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अथर्ववेद के काण्ड - 11 के सूक्त 8 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 8/ मन्त्र 3
    ऋषिः - कौरुपथिः देवता - अध्यात्मम्, मन्युः छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - अध्यात्म सूक्त
    76

    दश॑ सा॒कम॑जायन्त दे॒वा दे॒वेभ्यः॑ पु॒रा। यो वै तान्वि॒द्यात्प्र॒त्यक्षं॒ स वा अ॒द्य म॒हद्व॑देत् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    दश॑ । सा॒कम् । अ॒जा॒य॒न्त॒ । दे॒वा: । दे॒वेभ्य॑: । पु॒रा । य: । वै । तान् । वि॒द्यात् । प्र॒ति॒ऽअक्ष॑म् । स: । वै । अ॒द्य । म॒हत् । व॒दे॒त् ॥१०.३॥


    स्वर रहित मन्त्र

    दश साकमजायन्त देवा देवेभ्यः पुरा। यो वै तान्विद्यात्प्रत्यक्षं स वा अद्य महद्वदेत् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    दश । साकम् । अजायन्त । देवा: । देवेभ्य: । पुरा । य: । वै । तान् । विद्यात् । प्रतिऽअक्षम् । स: । वै । अद्य । महत् । वदेत् ॥१०.३॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 11; सूक्त » 8; मन्त्र » 3
    Acknowledgment

    हिन्दी (5)

    विषय

    सब जगत् के कारण परमात्मा का उपदेश।

    पदार्थ

    (दश देवाः) दस दिव्य पदार्थ [पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय] (पुरा) पूर्व काल में [वर्तमान] (देवेभ्यः) दिव्य पदार्थों [कर्मफलों] से (साकम्) परस्पर मिले हुए (अजायन्त) उत्पन्न हुए। (यः) जो पुरुष (वै) निश्चय करके (तान्) उनको (प्रत्यक्षम्) प्रत्यक्ष (विद्यात्) जान लेवे, (सः) वह (वै) ही (अद्य) आज (महत्) महान् [ब्रह्म] को (वदेत्) बतलावे ॥३॥

    भावार्थ

    फिर उस ब्रह्म के सामर्थ्य से प्राणियों के पूर्वसंचित कर्म अनुसार पाँच ज्ञानेन्द्रिय, कान, त्वचा, नेत्र, जिह्वा, नासिका और पाँच कर्मेन्द्रिय वाक्, हाथ, पाँव, पायु, उपस्थ, कर्मों के जानने और करने के लिये उत्पन्न हुए। सूक्ष्मदर्शी पुरुष ही इसको जानकर परमात्मा का उपदेश करते हैं ॥३॥

    टिप्पणी

    ३−(दश) दशसंख्याकाः (साकम्) सह (अजायन्त) प्रादुरभवन् (देवाः) स्वस्वविषयप्रकाशनशीलानि ज्ञानकर्मेन्द्रियाणि (देवेभ्यः) पञ्चमी विभक्तिः। दिव्यपदार्थेभ्यः। पूर्वकर्मफलानां सकाशात् (पुरा) पुरातनकाले वर्तमानेभ्यः (यः) विवेकी (वै) (तान्) (विद्यात्) जानीयात् (प्रत्यक्षम्) साक्षात्कारेण (सः) (वै) (अद्य) अस्मिन् दिने (महत्) पूजनीयं ब्रह्म (वदेत्) उपदिशेत् ॥

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    पदार्थ

    शब्दार्थ =  ( दश देवाः ) = पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ ये दस दिव्य पदार्थ  ( पुरा ) = पूर्वकाल में  ( देवेभ्य: ) = कर्म फलों से  ( साकम् ) = परस्पर मिले हुए  ( अजायन्त ) = पैदा हुए  ( यो वै ) = जो पुरुष निश्चय करके  ( तान् प्रत्यक्षम् विद्यात् ) = उनको निस्सन्देह जान लेवे  ( स वै ) = वही  ( अद्य ) = आज  ( महद् ) = बड़े परमात्मा का  ( वदेत् ) = उपदेश करे। 


     

    भावार्थ

    भावार्थ = प्राणियों के पूर्व सञ्चित कर्मों से परमेश्वर उनको पाँच ज्ञानेन्द्रियां, पाँच कर्मेन्द्रियाँ प्रदान करता है। इनमें श्रोत्र, नेत्र, जिह्वा, नासिका और त्वचा ये ज्ञान के साधन होने से ज्ञानेन्द्रिय कहलाते हैं। और वाक्, हाथ, पाँव, पायु, उपस्थ ये पाँच कर्मों के साधन होने से कर्मेन्द्रिय कहलाते हैं । ये दस इन्द्रिय और इनके कर्मों से परे परमात्मा देव हैं । उनको जानकर विद्वान् पुरुष ही उस परमात्मा का उपदेश कर सकता है। अज्ञानी मूर्ख नहीं ।

