अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 18/ मन्त्र 8
ऋषिः - मयोभूः
देवता - ब्रह्मगवी
छन्दः - भुरिक्त्रिष्टुप्
सूक्तम् - ब्रह्मगवी सूक्त
48
जि॒ह्वा ज्या भव॑ति॒ कुल्म॑लं॒ वाङ्ना॑डी॒का दन्ता॒स्तप॑सा॒भिदि॑ग्धाः। तेभि॑र्ब्र॒ह्मा वि॑ध्यति देवपी॒यून् हृ॑द्ब॒लैर्धनु॑र्भिर्दे॒वजू॑तैः ॥
स्वर सहित पद पाठजि॒ह्वा । ज्या । भव॑ति । कुल्म॑लम् । वाक् । ना॒डी॒का: । दन्ता॑: । तप॑सा । अ॒भिऽदि॑ग्धा: । तेभि॑: । ब्र॒ह्मा । वि॒ध्य॒ति॒ । दे॒व॒ऽपी॒यून् । हृ॒त्ऽब॒लै: । धनु॑:ऽभि: । दे॒वऽजू॑तै: ॥१८.८॥
स्वर रहित मन्त्र
जिह्वा ज्या भवति कुल्मलं वाङ्नाडीका दन्तास्तपसाभिदिग्धाः। तेभिर्ब्रह्मा विध्यति देवपीयून् हृद्बलैर्धनुर्भिर्देवजूतैः ॥
स्वर रहित पद पाठजिह्वा । ज्या । भवति । कुल्मलम् । वाक् । नाडीका: । दन्ता: । तपसा । अभिऽदिग्धा: । तेभि: । ब्रह्मा । विध्यति । देवऽपीयून् । हृत्ऽबलै: । धनु:ऽभि: । देवऽजूतै: ॥१८.८॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
वेदविद्या की रक्षा का उपदेश।
पदार्थ
[ब्राह्मण की] (जिह्वा) जीभ (ज्या) धनुष् की डोरी, (वाक्) वाणी (कुल्मलम्) बाण का दण्डा (भवति) होती है और [उस की] (नाडीकाः) गले के भाग (तपसा) आग से (अभिदिग्धाः) पोते हुए (दन्ताः) तीर के दाँत हैं। (ब्रह्मा) ब्राह्मण (हृद्बलैः) हृदय तोड़नेवाले, (देवजूतैः) विद्वानों के भेजे हुए (तेभिः) उन (धनुर्भिः) धनुषों से (देवपीयून्) विद्वानों के सतानेवालों को (विध्यति) छेदता है ॥८॥
भावार्थ
विद्वान् मनुष्य अपने विद्याबल से दुष्टों का नाश कर देता है ॥८॥
टिप्पणी
८−(जिह्वा) रसना (ज्या) मौर्वी यथा (भवति) (कुल्मलम्) अ० २।३०।३। बाणदण्डछिद्रम् (वाक्) वाणी (नाडीकाः) नाड्यो विद्यन्तेऽस्य, नाडी-ठन्, छान्दसो दीर्घः। गलभागाः (दन्ताः) अ० ४।३।६। दन्तवत्तीक्ष्णाः शराणि (तपसा) तापकेनाग्निना (अभिदिग्धाः) अभिलिप्ताः (तेभिः) तैः (ब्रह्मा) ब्राह्मणः (विध्यति) छिनत्ति (देवपीयून्) म० ५। विद्वत्पीडकान् (हृद्बलैः) बल प्राणने वधे च−अच्। हृदयघातकैः (धनुर्भिः) चापैः (देवजूतैः) विद्वद्भिः प्रेरितैः ॥
विषय
ब्रह्मा द्वारा देवपीयुओं का वेधन
पदार्थ
१. ब्राह्मण की (जिह्वा) = जीभ (ज्या भवति) = धनुष की डोरी होती है, (वाक) = वाणी (कुल्मलम्) = धनुष का दण्ड हो जाती है और (तपसा अभिदिग्धाः) = तप व तेज से लिस (दन्ताः) = दाँत (नाडीका:) = 'नालीक' नामक बाण हो जाते हैं [न अलीक-न झूठे, अर्थात् शत्रु को अवश्य नष्ट करनेवाले]। २. (तेभि:) = उनके द्वारा (ब्रह्मा) = यह ज्ञानी (देवपीयून) = देवहिंसक राजाओं को (विध्यति) = बींधता है-नष्ट करता है, उन (धनुर्भि:) = धनुषों से बींधता है, जोकि (हृदबलैः) = हृदय की शक्ति से युक्त है तथा (दैवजूतैः) = दिव्य शक्तियों से प्रेरित हैं।
भावार्थ
तपस्वी, ज्ञानी ब्राह्मण की वाणी शत्रुवेधक शर के समान होती है। हृदय की शक्ति से सम्पन्न, दिव्यभाव से प्रेरित यह शर देवहिंसक राजा को विद्ध करता है।
भाषार्थ
(जिह्वा ज्या भवति) ब्राह्मण को जिह्वा धनुष की डोरी हो जाती है, (वाक्) वाणी हो जाती है (कुल्मलम्, नाडीका:) बाण का मूलभाग अर्थात पेदा, और नड़ से निर्मित बाणदण्ड (तपसा अभि दिग्धा: दन्ताः) तप से तेज हुए दाँत, बाण के अग्रभाग में लगे लोहदन्त [अथर्व० ११।१२।३] हो जाते हैं। (देवजूतैः) सब ब्राह्मण-देवों द्वारा प्रेरित और (हृद्बलै:) हृदयों के बलों द्वारा प्रेरित (तेभिः धनुर्भिः) उन धनुषों द्वारा (ब्रह्मा) चतुर्वेद-विद् विद्वान् (देवपीयून्) ब्राह्मण देवों के हिंसकों को (विध्यति) वेधता है।
