Loading...
अथर्ववेद के काण्ड - 11 के सूक्त 8 के मन्त्र
मन्त्र चुनें
  • अथर्ववेद का मुख्य पृष्ठ
  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 8/ मन्त्र 33
    ऋषिः - कौरुपथिः देवता - अध्यात्मम्, मन्युः छन्दः - पथ्यापङ्क्तिः सूक्तम् - अध्यात्म सूक्त
    75

    प्र॑थ॒मेन॑ प्रमा॒रेण॑ त्रे॒धा विष्व॒ङ्वि ग॑च्छति। अ॒द एके॑न॒ गच्छ॑त्य॒द एके॑न गच्छती॒हैके॑न॒ नि षे॑वते ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    प्र॒थ॒मेन॑ । प्र॒ऽभा॒रेण॑ । त्रे॒धा । विष्व॑ङ् । वि । ग॒च्छ॒ति॒ । अ॒द: । एके॑न । गच्छ॑ति । अ॒द: । एके॑न । ग॒च्छ॒ति॒ । इ॒ह । एके॑न । नि । से॒व॒ते॒ ॥१०.३३॥


    स्वर रहित मन्त्र

    प्रथमेन प्रमारेण त्रेधा विष्वङ्वि गच्छति। अद एकेन गच्छत्यद एकेन गच्छतीहैकेन नि षेवते ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    प्रथमेन । प्रऽभारेण । त्रेधा । विष्वङ् । वि । गच्छति । अद: । एकेन । गच्छति । अद: । एकेन । गच्छति । इह । एकेन । नि । सेवते ॥१०.३३॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 11; सूक्त » 8; मन्त्र » 33
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    सब जगत् के कारण परमात्मा का उपदेश।

    पदार्थ

    (प्रथमेन) पहिले [मरणसमय के पहिले] से और (प्रमारेण) मरण के साथ (त्रेधा) तीन प्रकार पर (विष्वङ्) नाना गति से वह [प्राणी] (वि गच्छति) चला चलता है। वह [प्राणी] (एकेन) एक [शुभ कर्म] से (अदः) उस [मोक्षसुख] को (गच्छति) पाता है, (एकेन) एक [पाप कर्म] से (अदः) उस [नरक स्थान] को (गच्छति) पाता है, (एकेन) एक [पुण्य-पाप के साथ मिले कर्म] से (इह) यहाँ पर [मध्य अवस्था में] (नि सेवते) नियम से रहता है ॥३३॥

    भावार्थ

    मनुष्य जीवनकाल और परलोक में अपने शुभ कर्म से मोक्ष, अशुभ कर्म से नरक, और दोनों पुण्य-पाप की मध्य अवस्था में मोक्ष और नरक की मध्य अवस्था भोगता है ॥३३॥

    टिप्पणी

    ३३−(प्रथमेन) मरणात् प्रथमकालेन (प्रमारेण) मरणेन सह (त्रेधा) त्रिप्रकारेण (विष्वङ्) विषु+अञ्चु गतिपूजनयोः-क्विन्। नानागत्या (वि गच्छति) व्याप्य चलति (अदः) तत्। मोक्षपदम् (एकेन) पुण्यकर्मणा (गच्छति) प्राप्नोति (अदः) तत्। नरकस्थानम् (एकेन) पापकर्मणा (इह) अत्र। मोक्षनरकयोर्मध्यावस्थायाम् (एकेन) पुण्यपापमिश्रितेन कर्मणा (नि) नितराम्। नियमेन (सेवते) भुनक्ति ॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    विषय

    त्रेधा

    पदार्थ

    १. शरीर का अभिमानी जीव शरीर व इन्द्रियों से पुण्य-पापात्मक कर्मों को करके उनके फलभोग के लिए त्रिविध गतिवाला होता है। (प्रथमेन प्रमारेण) = शरीरात्मक कर्म के क्षय से प्रथमभावी स्थूलशरीर के प्रमृत होने से वह त्यक्तशरीर जीवात्मा (त्रेधा) = तीन प्रकार से (विष्वङ विगच्छति) = नाना योनियों में आता है। (अद:) = विप्रकृष्ट [दूरस्थ] स्वर्गाख्य स्थान को (एकेन) = पुण्यकर्म से (गच्छति) = प्राप्त होता है, (अदः) = विप्रकृष्ट नरकाख्य स्थान को (एकेन गच्छति)  पापकर्म से प्रास होता है। तथा (इह) = इस भूलोक पर (एकेन) = पुण्य-पापात्मक मिश्रित कर्म से (निषेवते) = नितरां सुखदुःखात्मक भोगों का सेवन करता है।

    भावार्थ

    ['पुण्येन पुण्यलोकं नयति, पापेन पापं, उभाभ्यामेव मनुष्यलोकम्-प्रश्नो० ३.७] शरीर को छोड़ने पर पुण्य से स्वर्ग की, पाप से नरक की और पुण्य-पाप की समता में मनुष्यलोक में जन्म मिलता है।