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    विषय

    देवप्रत्यक्ष से महद् ब्रह्म का ज्ञान

    पदार्थ

    १. (पुरा) = सृष्टि के प्रारम्भ में (देवेभ्य:) = सूर्य आदि ब्रह्माण्ड के देवों से (दश देवा:) = शरीरस्थ चक्षु आदि दस देव (साकम् अजायन्त) = साथ-साथ प्रादुर्भूत हुए [सूर्यः चक्षुर्भूत्वा अक्षिणी प्राविशत्, अग्निर्वाग् भूत्वा मुखं प्राविशत्, वायुः प्राणो भूत्वा नासिके प्राविशत्०] २. (य:) = जो भी उपासक (वै) = निश्चय से (तान्) = उन देवों को (प्रत्यक्षं विद्यात्) = अपरोक्षरूप में जानता है-अर्थात् इन देवों का साक्षात्कार करता है, (सः वै) = वही निश्चय से (अद्य) = अब (महद् वदेत्) = देशकालकृत परिच्छेदरहित ब्रह्म को प्रतिपादित [उपदिष्ट] करता है। उसे इन देवों में प्रभु की महिमा दीखती है। यह महिमा उसे प्रभु का आभास प्राप्त कराती है।

    भावार्थ

    शरीर में ब्रह्माण्ड के सूर्य आदि देवों से चक्षु आदि देव उत्पन्न होते हैं। इन देवों को जाननेवाला ही प्रभु की महिमा को देखनेवाला बनता है।

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    भाषार्थ

    (पुरः) पहिले अर्थात् सृष्ट्यारम्भकाल में (देवेभ्यः) व्यापक दिव्य तत्त्वों से, (दश देवाः) दस व्यष्टि दिव्य शक्तियां (साकम्) साथ-साथ (अजायन्त) पैदा हुई। (यः) जो कोई (वै) निश्चयपूर्वक (तान् विद्यात्) उन्हें जानें, (सः) वह (वै) निश्चयपूर्वक (अद्य) आज (महद् वदेत्) बड़ी बात कहेगा।

    टिप्पणी

    [इन व्यष्टिरूप दस देवों का वर्णन मन्त्र ४ में हुआ प्रतीत होता है सायणाचार्य ने १० व्यष्टि देवों का वर्णन इस प्रकार किया है:- (१) दीव्यन्ति स्वस्वविषयं प्रकाशयन्तीति देवा ज्ञानकर्मेन्द्रियाणि। (२) यद्वा सप्त शीर्षण्याः१ प्राणाः, अवाञ्चौ, मुख्यः प्राण एकः। (३) अथवा "प्राणापानौ चक्षुः श्रोत्रम्” इत्युत्तरत्र वक्ष्यमाणा दश संख्याका देवाः। तथा "महत्" का अर्थ सायणाचार्य ने "ब्रह्म" किया है, जो कि महत् अर्थात् देशकालकृत परिच्छेद रहित तथा सर्वंगत है।] [१. "कः सप्त खानि वि ततर्द श्रीर्षणि कर्णाविमौ नासिके चक्षुषी मुखम्" (अथर्व० १०।२।६)। अवाञ्चौ= गुदायां लिङ्गे च। मुख्यः= मुखस्य प्राण, जिस द्वारा भोजन खाया जाता है।]

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    विषय

    मन्यु रूप परमेश्वर का वर्णन।

    भावार्थ

    (देवेभ्यः) देव, अग्नि आदि से भी पूर्व (दश देवाः) दश देव (साकम् अजायन्त) एक साथ प्रादुर्भूत हुए। (यः वै) जो पुरुष भी (तान् प्रत्यक्षं विद्यात्) उनको साक्षात् ज्ञान कर लेता है (स वा अद्य) वह पुरुष ही (महद् वदेत्) उस ‘महत्’ ब्रह्म का उपदेश कर सकता है। ‘दश देवाः’— ‘ज्ञानकर्मेन्द्रियाणि’ इति सायणः। ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्दिय। अथवा वेद स्वयं अगले मन्त्र में कहेगा। ‘देवेभ्यः पुरा देवाः’ देवों से पूर्व उत्पन्न देव प्राण अपान आदि हैं। इनकी उत्पत्ति का प्रकरण ऐतरेयोपनिषत् प्रथम द्वितीय खण्ड में देखो। तमभ्यतपत्। तस्याभितप्तस्य मुखं निरभिद्यत। यथाण्डम्। मुखाद् वाग्, वाचोप्रग्निः। नासिके निरभिद्येतां नासिकाभ्यां प्राणः प्राणाद्वायुः। इत्यादि। अर्थात्—अग्नि वायु आदि के पूर्व वाक्, प्राण आदि का प्रादुर्भाव हुआ।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    कौरुपथिर्ऋषिः। अध्यात्मं मन्युर्देवता। १-३२, ३४ अनुष्टुभः, ३३ पथ्यापंक्तिः। चतुश्चत्वारिंशदृचं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Constitution of Man