टिप्पणी
[ब्रह्मा=चतुर्वेदों का ज्ञाता, यथा "ब्रह्मा त्वो वदति जातविद्याम्" (ऋ० १०।७१।११), (निरुक्त १।३।८) धनुर्भिः में बहुवचन धनुषों के बहुत्व का सूचक है। दन्ताः=अथवा 'मृगो अस्या दन्ता: (ऋ० ६।७५।११) में मृगशृङ्ग का बना दाँत।]
विषय
ब्रह्मगवी का वर्णन।
भावार्थ
ब्राह्मण की शक्तियों का वर्णन करते हैं। ब्राह्मण की (जिह्वा) जीभ (ज्या भवति) धनुष की डोर होजाती है, और (वाग्) वाणी (कुल्मलं) धनुष का दण्ड हो जाता है, और (तपसा) तेज और तपस्या से (अभि-दिग्धाः) लिपे हुए (दन्ताः) दांत (नाडीकाः) नालीक नाम के बाण, छर्रे और तीरों के समान होजाते हैं। (ब्रह्मा) ब्रह्मवेद का ज्ञाता विद्वान् तपस्वी पुरुष (तेभिः) उन (देवजूतैः) विद्वानों से या दिव्य शक्तियों से युक्त, (हृद्बलैः) हृदय, मन की शक्ति से सम्पन्न (धनुर्भिः) ज्ञानमय धनुषों, अस्त्रों से (देव-पीयून) विद्वानों के शत्रुओं पर (विध्यति) प्रहार करता है।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
मयोभूर्ऋषिः। ब्रह्मगवी देवता। १-३, ६, ७, १०, १२, १४, १५ अनुष्टुभः। ४, ५, ८, ९, १३ त्रिष्टुभः। ४ भुरिक्। पञ्चदशर्चं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Brahma Gavi
Meaning
The Brahmana’s tongue becomes the bow string, his speech, the arrow head, his throat and teeth, the shaft and tips of the arrow tempered with fire. With these forces of the mind for bow and arrow initiated and accelerated by the divinities, Brahma takes up the bow and shoots the revilers of divinity.
Translation
The tongue becomes the bow-string, the speech the arrow's neck, and the teeth sharpened with heat becomes arrowheads; with those bows, strengthened with spirit and sped by the enlightened ones, an intellectual pierces the abusers of the enlightened ones.
Translation
Brahman's tongue is string of bow, his voice becomes the stalk of arrow, his teeth sharpened with austerity and hardship become the arrows and he pierce she sacrilegious men within heart with these bows which are armed with celestial powers and spiritual strength.
Translation
His tongue acts as a bow-string, his voice an arrow's neck, his teeth sharpened through penance act as heads of arrows. With these the Brahman pierces through blasphemers, with god-sped bows that quell the hearts.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
८−(जिह्वा) रसना (ज्या) मौर्वी यथा (भवति) (कुल्मलम्) अ० २।३०।३। बाणदण्डछिद्रम् (वाक्) वाणी (नाडीकाः) नाड्यो विद्यन्तेऽस्य, नाडी-ठन्, छान्दसो दीर्घः। गलभागाः (दन्ताः) अ० ४।३।६। दन्तवत्तीक्ष्णाः शराणि (तपसा) तापकेनाग्निना (अभिदिग्धाः) अभिलिप्ताः (तेभिः) तैः (ब्रह्मा) ब्राह्मणः (विध्यति) छिनत्ति (देवपीयून्) म० ५। विद्वत्पीडकान् (हृद्बलैः) बल प्राणने वधे च−अच्। हृदयघातकैः (धनुर्भिः) चापैः (देवजूतैः) विद्वद्भिः प्रेरितैः ॥
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