अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 4/ मन्त्र 11
य इन्द्र॑ इव दे॒वेषु॒ गोष्वे॑ति वि॒वाव॑दत्। तस्य॑ ऋष॒भस्याङ्गा॑नि ब्र॒ह्मा सं स्तौ॑तु भ॒द्रया॑ ॥
स्वर सहित पद पाठय: । इन्द्र॑:ऽइव । दे॒वेषु॑ । गोषु॑ । एति॑ । वि॒ऽवाव॑दत् । तस्य॑ । ऋ॒ष॒भस्य॑ । अङ्गा॑नि । ब्र॒ह्मा । सम् । स्तौ॒तु॒ । भ॒द्रया॑ ॥४.११॥
स्वर रहित मन्त्र
य इन्द्र इव देवेषु गोष्वेति विवावदत्। तस्य ऋषभस्याङ्गानि ब्रह्मा सं स्तौतु भद्रया ॥
स्वर रहित पद पाठय: । इन्द्र:ऽइव । देवेषु । गोषु । एति । विऽवावदत् । तस्य । ऋषभस्य । अङ्गानि । ब्रह्मा । सम् । स्तौतु । भद्रया ॥४.११॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
आत्मा की उन्नति का उपदेश।
पदार्थ
(इन्द्र इव) बड़े ऐश्वर्यवान् पुरुष के समान (देवेषु) विद्वानों के बीच, (यः) जो [परमेश्वर] (विवावदत्) अनेक प्रकार बोलता हुआ (गोषु) भूमि आदि लोकों में (एति) चलता है, (तस्य) उस (ऋषभस्य) सर्वव्यापक के (अङ्गानि) अङ्गों को (ब्रह्मा) ब्रह्मा [चारों वेद जाननेवाला विद्वान्] (भद्रया) कल्याणी रीति से (सम्) भले प्रकार (स्तौतु) सत्कार से वर्णन करे ॥११॥
भावार्थ
जो परमेश्वर वेद द्वारा अनेक नियमों का उपदेश करता हुआ सर्वलोकनियन्ता है, विद्वान् पुरुष उसके गुणों की महिमा को यथावत् जाने ॥११॥
टिप्पणी
११−(यः) ऋषभः। परमेश्वरः (इन्द्रः) प्रतापी मनुष्यः (देवेषु) विद्वत्सु (गोषु) गौः पृथिवी-निघ० १।१। पृथिव्यादिलोकेषु (एति) गच्छति। व्याप्नोति (विवावदत्) वि+वद व्यक्तायां वाचि यङ्लुकि-शतृ। अनेकप्रकारेण प्रवदन् सन् (तस्य) (ऋषभस्य) म० १। सर्वव्यापकस्य (अङ्गानि) गुणावयवान् (ब्रह्मा) चतुर्वेदज्ञो विद्वान् (सम्) सम्यक् (स्तौतु) अर्चतु-निघ० ३।१४। (भद्रया) कल्याण्या रीत्या ॥
विषय
ब्रह्मा सं स्तौतु भद्रया
पदार्थ
१. (यः) = जो प्रभु (देवेषु इन्द्रः इव) = देवों में इन्द्र के समान हैं। इन्द्रियाँ देव हैं, इनका अधिष्ठाता जीवात्मा 'इन्द्र' है। जैसे इन्द्रियों का अधिष्ठाता जीव है, उसी प्रकार प्रभु सूर्यादि देवों का अधिष्ठाता है। ये प्रभु (गोषु) = वेदवाणियों में (विवावदत्) = खूब ही ज्ञानोपदेश करते हुए (एति) = गति करते हैं-हमें प्राप्त होते हैं। २. (तस्य) = उस (ऋषभस्य) = सर्वव्यापक व सर्वद्रष्टा प्रभु के (अङ्गानि) = अङ्गों का (ब्रह्मा) = चतुर्वेदवेत्ता विद्वान् (भद्रया संस्तौतु) = कल्याणी वेदवाणी द्वारा स्तवन करे।
भावार्थ
प्रभु सूर्यादि देवों के इसप्रकार अधिष्ठाता है, जैसेकि जीवात्मा इन्द्रियों का। वे प्रभु वेदवाणी द्वारा हमें कर्त्तव्य का उपदेश देते हैं। ब्रह्मा प्रभु का वर्णन करने में आनन्द का अनुभव करे।
भाषार्थ
(देवेषु) देवों में (इन्द्रः इव) इन्द्र के सदृश (यः) जो ऋषभ, (गोषु) गौओं में, (विवावदत्) विविध प्रकार से बोलता हुआ (एति) आता है, (तस्य ऋषभस्य) उस ऋषभ के (अङ्गानि) अङ्गों को, (ब्रह्मा) चारों वेदों का विद्वान् (भद्रया) भद्ररीति से, (संस्तौतु) सम्यक्तया प्रस्तुत करे।
टिप्पणी
[इन्द्र= विद्युत्१; देव=अन्तरिक्ष, वायु, मेघ। विद्युत्-प्रतिवर्ष वर्षा ऋतु में देवों में विविध प्रकार से बोलता हुआ, कड़कड़ाता हुआ आता है। ऋषभ अर्थात् श्रेष्ठ परमेश्वर, गौओं [वेदवाणियों]२ में भिन्न-भिन्न विषयों का कथन करता हुआ प्रतिसृष्टिकाल में आता है। ऋषभ अर्थात् बलीवर्द गौओं में विविध-गर्जना करता हुआ आता है। अधोलिखित मन्त्रों में ऋषभ परमेश्वर के सृष्टि सम्बन्धी "देवों और ऋषभ अर्थात् बलीवर्द के शरीरावयवों में" परस्पर सम्बन्ध वस्तुतः सत्य है,—यह दर्शाने के लिये संस्तोता को ब्रह्मा अर्थात् चारों वेदों का ज्ञाता कहा है।] [१. "वायुर्वेन्द्रो वान्तरिक्षस्थानः" (निरु० ७।२।५) में इन्द्र को अन्तरिक्षस्य कहा है। (२) गौः वाङ्नाम (निघं० १।११)।]
विषय
ऋषभ के दृष्टान्त से परमात्मा का वर्णन।
भावार्थ
