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अथर्ववेद के काण्ड - 11 के सूक्त 8 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 8/ मन्त्र 13
    ऋषिः - कौरुपथिः देवता - अध्यात्मम्, मन्युः छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - अध्यात्म सूक्त
    61

    सं॒सिचो॒ नाम॒ ते दे॒वा ये सं॑भा॒रान्त्स॒मभ॑रन्। सर्वं॑ सं॒सिच्य॒ मर्त्यं॑ दे॒वाः पुरु॑ष॒मावि॑शन् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    स॒म्ऽसिच॑: । नाम॑ । ते । दे॒वा: । ये । स॒म्ऽभा॒रान् । स॒म्ऽअभ॑रन् । सर्व॑म् । स॒म्ऽसिच्य॑ । मर्त्य॑म् । दे॒वा: । पुरु॑षम् । आ । अ॒वि॒श॒न् ॥१०.१३॥


    स्वर रहित मन्त्र

    संसिचो नाम ते देवा ये संभारान्त्समभरन्। सर्वं संसिच्य मर्त्यं देवाः पुरुषमाविशन् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    सम्ऽसिच: । नाम । ते । देवा: । ये । सम्ऽभारान् । सम्ऽअभरन् । सर्वम् । सम्ऽसिच्य । मर्त्यम् । देवा: । पुरुषम् । आ । अविशन् ॥१०.१३॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 11; सूक्त » 8; मन्त्र » 13
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    सब जगत् के कारण परमात्मा का उपदेश।

    पदार्थ

    (संसिचः) परस्पर सींचनेवाले (नाम) प्रसिद्ध (ते) वे (देवाः) दिव्य पदार्थ [पृथिवी आदि पञ्चभूत] हैं, (ये) जिन्होंने (संभारान्) [उन] संग्रहों [उपकरण द्रव्यों को] (समभरन्) मिलाकर भरा है। (देवाः) [उन] दिव्य पदार्थों ने (सर्वम्) सब (मर्त्यम्) मरणधर्मी [शरीर] को (संसिच्य) परस्पर सींचकर (पुरुषम्) पुरुष में [आत्मा सहित शरीर में] (आ अविशन्) प्रवेश किया है ॥१३॥

    भावार्थ

    परमेश्वर के सामर्थ्य से पूर्व कल्प के समान पृथिवी, जल आदि पाँचों तत्त्व आपस में मिलाकर शरीर के इन्द्रिय आदि अवयवों को बना कर स्वयम् भी प्राणियों के शरीर में प्रवेश कर रहे हैं ॥१३॥

    टिप्पणी

    १३−(संसिचः) परस्परसेचकाः सन्धायकाः (नाम) प्रसिद्धौ (ते) पूर्वोक्ताः (देवाः) दिव्यपदार्थाः पृथिव्यादिपञ्चभूतरूपाः (ये) (संभारान्) सम्+डुभृञ् धारणपोषणयोः-घञ्। संग्राहान्। उपकरणद्रव्यानि (समभरन्) एकीकृत्य धृतवन्तः (सर्वम्) (संसिच्य) परस्परमार्द्रीकृत्य (मर्त्यम्) मरणधर्माणं देहम् (देवाः) (पुरुषम्) अ० १।१६।४। सात्मकं शरीरम् (आ अविशन्) प्रविष्टवन्तः ॥

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    विषय

    संसिचो नाम ते देवा:

    पदार्थ

    १. (ये देवा:) = मन्त्र १० में कहे गये ज्ञानेन्द्रियकर्मेन्द्रियात्मक जो दश देव हैं अथवा अधिष्ठातसहित प्राणापानादि हैं, वे संभारन-[संधियन्ते इति] केश आदि को (समभरन्) = एक स्थान पर संभृत करनेवाले हुए। (ते देवाः संसिचः नाम) = [सम् सिञ्चन्ति] बे देव सब संभारों को एकत्र करके बन्धक रस से बाँधते हैं, इसी से वे 'संसिच' नामवाले हैं-वे संसेचन समर्थ संधायक हैं। २. वे (देवा:) = देव (मर्त्यम्) = इस मरणधर्मा (सर्वम्) = सम्पूर्ण शरीर को (संसिच्य) = रुधिर से (आर्द्र) = करके (पुरुषम् आविशन्) = पुरुषाकृति करके इसमें प्रविष्ट हुए।

     

    भावार्थ

    जब तक शरीर में प्राणों का निवास है तब तक ही प्राणाधिष्ठित शरीर सब व्यवहारों को करने में समर्थ होता है, अत: प्राणदेव ही पृथिव्यादि पंचभूतात्माओं से उत्पन्न केश अस्थ्यादि धातुमय पुरुष शरीर को प्रविष्ट करके रह रहे हैं।