    इस भाष्य को एडिट करें

    भाषार्थ

    (विष्वङ्) सर्वत्र गति करने वाला जीवात्मा (प्रथमेन प्रमारेण) मुख्य मारने वाले परमेश्वर द्वारा अर्थात् उस के नियमानुसार (त्रेधा) तीन प्रकार के (वि गच्छति) विविध स्थानों में जाता है, (अदः)१ वहां अर्थात् मोक्ष को (एकेन) एक प्रकार के कर्मों द्वारा (गच्छति) जाता है, प्राप्त होता है, (अदः)१ वहां अर्थात् नीच योनि को (एकेन) एक प्रकार के कर्मों द्वारा (गच्छति) जाता है, प्राप्त होता है। (इह)२ और यहां अर्थात् मनुष्य योनि में (एकेन) एक प्रकार के कर्मों द्वारा (निषेवते) सुख-दुःख का सेवन करता है।

    टिप्पणी

    [विष्वङ् = विष्लृ व्याप्तौ+ अञ्च (गतौ)। प्रमारेण= यथा "स एव मृत्युः सोऽमृतम्" (अथर्व० १३।४।पर्याय ३। मन्त्र २५), अर्थात् वह परमेश्वर ही मृत्यु है, वह अमृत है]।[१. अदः= अथवा अन्तरिक्ष में स्थिति पाता है। शीघ्र जन्म न मिलने के कारण अन्तरिक्ष में घूमता रहता है। २. इह = इस पृथिवीलोक में। अथवा "पुण्येन पुण्यं लोकं नयति पापेन पाप मुभाभ्यामेव मनुष्यलोकम्" प्र० ३।३।७।]

    इस भाष्य को एडिट करें

    विषय

    मन्यु रूप परमेश्वर का वर्णन।

    भावार्थ

    (प्रथमेन प्रमारेण) प्रथम प्राण के छूट जाने पर पुरुष या सूक्ष्म लिङ्गशरीरवान् आत्मा (त्रेधा) तीन प्रकारों से (विश्वङ् वि गच्छति) नाना योनियों में जाता है। (अदः) उस उत्तम लोक को (एकेन) एक प्रकार के उत्तम कर्म से (गच्छति) प्राप्त होता है। (अदः एकेन) उस नरक, तिर्यक् लोक को भी एक विशेष प्रकार के पाप कर्म से (गच्छति) प्राप्त होता है और (इह) इस मनुष्य लोक में (एकेन) एक विशेष प्रकार के कर्म से (निषेवते) अपने कर्म फल भोगता है। ‘पुण्येन पुण्यं लोकं नयति, पापेन पापम्, उभाभ्यामेव मनुष्यलोकम्’। छान्दोग्य उप०। अथवा देवयान, पितृयाण और ‘जायस्वम्रियस्व’ ये तीन गतियां बतलाई हैं। देखो [ छन्दोग्य उप० ५। १० ]

    टिप्पणी

    ‘विश्वङ्-निगच्छति’ इति सायणाभिमतः।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    कौरुपथिर्ऋषिः। अध्यात्मं मन्युर्देवता। १-३२, ३४ अनुष्टुभः, ३३ पथ्यापंक्तिः। चतुश्चत्वारिंशदृचं सूक्तम्॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    इंग्लिश (4)

    Subject

    Constitution of Man

    Meaning

    By the first and inevitable law of death, the Jiva, human soul that goes all ways all round, normally goes three ways: By one kind of Karma it goes to that species which is better than human, by another it goes to sub¬ human species, and by yet another it lives life here itself in the human species. (Refer to Yogasutras, 4, 7-8)

    इस भाष्य को एडिट करें

    Translation

    By the first dying, it goes apart dividing thereefold: yonder goes it with one (part); yonder goes it with one; here with one it dwells (? ni-sev)

    इस भाष्य को एडिट करें

    Translation

    By the first death, (i.e. leaving this first body which is gross) the soul goes to assume various species by three ways. By one he attains good lokas, by second he assumes the body of animal etc.; and by one he reaps the fruit of action in this sphere of human beings.

    इस भाष्य को एडिट करें

    Translation

    On the release of first vital breath at the time of death, the soul goeth hence, asunder, to three different regions. It attains to salvation through virtue, goeth to low, dark life of insects through sin, and is born again in the world through mixed deeds of virtue and vice.

    इस भाष्य को एडिट करें

    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ३३−(प्रथमेन) मरणात् प्रथमकालेन (प्रमारेण) मरणेन सह (त्रेधा) त्रिप्रकारेण (विष्वङ्) विषु+अञ्चु गतिपूजनयोः-क्विन्। नानागत्या (वि गच्छति) व्याप्य चलति (अदः) तत्। मोक्षपदम् (एकेन) पुण्यकर्मणा (गच्छति) प्राप्नोति (अदः) तत्। नरकस्थानम् (एकेन) पापकर्मणा (इह) अत्र। मोक्षनरकयोर्मध्यावस्थायाम् (एकेन) पुण्यपापमिश्रितेन कर्मणा (नि) नितराम्। नियमेन (सेवते) भुनक्ति ॥

    इस भाष्य को एडिट करें
    Top