    Meaning

    In the beginning, from the divine powers of Prakrti, Rtam and Satyam, ten divine mutations of existentially activated Prakrti called Mahat were evolved. One who would know and directly describe them today would say something really great. (These ten could be described as ten elements, i.e., five subtle elements and five gross elements, or they could be described as ten pranas, or ten senses of perception and volition.)

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    Translation

    Ten gods were born together from gods of old: whoever may know them plainly, he verily may talk big to-day.

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    Translation

    The ten luminous elements or forces, at the first state of creation, came out together from their most powerful causes. Exclusively he who certainly knows these elements directly can speak of the great Supreme spirit.

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    Translation

    Ten forces were created simultaneously as the fruit of our actions in the past. He who knows them distinctly is competent to speak of God.

    Footnote

    Ten forces: Five organs of cognition (jnan) i.e., (1) Ear (hearing) (2) Skin (touch) (3) Eye (sight) (4) Tongue (taste) (5) Nose (smell) and five organs of action (1) Speech (2) Hand (3) Foot (4) Anus (5) Penis.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ३−(दश) दशसंख्याकाः (साकम्) सह (अजायन्त) प्रादुरभवन् (देवाः) स्वस्वविषयप्रकाशनशीलानि ज्ञानकर्मेन्द्रियाणि (देवेभ्यः) पञ्चमी विभक्तिः। दिव्यपदार्थेभ्यः। पूर्वकर्मफलानां सकाशात् (पुरा) पुरातनकाले वर्तमानेभ्यः (यः) विवेकी (वै) (तान्) (विद्यात्) जानीयात् (प्रत्यक्षम्) साक्षात्कारेण (सः) (वै) (अद्य) अस्मिन् दिने (महत्) पूजनीयं ब्रह्म (वदेत्) उपदिशेत् ॥

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    बंगाली (1)

    পদার্থ

    দশ সাকমজায়ন্ত দেবা দেবেভ্যঃ পুরা ।

    য়ো বৈ তান্ বিদ্যাৎ প্রত্যক্ষং স বা অদ্য মহদ্বদেৎ ।।১০০।।

    (অথর্ব ১১।৮।৩)

    পদার্থঃ (দশ দেবা) পঞ্চ জ্ঞানেন্দ্রিয় এবং পঞ্চ কর্মেন্দ্রিয়, এই দশ দিব্য পদার্থ (পুরা) পূর্বকালে (দেবেভ্যঃ) কর্ম ফল দ্বারা (সাকম্) পরস্পর মিলিত হয়ে (অজায়ন্ত) উৎপন্ন হয়েছে । (য়ঃ বৈ) যে ব্যক্তি নিশ্চিতরূপে (তান্ প্রত্যক্ষম্ বিদ্যাৎ) এদের নিঃসন্দেহভাবে জানতে পারবেন, (সঃ বৈ) তিনিই (অদ্য) আজ (মহৎ) মহৎ পরমাত্মার বিষয়ে (বদেৎ) উপদেশ প্রদান করবেন।

     

    ভাবার্থ

    ভাবার্থঃ প্রাণীদের পূর্ব সঞ্চিত কর্ম দ্বারা পরমেশ্বর তাদের পাঁচ জ্ঞান ইন্দ্রিয় ও পাঁচ কর্ম ইন্দ্রিয় প্রদান করেন। এগুলোর মধ্যে কর্ণ, নেত্র, জিহ্বা, নাসিকা এবং ত্বক এসব জ্ঞানের সাধন বলে এদের জ্ঞানেন্দ্রিয় বলে। অপর দিকে বাক্য, হস্ত, পদ, পায়ু এবং উপস্থ এই পাঁচটি কর্মের সাধন বিধায় এদের কর্মেন্দ্রিয় বলে । এই দশ ইন্দ্রিয় এবং এদের কর্ম দ্বারা পরমাত্মাদেবকে জানতে হবে। তাঁকে জেনেই বিদ্বান পুরুষ সেই পরমাত্মার বিষয়ে উপদেশ প্রদান করতে পারেন।।১০০।।

    ।।ও৩ম্ শান্তিঃ শান্তিঃ শান্তিঃ।।

     

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