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    भाषार्थ

    (ते देवाः) वे देव (संसिचः नाम) संसिच् नाम वाले हैं, (ये) जिन्होंने (सम्भारान्) केश आदि सामग्री को (समभरन्) शरीर में भरा था। (सर्वम् मर्त्यम्) मरणधर्मा प्राणी को सम्पूर्णतया (संसिच्य) सींच कर (देवाः) देव (पुरुषम्) पुरुष में (आ विशन्) आ प्रविष्ट हुए।

    टिप्पणी

    [संसिचः = सींचने वाले देव "आपः" प्रतीत होते हैं। रस-रक्तरूपी द्रवों को "आपः" ने ही सींचा है। वेद ने रस-रक्त को आपः कहा है। यथा "को अस्मिन्नापो व्यदधात्विषूवृतः पुरूवृतः सिन्धुसृत्याय जाताः। तीव्रा अरुणा लोहिनीस्ताम्रधूम्रा ऊर्ध्वा अवाचीः पुरुषे तिरश्चीः ॥ (अथर्व० १०।२।११)। इस मन्त्र में आपः = रसरक्त। सिन्धु = हृदय। लोहिनीः = लाल तथा लोहे वाला लाल रक्त। ताम्रधुम्राः = काला खून। ऊर्ध्वाः आदि = शरीर में सब ओर गति करने वाले आपः। शरीर की समग्र रचना पिता के वीर्यद्रव तथा माता के रजोद्रव से होती है। ये दोनों द्रव हैं, आपः हैं, इन्हीं से केशः आदि का निर्माण हुआ है। अतः ये संसिच् देव हैं, इन्हीं से समग्र शरीर सींचा गया है, ये ही शरीर में प्रविष्ट संसि देव हैं। मन्त्राभिप्रेत "आपः" की दृष्टि से "देवाः" पद बहुवचनान्त है]।

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    विषय

    मन्यु रूप परमेश्वर का वर्णन।

    भावार्थ

    (ते देवाः) वे ‘देव’ दिव्य गुण वाले सूक्ष्म तत्व (संसिचः) ‘संसिच्’ नाम के हैं (ये) जो (संभारान्) शरीर-रचना के योग्य समस्त पदार्थों को (सम् अभरन्) एकत्र करते हैं। (देवाः) वे दिव्य सूक्ष्म तेजोमय पदार्थ ही (सर्वं मर्त्यम्) समस्त इस मरण धर्मा शरीर को (सं सिच्य) भली प्रकार सेचन करके पुनः (पुरुषम् आविशन्) इस देहमय युक्त आत्मा में प्रविष्ट होकर ही रहते हैं।

    टिप्पणी

    ‘शंसतो नाम’ (द्वि०) ‘सर्व संसृज्य’ इति पैप्प० सं०।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    कौरुपथिर्ऋषिः। अध्यात्मं मन्युर्देवता। १-३२, ३४ अनुष्टुभः, ३३ पथ्यापंक्तिः। चतुश्चत्वारिंशदृचं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Constitution of Man

    Meaning

    Together, life-infusing are those divinities, harbingers of living showers, which bring the body and spirit of life and, having given all for life and living to the mortal, they enter man.

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    Translation

    Pourers-togther namely are those gods who brought together the bringings-together; having poured together the whole mortal, the gods entered man

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    Translation

    The forces of nature named as Sansich, the casters are those very luminous and wonderous elementary forces which bring together these elements of body. They having filled or having cast all that is mortal, in the body, enter into Purush, the soul holding body.

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    Translation

    Impregnators, those gods were called, who brought together all the elements. When they had fused the mortal man complete, they entered the soul in the body.

    Footnote

    Gods: Earth, Water, Air, Fire, and Space. Through the dispensation of God, the five divine forces, i e., earth, water, air, fire, space uniting together make up all the organs of the body, themselves enter the embodied soul.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    १३−(संसिचः) परस्परसेचकाः सन्धायकाः (नाम) प्रसिद्धौ (ते) पूर्वोक्ताः (देवाः) दिव्यपदार्थाः पृथिव्यादिपञ्चभूतरूपाः (ये) (संभारान्) सम्+डुभृञ् धारणपोषणयोः-घञ्। संग्राहान्। उपकरणद्रव्यानि (समभरन्) एकीकृत्य धृतवन्तः (सर्वम्) (संसिच्य) परस्परमार्द्रीकृत्य (मर्त्यम्) मरणधर्माणं देहम् (देवाः) (पुरुषम्) अ० १।१६।४। सात्मकं शरीरम् (आ अविशन्) प्रविष्टवन्तः ॥

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