयि) मुझ में (दक्षः) बल और (मयि) मुझ में (क्रतुः) बुद्धि वा कर्म विशेषकर प्रकाशित होता है, वैसे तुम लोगों के बीच भी यह विशेषकर प्रकाशित होवे॥२७॥

    भावार्थ

    इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जैसे अग्नि, विद्युत् और सूर्यरूप से तीन प्रकार का प्रकाश जगत् को प्रकाशित करता है, वैसे उत्तम बल, कर्म, बुद्धि, धर्म से संचित धन, जीता गया इन्द्रिय महान् सुख को देता है॥२७॥

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    विषय

    विद्वान् के उद्देश्य और कर्तव्य ।

    भावार्थ

    ( मयि ) मुझ प्रजावर्ग में ( त्यत् ) वह अलौकिक, अपूर्व, वाञ्छनीय ( बृहत् ) बड़ा भारी (इन्द्रियम् ) ऐश्वर्य बल प्राप्त हो । (मयि: तक्षः) मुझमें बल, प्रज्ञा, बुद्धि प्राप्त हो । ( मयि ) मुझ राजा के अधीन (क्रतुः) बड़ा भारी ऐश्वर्य युक्त राष्ट्रबल और राज्यकार्य प्राप्त हो । इस प्रकार ( धर्मं: ) तेजस्वी राजा ( त्रिशुक) अग्नि, विद्युत्, सूर्य तीनों के समान तेजस्वी होकर ( विराजा ज्योतिषा ) विराट् प्रकाश, विविध राजोचित तेज और (ब्रह्मणा तेजसा ) ब्रह्म, वेदमय, बड़े भारी ऐश्वर्यमय तीक्ष्ण प्रताप के (सह) साथ (विराजति) विराजे, शोभा को प्राप्त हो ।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    यज्ञः । पंक्तिः । पंचमः ॥

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    पदार्थ

    गतमन्त्र में वर्णित प्रभु का ग्रहण मैं इसलिए करता हूँ कि १. (मयि) = मुझमें (त्यत्) = उस प्रसिद्ध (इन्द्रियम्) = इन्द्र की शक्ति उत्पन्न होती है। उपासना से इन्द्र की शक्ति का विकास होता है। वह विकास बृहत् मेरी वृद्धि का कारण बनता है [बृहि वृद्धौ] २. (मयि दक्षः) = इस उपासना से मुझमें कार्यकुशलता बढ़ती है। उपासक कभी अनाड़ीपन से कार्य नहीं करता । ३. (मयि क्रतुः) = मुझमें सदा कर्म संकल्प बना रहता है। ब्रह्मनिष्ठ का जीवन क्रियाशील होता है। ४. इस उपासना के परिणामस्वरूप वासनाओं का दूरीकरण होकर (घर्म:) = सोमशक्ति (त्रिशुक्) = मस्तिष्क, मन व शरीर तीनों में दीप्ति व क्रिया को उत्पन्न करती है। वह सोमशक्ति विराजति दीप्त होती है। उपासक का मस्तिष्क 'उज्ज्वल' मन 'निर्मल' तथा शरीर पूर्ण 'स्वस्थ' होता है। ५. यह उपासक (विराजा) = विशेष रूप से देदीप्यमान (ज्योतिषा) = ज्योति के (सह) = साथ होता है । ब्रह्म सूर्य के समान ज्योति है, उसका उपासक भी विशेष दीप्तिवाला होता है। ६. यह उपासक जहाँ (ब्रह्मणा) = ज्ञान के साथ होता है वहाँ तेजसा सह- तेज के भी साथ होता है। उसके ब्रह्म और क्षत्र दोनों ही फूलते-फलते हैं, शरीर शक्ति से दीप्ति होता है। मस्तिष्क ज्ञान से उज्ज्वल होता है। इसप्रकार यह तम व अन्धकार को विदीर्ण करके 'दीर्घतमा' बन जाता है।

    भावार्थ

    भावार्थ- प्रभु-उपासक की आत्मशक्ति 'दक्षता, कर्मसंकल्प, ज्ञान व तेज' से युक्त होती है।

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    मराठी (2)

    भावार्थ

    या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. हे माणसांनो ! जसे अग्नी, विद्युत व सूर्य या तीन रूपांनी जग प्रकाशित होते. तसे उत्तम बल, कर्म, बुद्धी धर्माने प्राप्त केलेले धन व जितेंद्रियता यामुळे माणसांना महान सुख प्राप्त होते.

