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अथर्ववेद के काण्ड - 11 के सूक्त 8 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 8/ मन्त्र 30
    ऋषिः - कौरुपथिः देवता - अध्यात्मम्, मन्युः छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - अध्यात्म सूक्त
    65

    या आपो॒ याश्च॑ दे॒वता॒ या वि॒राड्ब्रह्म॑णा स॒ह। शरी॑रं॒ ब्रह्म॒ प्रावि॑श॒च्छरी॒रेऽधि॑ प्र॒जाप॑तिः ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    या: । आप॑: । या: । च॒ । दे॒वता॑: । या । वि॒ऽराट् । ब्रह्म॑णा । स॒ह । शरी॑रम् । ब्रह्म॑ । प्र । अ॒वि॒श॒त् । शरी॑रे । अधि॑ । प्र॒जाऽप॑ति: ॥१०.३०॥


    स्वर रहित मन्त्र

    या आपो याश्च देवता या विराड्ब्रह्मणा सह। शरीरं ब्रह्म प्राविशच्छरीरेऽधि प्रजापतिः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    या: । आप: । या: । च । देवता: । या । विऽराट् । ब्रह्मणा । सह । शरीरम् । ब्रह्म । प्र । अविशत् । शरीरे । अधि । प्रजाऽपति: ॥१०.३०॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 11; सूक्त » 8; मन्त्र » 30
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    सब जगत् के कारण परमात्मा का उपदेश।

    पदार्थ

    (याः) जो (आपः) व्यापक [इन्द्रियों की शक्तियाँ] (च) और (याः) जो (देवताः) दिव्य गुणवाले [इन्द्रियों के गोलक] हैं, और (या) जो (विराट्) विराट् [विविध प्रकार शोभायमान प्रकृति] (ब्रह्मणा सह) ब्रह्म [परमात्मा] के साथ है, [इस सब ने और] (ब्रह्म) अन्न ने (शरीरम्) शरीर में (प्र अविशत्) प्रवेश किया, और (प्रजापतिः) प्रजापति [इन्द्रिय आदि प्रजाओं का स्वामी, जीवात्मा] (शरीरे) शरीर में (अधि) अधिकारपूर्वक [ठहरा] ॥३०॥

    भावार्थ

    परमात्मा ने जीव के शरीर में इन्द्रियों को उनकी शक्तियों सहित प्रकृति द्वारा रचा और शरीरपुष्टि के लिये अन्न आदि पदार्थ देकर सबका अधिष्ठाता जीवात्मा को किया ॥३०॥

    टिप्पणी

    ३०−(याः) (आपः) आप आपनानि-निरु० १२।३७। व्यापकानीन्द्रियसामर्थ्यानि (याः) (च) (देवताः) दिव्यगुणानीन्द्रियच्छिद्राणि (या) (विराट्) विविधराजमाना प्रकृतिः (ब्रह्मणा) परमात्मना (सह) (शरीरम्) (ब्रह्म) अन्नम्-निघ० २।७। (प्राविशत्) (शरीरे) (अधि) अधिकारपूर्वकम् (प्रजापतिः) इन्द्रियादिप्रजानां पालको जीवात्मा-अतिष्ठत् इति शेषः ॥

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    विषय

    विराट् ब्रह्मणा सह

    पदार्थ

    १. (या: आप:) = जो 'आस्नेयी वास्तेयी' आदि जल हैं [११।८।२८], (याः च देवता:) = जो इन्द्रियों के अधिष्ठातृदेव सूर्य आदि हैं, और (या विराट्) = जो प्रभु की विशिष्ट शक्ति हैं, वे (ब्रह्मणा सह) = ब्रह्म के साथ (शरीरं प्राविशत्) = शरीर में प्रविष्ट होती हैं। इस शरीर में ब्रह्म [प्राविशत्]-प्रभु का प्रवेश होता है। वही सबका अन्तर्यामी है। शरीरे (अधि प्रजापतिः) = इस शरीर में प्रजाओं का पालक [पुत्राधुत्पादक] जीव रहता है। यह जीव के विविध भोगों का स्थान बनता है।

    भावार्थ

    शरीर में अपनी प्रकृतिरूप शक्ति के साथ ब्रा का भी निवास है-वे प्रभु तो अन्तर्यामिरूप से यहाँ रह ही रहे हैं। शरीर में भोगों को भोगनेवाला जीव भी प्रजापति बनकर रह रहा है।

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    भाषार्थ

    (यः) जो (आपः) जल [मन्त्र २८ तथा २९] (याः च) और जो (देवताः) देवता [पूर्वमन्त्रों में कथित], (ब्रह्मणा सह या विराट्) ब्रह्म के साथ रहने वाली ब्रह्म की सहयोगिनी जो विराट् अर्थात् संसार के विविध रूपों में दीप्यमान प्रकृति है [जिसे कि मन्त्र १ में जाया कहा है] वह, (ब्रह्म) तथा ब्रह्म (शरीरम् प्राविशत्) शरीर में प्रविष्ट हुआ, (शरीरे अधि) और शरीर में अधिष्ठाता (प्रजापतिः) उत्पन्न सन्तानों का उत्पादक तथा पालक जीवात्मा हुआ।

    टिप्पणी

    [विराट् = वि + राजृ (दीप्तौ)। प्रजापतिः = प्रजानां पालयिता पुत्राद्युत्पादको जीवः (सायण)]।

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    विषय

    मन्यु रूप परमेश्वर का वर्णन।

    भावार्थ

    (याः आपः) जो ‘आपः’ और (याः च देवताः) जो अन्य देवता प्राणादि (या विराट्) जो विराट् आत्मा की विशेष शक्ति (ब्रह्मणा सह) ब्रह्म के साथ है वह ब्रह्म = अन्न रूप होकर (शरीरं प्राविशत्) शरीर में प्रविष्ट होता है। (शरीरे अधि प्रजापतिः) उसी शरीर में प्रजापति अर्थात् इन्द, आत्मा, अधिष्ठाता रूप से विद्यमान रहता है।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    कौरुपथिर्ऋषिः। अध्यात्मं मन्युर्देवता। १-३२, ३४ अनुष्टुभः, ३३ पथ्यापंक्तिः। चतुश्चत्वारिंशदृचं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Constitution of Man

    Meaning

    All waters, divine powers of sense and mind, Virat, i.e., Prakrti, consort with Brahma, and Brahma and food entered the body, and over all, body, senses and mind, was Prajapati, jiva, the individual soul.

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    Translation

    What waters (there are), and what deities, what viraj, with brahman; brahman entered the body; on (adhi) the body (is) Prajapati.

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    Translation

    All those waters, all those physical forces or elements and virat which is with Brahman, the supporting power enter the body and Prajapati, the soul administers the whole body.

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    Translation

    All innate forces of the organs, their globes, Matter, with God by its side, and food passed into the body. Soul is Lord thereof.

    Footnote

    व्रह्म—अन्नम—निo घo 217.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ३०−(याः) (आपः) आप आपनानि-निरु० १२।३७। व्यापकानीन्द्रियसामर्थ्यानि (याः) (च) (देवताः) दिव्यगुणानीन्द्रियच्छिद्राणि (या) (विराट्) विविधराजमाना प्रकृतिः (ब्रह्मणा) परमात्मना (सह) (शरीरम्) (ब्रह्म) अन्नम्-निघ० २।७। (प्राविशत्) (शरीरे) (अधि) अधिकारपूर्वकम् (प्रजापतिः) इन्द्रियादिप्रजानां पालको जीवात्मा-अतिष्ठत् इति शेषः ॥

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