(यः) जो परमेश्वर (देवेषु) देव अर्थात् प्राणों में (इन्द्रः इव) आत्मा के समान (गोषु) वेदवाणियों में व्याप्त होकर (वि वावदत्) नाना प्रकार के ज्ञानोपदेश करता हुआ (एति) स्वयं विराजमान है, (तस्य) उस महान् (ऋषभस्य) श्रेष्ठ परमेश्वर के (अंगानि) अंगों का (ब्रह्मा) चतुर्वेदवक्ता पुरुष (भद्रया) कल्याणमयी वेदवाणी द्वारा (सं स्तौतु) उत्तम रीति से वर्णन करे।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
ब्रह्मा ऋषिः। ऋषभो देवता। १-५, ७, ९, २२ त्रिष्टुभः। ८ भुरिक। ६, १०,२४ जगत्यौ। ११-१७, १९, २०, २३ अनुष्टुभः। १२ उपरिष्टाद् बृहती। २१ आस्तारपंक्तिः। चतुर्विंशर्चं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Rshabha, the ‘Bull’
Meaning
As Rshabha that shines in suns and stars and pervades vibrant in planets proclaiming its power and personality loud and bold like Indra among the divinities, so may Brahma, scholar of the Vedas, celebrate with holy words and describe the variety of its manifestations in various parts and forms of existence. Note: From mantra 12 to 17, there is Brahma’s metaphoric description of Rshabha, the Cosmic Purusha, Vishvarupa as it is called in mantra 22. To understand this description literally as celebration of the animal ‘bull’ would do no justice to the Purusha. If ‘Rshabha’ were to mean ‘the bull’ literally, then the human prayer in Rgveda 10, 166, 1: Make me the Rshabha among equals would be meaningless. To understand this description properly, we should remember that Veda is the knowledge of nature, humanity and Divinity. The three exist together in an organismic union of relationship, nature being the Shakti of Divinity and the mother of humanity (Shvetashvatara Upanishad, 1, 7). So the Veda often describes the humanity of Divinity and the divinity of humanity. For example, in Atharva-Veda 10, 2, 31, the human body is described as ‘the invincible city of gods’, and Divinity is described as ‘thousand headed and thousand eyed Purusha’ (Rgveda 10,90,1) ‘thousand handed’ (Atharva Veda 19, 6,1), and even as ‘thousand-homed Vrshabha’ in Atharva-veda (4, 5, 1) and Rgveda (7, 55, 7). The metaphoric, therefore, should not be confused with the literal meaning. And if one insists on the anthropomorphic interpretation of Divinity, as some scholars have done, let us further remember that in the ‘literal style’ even language has been described as four horned and three-footed (Rgveda 4, 58, 3), which description makes no sense unless we interpret the metaphor.
Translation
He, who moves about roaring among the cows like the resplendent Lord among the bounties of Nature - the various limbs of that bull,- ‘let the learnd priest (brahmi) praise eloquently.
Translation
Let the master of the four Vedas describe through the Vedic speech the nature and properties of all the parts of the world of that almighty God who, like an ascetic preaching, comes to learned men and the priests of the yajnas.
Translation
Just as the soul moves in vital breaths, so does God, preaching moral laws to humanity, manifest Himself in Vedic verses. A Brahma should joyfully extol the merits and virtues of that God.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
११−(यः) ऋषभः। परमेश्वरः (इन्द्रः) प्रतापी मनुष्यः (देवेषु) विद्वत्सु (गोषु) गौः पृथिवी-निघ० १।१। पृथिव्यादिलोकेषु (एति) गच्छति। व्याप्नोति (विवावदत्) वि+वद व्यक्तायां वाचि यङ्लुकि-शतृ। अनेकप्रकारेण प्रवदन् सन् (तस्य) (ऋषभस्य) म० १। सर्वव्यापकस्य (अङ्गानि) गुणावयवान् (ब्रह्मा) चतुर्वेदज्ञो विद्वान् (सम्) सम्यक् (स्तौतु) अर्चतु-निघ० ३।१४। (भद्रया) कल्याण्या रीत्या ॥
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