अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 8/ मन्त्र 9
ऋषिः - कौरुपथिः
देवता - अध्यात्मम्, मन्युः
छन्दः - अनुष्टुप्
सूक्तम् - अध्यात्म सूक्त
67
इन्द्रा॒दिन्द्रः॒ सोमा॒त्सोमो॑ अ॒ग्नेर॒ग्निर॑जायत। त्वष्टा॑ ह जज्ञे॒ त्वष्टु॑र्धा॒तुर्धा॒ताजा॑यत ॥
स्वर सहित पद पाठइन्द्रा॑त् । इन्द्र॑: । सोमा॑त् । सोम॑: । अ॒ग्ने: । अ॒ग्नि: । अ॒जा॒य॒त॒ । त्वष्टा॑ । ह॒ । ज॒ज्ञे॒ । त्वष्टु॑: । धा॒तु: । धा॒ता । अ॒जा॒य॒त॒ ॥१०.९॥
स्वर रहित मन्त्र
इन्द्रादिन्द्रः सोमात्सोमो अग्नेरग्निरजायत। त्वष्टा ह जज्ञे त्वष्टुर्धातुर्धाताजायत ॥
स्वर रहित पद पाठइन्द्रात् । इन्द्र: । सोमात् । सोम: । अग्ने: । अग्नि: । अजायत । त्वष्टा । ह । जज्ञे । त्वष्टु: । धातु: । धाता । अजायत ॥१०.९॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
सब जगत् के कारण परमात्मा का उपदेश।
पदार्थ
(इन्द्रात्) इन्द्र [पूर्वकल्पवर्ती मेघ] से (इन्द्रः) इन्द्र [मेघ], (सोमात्) सोम [प्रेरक वायु] से (सोमः) सोम [प्रेरक वायु], (अग्नेः) अग्नि [सूर्य आदि तेज] से (अग्निः) अग्नि [सूर्य आदि तेज] (अजायत) उत्पन्न हुआ है। (त्वष्टा) त्वष्टा [शरीर आदि का कारण पृथिवी तत्त्व] (ह) निश्चय करके (त्वष्टुः) त्वष्टा [शरीर आदि के कारण पृथिवी तत्त्व] से (जज्ञे) प्रकट हुआ है और (धातुः) धाता [धारण करनेवाले आकाश] से (धाता) धाता [धारण करनेवाला आकाश] (अजायत) उत्पन्न हुआ है ॥९॥
भावार्थ
जो पदार्थ प्रलय में परमाणुरूप थे, वे पूर्व कल्प के समान इस कल्प में भी ईश्वरसामर्थ्य से उत्पन्न हुए हैं ॥९॥ऋग्वेद १०।१९०।३। में ऐसा वर्णन है−(सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत्) सूर्य और चन्द्रमा को धाता [सर्वधारक परमेश्वर] ने पूर्वकल्प के समान रचा है ॥
टिप्पणी
९−इन्द्रादिशब्दा व्याख्याताः-म० ८ (इन्द्रात्) मेघात् (इन्द्रः) मेघः (सोमात्) वायोः (सोमः) वायुः (अग्नेः) सूर्यादितापात् (अग्निः) (अजायत) (त्वष्टा) शरीरादिकारणं भूमितत्त्वम् (ह) एव (जज्ञे) प्रादुर्बभूव (त्वष्टुः) (धातुः) (धाता) आकाशः (अजायत) ॥
विषय
इन्द्र-से-इन्द्र, सोम-से-सोम
पदार्थ
१. (इन्द्र) = इन्द्र [मेष व विद्युत्] (कुतः अजायत) = किससे प्रादुर्भूत हुआ? (सोमः) = [पू प्रेरणे] यह प्रेरक वायु (कुतः) = कहाँ से उत्पन्न हो गई? (अग्निः कुत्त:) = [अजायत] अग्नि कहाँ से उत्पन्न हो गई। (त्वष्टा) = सब जीवों के शरीर का निर्माण करनेवाला पृथिवीतत्त्व (कुतः) = कहाँ से (समभवत्) = हुआ, धाता धारण करनेवाला वह सूर्य (कुतः अजायत) = कहाँ से हो गया? २. (इन्द्रात्) = पूर्वकल्प में जिस रूप में इन्द्र था उस इन्द्र से (इन्द्रः) = इदानीन्तन इन्द्र (अजायत) = प्रादुर्भूत हुआ। इसी प्रकार (सोमात् सोम:) = पूर्वकल्प के सोम से, यह इस कल्प का सोम हुआ। (अग्नेः अग्नि:) = पूर्वकल्प के अग्नितत्त्व ने इस कल्प का अग्नितत्त्व हुआ। (ह) = निश्चय से (त्वष्टु:) = पूर्वकल्प के पृथिवी तत्त्व से (त्वष्टा जज्ञे) = यह (त्वष्टा) = पृथिवी तत्त्व प्रादुर्भूत हुआ। (धातुः) = धाता (अजायत) = पूर्वकल्प के धाता से इस कल्प का धाता हो गया।
