अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 8/ मन्त्र 27
ऋषिः - कौरुपथिः
देवता - अध्यात्मम्, मन्युः
छन्दः - अनुष्टुप्
सूक्तम् - अध्यात्म सूक्त
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आ॒शिष॑श्च प्र॒शिष॑श्च सं॒शिषो॑ वि॒शिष॑श्च॒ याः। चि॒त्तानि॒ सर्वे॑ संक॒ल्पाः शरी॑र॒मनु॒ प्रावि॑शन् ॥
स्वर सहित पद पाठआ॒ऽशिष॑: । च॒ । प्र॒ऽशिष॑: । च॒ । स॒म्ऽशिष॑: । वि॒ऽशिष॑: । च॒ । या: । चि॒त्तानि॑ । सर्वे॑ । स॒म्ऽक॒ल्पा: । शरी॑रम् । अनु॑ । प्र । अ॒वि॒श॒न् ॥१०.२७॥
स्वर रहित मन्त्र
आशिषश्च प्रशिषश्च संशिषो विशिषश्च याः। चित्तानि सर्वे संकल्पाः शरीरमनु प्राविशन् ॥
स्वर रहित पद पाठआऽशिष: । च । प्रऽशिष: । च । सम्ऽशिष: । विऽशिष: । च । या: । चित्तानि । सर्वे । सम्ऽकल्पा: । शरीरम् । अनु । प्र । अविशन् ॥१०.२७॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
सब जगत् के कारण परमात्मा का उपदेश।
पदार्थ
(आशिषः) आशीर्वादों [हितप्रार्थनाओं], (च) और (प्रशिषः) उत्तम शासनों (च) और (संशिषः) यथावत् प्रबन्धों (च) और (याः) जो (विशिषः) विशेष परामर्श हैं [उन्होंने] (चित्तानि) अनेक विचारों और (सर्वे) सब (सङ्कल्पाः) सङ्कल्पों [मनोरथों] ने (शरीरम्) शरीर में (अनु) धीरे-धीरे (प्र अविशन्) प्रवेश किया ॥२७॥
भावार्थ
मनुष्य शरीर के सम्बन्ध से ज्ञान प्राप्त करके हितप्रार्थनाओं और शासन आदि क्रियाओं को दृढ़ सङ्कल्पी होकर सिद्ध करें ॥२७॥
टिप्पणी
२७−(आशिषः) आङः शासु इच्छायाम्-क्विप्। उपधाया इत्वम्। आशीर्वादाः। हितप्रार्थनाः (प्रशिषः) शासु अनुशिष्टौ-क्विप्। उत्तमानि शासनानि (संशिषः) सम्यक् शासनानि। प्रबन्धकर्माणि (विशिषः) विशेषपरामर्शाः (च) (याः) (चित्तानि) विचाराः (सर्वे) (सङ्कल्पाः) दृढमनोरथाः। अन्यत् पूर्ववत् ॥
विषय
आशिषः प्रशिषः, संशिषः विशिष:
पदार्थ
१. (आशिष: च) = आशासन-इष्ट फल प्रार्थनाएँ [आशीर्वाद], (प्रशिष: च) = प्रशासन [आज्ञाएँ] (संशिष:) = संशासन [अनुज्ञाएँ], (याः च विशिष:) = और जो विशेष आज्ञाएँ हैं, चित्तानि चित्त, मन, बुद्धि, अंहकार आदि तथा (सर्वे संकल्पा:) = सब अन्त:करण वृत्तियाँ (शरीरम् अनुप्राविशन्) = शरीर में प्रविष्ट हुई।
भावार्थ
जीवित शरीर में आशासन-प्रशासन आदि के साथ नाना प्रकार की स्मृतियाँ व संकल्प होते रहते हैं।
भाषार्थ
(आशिषः च) और आशीर्वाद या आशाएं, (प्रशिषः च) और प्रकृष्ट-शासन, (संशिषः) सम्यक्-शासन, (याः) जो (विशिषः च) और विविध प्रकार के शासन, (चित्तानि) नाना प्रकार के विचार या मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार, या चित्तवृत्तियां, (संकल्पाः) विविध संकल्प - (अनु) तदनन्तर (शरीरम्) शरीर में (प्राविशन्) प्रविष्ट हुए।
विषय
मन्यु रूप परमेश्वर का वर्णन।
भावार्थ
(आशिषः च) समस्त आशीर्वाद, अभिलषित फलों की आशाएं और (प्रशिषः च) समस्त प्रशासन, अपने से छोटे और निम्न पुरुषों के प्रति आज्ञाएं (संशिषः) समान पुरुषों के प्रति अनुज्ञाएं और सम्मति और (याः विशिषश्च) अन्य नाना प्रकार की जो विशेष रूप से कही गई आज्ञाएं या मनोरथ हैं (चित्तानि) समस्त चित्त, विचार और (सर्वे संकल्पाः) समस्त संकल्प विकल्प (शरीरम् अनु प्राविशन्) शरीर के भीतर प्रविष्ट होते हैं।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
कौरुपथिर्ऋषिः। अध्यात्मं मन्युर्देवता। १-३२, ३४ अनुष्टुभः, ३३ पथ्यापंक्तिः। चतुश्चत्वारिंशदृचं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Constitution of Man
Meaning
Blessings and benedictions, rules and injunctions, orders and directions, distinctions and specialisations, all that there are, thoughts and memories, intentions and vows of discipline followed and entered the human body.
Translation
Both blessings (asis) and precepts (prasis), demands (samsis) and explanation (visis), thoughts, all devisings, entered the body afterward.
Translation
Earnest desires, all commends, directions and whatever are known as admonishments, reflections and all deliberate activities entered the body.
Translation
All earnest wishes, all commands, directions, and admonishments, reflections, all deliberate plans entered the body as a home.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
२७−(आशिषः) आङः शासु इच्छायाम्-क्विप्। उपधाया इत्वम्। आशीर्वादाः। हितप्रार्थनाः (प्रशिषः) शासु अनुशिष्टौ-क्विप्। उत्तमानि शासनानि (संशिषः) सम्यक् शासनानि। प्रबन्धकर्माणि (विशिषः) विशेषपरामर्शाः (च) (याः) (चित्तानि) विचाराः (सर्वे) (सङ्कल्पाः) दृढमनोरथाः। अन्यत् पूर्ववत् ॥
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