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अथर्ववेद के काण्ड - 5 के सूक्त 18 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 18/ मन्त्र 1
    ऋषिः - मयोभूः देवता - ब्रह्मगवी छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - ब्रह्मगवी सूक्त
    119

    नैतां ते॑ दे॒वा अ॑ददु॒स्तुभ्यं॑ नृपते॒ अत्त॑वे। मा ब्रा॑ह्म॒णस्य॑ राजन्य॒ गां जि॑घत्सो अना॒द्याम् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    न । ए॒ताम् । ते॒ । दे॒वा: । अ॒द॒दु॒: । तुभ्य॑म् । नृ॒ऽप॒ते॒ । अत्त॑वे । मा । ब्रा॒ह्म॒णस्य॑ । रा॒ज॒न्य॒ । गाम् । जि॒घ॒त्स॒:। अ॒ना॒द्याम् ॥१८.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    नैतां ते देवा अददुस्तुभ्यं नृपते अत्तवे। मा ब्राह्मणस्य राजन्य गां जिघत्सो अनाद्याम् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    न । एताम् । ते । देवा: । अददु: । तुभ्यम् । नृऽपते । अत्तवे । मा । ब्राह्मणस्य । राजन्य । गाम् । जिघत्स:। अनाद्याम् ॥१८.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 5; सूक्त » 18; मन्त्र » 1
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    वेदविद्या की रक्षा का उपदेश।

    पदार्थ

    (नृपते) हे नरपति राजन् ! (ते) तेरे (देवाः) दिव्य गुणवाले पुरुषों ने (तुभ्यम्) तुझे (एताम्) इस [वाणी] को (अत्तवे) नाश करने को (न) नहीं (अददुः) दिया है। (राजन्य) हे राजन् ! (ब्राह्मणस्य) वेदवेत्ता पुरुष की (गाम्) वाणी को, (अनाद्याम्) जो नष्ट नहीं हो सकती है, (मा जिघत्सः) मत नाशकर ॥१॥

    भावार्थ

    राजा आप्त सत्यवादी वेदज्ञ पुरुष की वाणी में रह कर आनन्द करे ॥१॥

    टिप्पणी

    १−(न) निषेधे (एताम्) गाम् (ते) तव। अनुदात्तोऽयम् (देवाः) दिव्यगुणाः पुरुषाः (अददुः) दत्तवन्तः (तुभ्यम्) (नृपते) हे मनुष्यरक्षक राजन् (अत्तवे) तुमर्थे सेसेनसे०। पा० ३।४।९। इति अद भक्षणे नाशने च−तवेन्। नाशयितुम् (मा) निषेधे (ब्राह्मणस्य) वेदज्ञस्य। आप्तपुरुषस्य (राजन्य) अ० ५।१७।९। हे ऐश्वर्यवन् (गाम्) गमेर्डोः। उ० २।६७। इति गम्लृ गतौ, यद्वा, गै गाने−डो। गच्छति जानाति यया गीयते वा सा गौः। गौः, वाङ्नाम−निघ० १।११। वाणीम् (जिघत्सः) अद−सन्, घस्लृ इत्यादेशे लेटि रूपम्। नाशय (अनाद्याम्) अद-ण्यत्। केनापि नाशयितुमशक्याम् आप्तवचनत्वात् ॥

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    विषय

    ब्राह्मण की अनाद्या गौ

    पदार्थ

    १. प्रभुकृपा से राष्ट्र में ज्ञानी ब्राह्मणों की उत्पति होती है। इनके द्वारा राष्ट्र में ज्ञान का प्रसार होता है। यदि कोई राजा शक्ति के गर्व में इनकी वाणी पर प्रतिबन्ध लगा देता है, तो वह राजा राष्ट्र का अकल्याण ही करता है। (ते देवा:) = वे सब देव-सब प्राकृतिक शक्तियाँ, हे (नृपते) = राजन् ! (एताम्) = इस ब्राह्मणवाणी को (तुभ्यम्) = तेरे लिए (अददः) = देते हैं, (न अत्तवे) = खा जाने के लिए नहीं। राष्ट्र में उत्पन्न हुए-हुए इन ब्राह्मणों की वाणी पर तुम प्रतिबन्ध लगा दो, यह ठीक नहीं। २. हे (राजन्य) = प्रकृति का रञ्जन करनेवाले राजन्! (ब्राह्मणस्य) = ब्राह्मण की (गाम्) = वाणी को तू (मा जिघत्स:) = खा जाने की कामना मत कर, यह (अनाद्याम्) = खा जाने योग्य नहीं है। तुझे इन ज्ञान की वाणी को सुनना चाहिए और उसके अनुसार ही राष्ट्र के पालन की व्यवस्था करनी चाहिए।

    भावार्थ

    प्रभु व सब देव राष्ट्र में ज्ञानी ब्राह्मणों को जन्म देने का अनुग्रह करते हैं। एक अत्याचारी राजा इन ब्राह्मणों की वाणी पर प्रतिबन्ध लगाने की सोचता है। उसे इस वाणी को अनाद्या समझना चाहिए और उसपर किसी प्रकार का प्रतिबन्ध नहीं लगाना चाहिए।