भावार्थ
जैसे पूर्वकल्प में सृष्टि की रचना हुई थी ठीक उसी प्रकार इस कल्प में भी सृष्टि-रचना हुई। [पूर्व-पूर्वसृष्टयनुसारेणैव इदानीन्तना अपि इन्द्रादयो देवाः सृष्टाः । सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत्-सा०]
भाषार्थ
(इन्द्रात्) समष्टि विद्युत् से (इन्द्रः) शरीरस्थ१ व्यष्टि विद्युत्, (सोमात्) समष्टि जल से (सोमः) शरीरस्थ व्यष्टि जल अर्थात् रस-रक्त, (अग्नेः) समष्टि अग्नि से (अग्निः) शरीरस्थ व्यष्टि अग्नि (अजायत) प्रादुर्भूत हुई। (स्तष्टुः) रूपनिर्माण करने वाले सूर्य से (ह) निश्चय से (त्वष्टा) रूपों के निर्माण करने की व्यष्टि शक्ति, (धातुः) धारण करने वाले समष्टि मेघ से (धाता) शरीरस्थ मूत्र (अजायत) प्रादुर्भूत हुआ।
टिप्पणी
[निरुक्त के अनुसार इन्द्र मध्यमस्थानी देवता है, सम्भवतः विद्युत्। अग्नि है सूर्य की अग्नि। सोम है सामान्य जल; सोमः = water (आप्टे)। त्वष्टा है सूर्य, सूर्य के प्रकाश से वस्तुओं में विविध रूप उत्पन्न होते हैं, त्वष्टा = रूपकृत, "य इमे द्यावापृथिवी जनित्री रूपैरपिंशद्भुवनानि विश्वा । तमद्य होतरिषितो यजीयान्देवं त्वष्टारमिह यक्षि विद्वान् ॥ " (ऋ० १०।११०।९) में त्वष्टा के सम्बन्ध में "रूपैरशित्" का वर्णन हुआ है। अतः त्वष्टा है सूर्य। धाता है मेघ,- ये समष्टि जगत् के तत्त्व हैं। इन से इन्हीं नामों वाले शरीरस्थ व्यष्टि तत्व प्रकट हुए। मन्त्र में समष्टि जगत् और व्यष्टि जगत् में साम्य दर्शाया है। मेघ, जलवृष्टि द्वारा अन्नोत्पादक होने से सब प्राणियों का धारण-पोषण करता है, अतः धाता है। बृहदा० उप० अध्याय १, ब्राह्मण १ में वर्षा और मूत्र में एकता दर्शाई है "यन्मेहति तद्वर्षति"। मेहन का अर्थ हैं, मूत्र-करना। मूत्र भी शरीर का धारक होने से व्यष्टि रूप में अधिष्ठाता है। मूत्रोत्पत्ति और मूत्रस्राव न होने से नाना रोग पैदा हो जाते हैं। मूत्रचिकित्सक तो शरीर के लिये मूत्र को महौषध कहते हैं। अथर्व ६।४४।३ में “रुद्रस्य मूत्रमस्यमृतस्य नाभिः" द्वारा रुद्र के मूत्र को “अमृत" कहा है। रुद्र का अर्थ है विद्युत्। उस के द्वारा वरसे वर्षा जल को मूत्र सदृश लाभकारी कहा है। अमृतम् उदकनाम (निघं० १।१२)। वर्षा जल स्वच्छ तथा गुणकारी होने से अमृतरूप है]। [१. महात्माओं के सिरों के चारों ओर प्रभामण्डल में शरीरस्थ विद्युत् ही चमकती है। इसी प्रकार हाथ की अङ्गुलियों द्वारा रोगी के रुग्णस्थान में विद्युत्प्रवेश कर रोगनिवृत्ति में भी शरीरस्थ विद्युत् का प्रयोग किया जाता है। चिकित्सा की इस विधि को "हस्त द्वारा शिवाभिमर्शन" कहते हैं, देखो (११/४/१६ की व्याख्या)। यद्यपि इन्द्र शब्द जीवात्मा के लिये भी प्रयुक्त होता है, परन्तु वह पैदा नहीं होता। मन्त्र में 'अजायत' शब्द का प्रयोग हुआ है, अतः मध्यस्थानी 'समष्टि विद्युत्' ही व्यष्टि शरीरस्थ विद्युत् प्रतीत होती है।]