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    विषय

    मनुष्यांसाठी कोणता पदार्थ सुखकर आहे, याविषयी -

    शब्दार्थ

    शब्दार्थ - हे मनुष्यानो, ज्याप्रमाणे (विराजा) विशेषत्वाने प्रकाश देणाऱ्या (ज्योतिषा) प्रदीप्त ज्योती (सह) (त्रिशुक्) कोमल, मध्यम आणि तीव्र दीप्ती असणारा (घर्मः) प्रतापी अग्नी अथवा यज्ञ (या जगात) (विराजति) विशेष शोभा प्राप्त आहे, (सर्वत्र सुशोभित होत आहे) त्याप्रमाणे (मयि) माझ्या (एका याज्ञिकाच्या वा उपासकाच्या) जीवात्म्यामधे (बृहत्) महान (त्यत्) त्या (इद्रियम्) मन आदी इन्द्रियांमधे (मयि) माझ्यात (दक्षः) बळ आणि (मयि) माझ्यात (ऋतुः) बुद्धी अथवा कर्म विशेषत्वाने प्रकाशित होत आहेत (याज्ञिक मनुष्य जगात आपल्या जितेंद्रियत्वाने शक्ती, बुद्धी आणि कर्माने विशेषत्वाने वेगळेपणाने सर्वाच्या लक्षात येतो). हे मनुष्यानो, माझ्याप्रमाणे तुम्हीही आपले व्यक्तिमत्व विशेषत्वाने प्रकाशित करा. ॥27॥

    भावार्थ

    भावार्थ - या मंत्रात वाचकलुप्तोपमा अलंकार आहे. हे मनुष्यानो, जसा विद्युत, अग्नी आणि सूर्य या तीन रूपाचा प्रकाश त्या जगाला प्रकाशित करीत आहे, तद्वत उत्तम बळ, कर्म, बुद्धी, धर्ममार्गाने संचत धन विजित इंद्रियें, या सर्वांमुळे जीवन उजळून निघते आणि सर्वत्र सुख नांदते. ॥27॥

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    इंग्लिश (3)

    Meaning

    With lustrous fulgency, with readily serviceable riches, the yajna shines with triple light. In my soul be that great mental force, in my soul be strength, wisdom and action.

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    Meaning

    That expansive power in me, that yajnic efficiency of action like threefold passion of fire, lightning and the sun shines in me with the immanence of light, omniscience and cosmic power of Infinity.

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    Translation

    May in me be the great powers of all the organs; may in me be the skills; may in me be the activity. The sacrifice shines with three lights, along with the great light (i. e. the sun) and the light of the divine Supreme. (1)

    Notes

    Tyat, तत्, that. Indriyam, power of all the sense-organs. Dakşam, skill; efficiency. Also, संकल्पसिद्धि:, resolve. Kratuḥ,, action; activity. Trisuk, having three lights. शुक् दीप्ति:, light, radiance. Virājā jyotiṣā saha, along with the great light. Brahmaṇā tejasā saha, alongwith the light of the Divine Supreme.

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    बंगाली (1)

    विषय

    অথ মনুষ্যান্ কিং সুখয়তীত্যাহ ॥
    এখন মনুষ্যদিগকে কী বস্তু সুখ প্রদান করে, এই বিষয়কে পরবর্ত্তী মন্ত্রে বলা হইয়াছে ॥

    पदार्थ

    পদার্থঃ- হে মনুষ্যগণ ! যেমন (বিরাজা) বিশেষ করিয়া প্রকাশক (জ্যোতিষা) প্রদীপ্ত জ্যোতির (সহ) সহ এবং (ব্রহ্মণা, তেজসা) তীক্ষ্ন কার্য্য সাধক ধনের (সহ) সহ (ত্রিশুক্) কোমল, মধ্যম ও তীব্র দীপ্তি যুক্ত (ঘর্মঃ) প্রতাপ (বিরাজতি) বিশেষ প্রকাশিত হয় সেইরূপ (ময়ি) আমাতে, জীবাত্মায় (বৃহৎ) বৃহৎ (ত্যৎ) সেই (ইন্দ্রিয়ম্) মনাদি ইন্দ্রিয় (ময়ি) আমাতে (দক্ষঃ) বল এবং (ময়ি) আমাতে (ক্রতুঃ) বুদ্ধি বা কর্ম্ম বিশেষ করিয়া প্রকাশিত হয় সেইরূপ তোমাদের মধ্যেও ইহা বিশেষ করিয়া প্রকাশিত হউক ॥ ২৭ ॥

    भावार्थ

    ভাবার্থঃ- এই মন্ত্রে বাচকলুপ্তোপমালঙ্কার আছে । হে মনুষ্যগণ ! যেমন অগ্নি, বিদ্যুৎ ও সূর্য্যরূপে তিন প্রকারের প্রকাশ জগৎকে প্রকাশিত করে সেইরূপ উত্তম বল, কর্ম্ম, বুদ্ধি, ধর্ম দ্বারা সঞ্চিত ধন, বিজিত ইন্দ্রিয় মহান্ সুখ প্রদান করে ॥ ২৭ ॥

    मन्त्र (बांग्ला)

    ময়ি॒ ত্যদি॑ন্দ্রি॒য়ং বৃ॒হন্ময়ি॒ দক্ষো॒ ময়ি॒ ক্রতুঃ॑ ।
    ঘ॒র্মস্ত্রি॒শুগ্বি রা॑জতি বি॒রাজা॒ জ্যোতি॑ষা স॒হ ব্রহ্ম॑ণা॒ তেজ॑সা স॒হ ॥ ২৭ ॥

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    ময়ি ত্যদিত্যস্য দীর্ঘতমা ঋষিঃ । য়জ্ঞো দেবতা । পংক্তিশ্ছন্দঃ ।
    পঞ্চমঃ স্বরঃ ॥

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