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    भाषार्थ

    (नृपते) हे नरपति ! (ते देवाः) उन ब्राह्मण-देवों ने (तुभ्यम्) तुझे (अत्तवे) खाने के लिए (एताम् ) इस [परामर्श वाणी को] (न अददुः) नहीं दिया। (राजन्य) हे प्रशस्त राजन् ! (अनाद्याम् ) न खाने योग्य (ब्राह्मणस्य गाम्) ब्राह्मण की परामर्शवाणी को (मा जिघत्सः) खाने की इच्छा तू न कर ।

    टिप्पणी

    [गाम्, गौः वाङ्नाम (निघं० १।११)। ब्राह्मण=ब्रह्मज्ञ वेदज्ञ विद्वान्। देवा:=ब्राह्मणाः; ब्राह्मणों को 'भूदेवा' कहते हैं, ये ही पृथिवी के देव हैं। इनके दिये परामर्श की अवहेलना ही 'गोभक्षण' है।]

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    विषय

    ब्रह्मगवी का वर्णन।

    भावार्थ

    विद्या, प्रजा, पृथ्वी और गौ ये सब ब्राह्मण, विद्वान् पुरुष की गौ हैं। उसका मारना, खा लेना आदि किसी को करना उचित नहीं, इसी विषय का इस सूक्त में उपदेश करते हैं—हे (नृपते) समस्त नरों, मनुष्यों के परिपालक राजन् ! (ते देवाः) वे विद्वान् लोग (ते) तुझे राज्याभिषेक करते समय (एताम्) इस ब्राह्मण की गौ = पृथिवी और उस पर रहने वाली प्रजा और उनके गौ आदि पशु सब को (अत्तवे) खा डालने के लिये (न अददुः) नहीं देते हैं। हे (राजन्य) राजन् ! (अनाद्याम्) न खाने योग्य (ब्राह्मणस्य गां) ब्राह्मण की गौ को (मा जिघत्सः) मत खा, मत मार। राजा लोक-प्रजा की रक्षा करे न कि उनका खून चूसे और न उनको मृगों को सिंह के समान मार कर खावे।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    मयोभूर्ऋषिः। ब्रह्मगवी देवता। १-३, ६, ७, १०, १२, १४, १५ अनुष्टुभः। ४, ५, ८, ९, १३ त्रिष्टुभः। ४ भुरिक्। पञ्चदशर्चं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Brahma Gavi

    Meaning

    O ruler of the people, the divinities of nature and nobilities of humanity did not give this earth, this Vedic speech, this holy cow to you to eat, i.e., for exploitation, misappropriation and personal consumption. Do not try to eat up the Brahmana’s cow, it is inviolable, it is not something edible. It is not to be killed. (Brahmana in this hymn does not mean a caste, it means Brahma, the Supreme Being and any person wholly dedicated to Brahma. ‘Gau’ means the cow and all divine gifts of Brahma: nature, sun rays, moon, land, earth and the environment, the people, knowledge, culture, language, sense organs and, of course, the cow and all other useful animals. All these belong to Brahma, all these belong to humanity as trust, and humanity is to be taken as noble on its own as humanity. These do not belong to any particular person even if the person is a ruler. They belong to all and to every person as a trust. In this sense they belong to the ruler also but as a trustee of the people, not as a person, not as property. Hence the original term ‘Brahmana’s Gau’ is used in the translation in this wide sense. Every person’s share of God’s gifts is sacred, inviolable, un-encroachable.)

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    Subject

    Brahma - Gavi

    Translation

    O lord of men, the bounties of nature have not given you this (cow) to eat. O prince, do not desire to eat, an intellectual’s cow (brahma-gavi) which indeed is not eatable.

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    Translation

    [N.B. The Vedic term Gauh means speech, land, cow, organs and rays. In this hymn the word Brahmagavi stands to mean speech, land, cow etc of Brahmana. Any kind of injury inflicted upon cow of Brahman any sort of disobedience to the advice of Brahman and any sort of expropriation of the land of Brahman create dire consequences in the dominion which he belongs to as a citizen. He is the mind of the society. His advice should be obeyed and no harm should be done to his cow and his land. The hymn under translation teaches the importance of this theme.] O King ! the physical forces of the nature and the learned men have not given you this cow to devour (to seize and use in own interest). O King! let you not seek to eat of the cow of Brahman which none may eat.

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    Translation

    The sages, O King, have not bestowed this knowledge on thee for abuse! Seek not, O King, to destroy the Brahman's Vedic knowledge, which is unworthy of destruction. Brahman: A learned person who knows the Vedas.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    १−(न) निषेधे (एताम्) गाम् (ते) तव। अनुदात्तोऽयम् (देवाः) दिव्यगुणाः पुरुषाः (अददुः) दत्तवन्तः (तुभ्यम्) (नृपते) हे मनुष्यरक्षक राजन् (अत्तवे) तुमर्थे सेसेनसे०। पा० ३।४।९। इति अद भक्षणे नाशने च−तवेन्। नाशयितुम् (मा) निषेधे (ब्राह्मणस्य) वेदज्ञस्य। आप्तपुरुषस्य (राजन्य) अ० ५।१७।९। हे ऐश्वर्यवन् (गाम्) गमेर्डोः। उ० २।६७। इति गम्लृ गतौ, यद्वा, गै गाने−डो। गच्छति जानाति यया गीयते वा सा गौः। गौः, वाङ्नाम−निघ० १।११। वाणीम् (जिघत्सः) अद−सन्, घस्लृ इत्यादेशे लेटि रूपम्। नाशय (अनाद्याम्) अद-ण्यत्। केनापि नाशयितुमशक्याम् आप्तवचनत्वात् ॥

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