विषय
मन्यु रूप परमेश्वर का वर्णन।
भावार्थ
(इन्द्रात् इन्द्रः) इन्द्र से इन्द्र उत्पन्न हुआ, (सोमान् सोमः) सोम से सोम उत्पन्न हुआ, (अग्नेः अग्निः अजायत) अग्नि से अग्नि उत्पन्न हुआ, (त्वष्टा ह त्वष्टुः जज्ञे) त्वष्टा से त्वष्टा उत्पन्न हुआ, (धातुः धाता अजायत) धाता से धाता उत्पन्न हुआ। अर्थात् इन्द्रादि देवों का पूर्व रूप भी इन्द्र आदि ही थे अर्थात् उनका उत्पादक मूलकारण भी इन्द्र आदि शक्ति सम्पन्न था इसलिये उससे वे उत्पन्न हुए।
टिप्पणी
(च०) ‘धाता धातुर्’ इति पैप्प० सं०।
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
कौरुपथिर्ऋषिः। अध्यात्मं मन्युर्देवता। १-३२, ३४ अनुष्टुभः, ३३ पथ्यापंक्तिः। चतुश्चत्वारिंशदृचं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Constitution of Man
Meaning
Indra arose from Indra, soma from Soma, agni arose from Agni, twashta was born of Tvashta, and dhata was born of Dhata.
Translation
From Indra Indra, from Soma Soma, from Agni Agni was born; ‘Tvastr was born’ from Tvastr; from Dhatr Dhatr was born.
Translation
lndra springs up from Indra, Soma takes origin from Soma; Agni comes to rise from Agni, cloudly envelops comes out from cloud and Dhatar, the airy motions from Dhatar, In which sphere and region and form stay.
Translation
Cloud from cloud, air from air, Sun from Sun sprang. Lightning from lightning was produced, Atmosphere was Atmosphere's origin.
Footnote
God created all these objects in this cycle in the same shape as they existed in the previous cycle of creation. See Rigveda, 10. 190.3 " सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वम अकल्पयत “ God has created the Sun and Moon in this cycle as He did in the last cycle of creation.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
९−इन्द्रादिशब्दा व्याख्याताः-म० ८ (इन्द्रात्) मेघात् (इन्द्रः) मेघः (सोमात्) वायोः (सोमः) वायुः (अग्नेः) सूर्यादितापात् (अग्निः) (अजायत) (त्वष्टा) शरीरादिकारणं भूमितत्त्वम् (ह) एव (जज्ञे) प्रादुर्बभूव (त्वष्टुः) (धातुः) (धाता) आकाशः (अजायत) ॥
Acknowledgment
Book Scanning By:
Sri Durga Prasad Agarwal
Typing By:
Misc Websites, Smt. Premlata Agarwal & Sri Ashish Joshi
Conversion to Unicode/OCR By:
Dr. Naresh Kumar Dhiman (Chair Professor, MDS University, Ajmer)
Donation for Typing/OCR By:
Sri Amit Upadhyay
First Proofing By:
Acharya Chandra Dutta Sharma
Second Proofing By:
Pending
Third Proofing By:
Pending
Donation for Proofing By:
Sri Dharampal Arya
Databasing By:
Sri Jitendra Bansal
Websiting By:
Sri Raj Kumar Arya
Donation For Websiting By:
N/A
Co-ordination By:
Sri Virendra Agarwal