अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 7/ मन्त्र 11
चेतो॒ हृद॑यं॒ यकृ॑न्मे॒धा व्र॒तं पु॑री॒तत् ॥
स्वर सहित पद पाठचेत॑: । हृद॑यम् । यकृ॑त् । मे॒धा । व्र॒तम् । पु॒रि॒ऽतत् ॥१२.११॥
स्वर रहित मन्त्र
चेतो हृदयं यकृन्मेधा व्रतं पुरीतत् ॥
स्वर रहित पद पाठचेत: । हृदयम् । यकृत् । मेधा । व्रतम् । पुरिऽतत् ॥१२.११॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
सृष्टि की धारणविद्या का उपदेश।
पदार्थ
[सृष्टि में] (चेतः) विचार (हृदयम्) हृदय (मेधा) बुद्धि (यकृत्) [सङ्गति करनेवाला] कलेजा (व्रतम्) व्रत [नियम] (पुरीतत्) पुरीतत् [शरीर को फैलानेवाली सूक्ष्म आँत के समान हैं] ॥११॥
भावार्थ
मन्त्र ७ के समान है ॥११॥
टिप्पणी
११−(चेतः) ज्ञानम् (हृदयम्) हृदयं चेतनास्थानमोजसश्चाश्रयम्। शार्ङ्गधरः, अ० ५।४२। (यकृत्) शकेर्ऋतिन्। उ० ४।५८। यज सङ्गतिकरणे−ऋतिन्, जस्य कः। संगच्छमानम्। कालखण्डम्। यकृद्रञ्जकपित्तस्य स्थानं रक्तस्य संश्रयम्। शार्ङ्गधरः, अ० ५।३९। (मेधा) बुद्धिः (व्रतम्) वरणीयो व्यवहारः। नियमः (पुरीतत्) कॄगॄशॄपॄकुटि०। उ० ४।१४३। पॄ पालनपूरणयोः−इ+तनु विस्तारे−क्विप्। पुरीं शरीरं तनोतीति। सूक्ष्मान्त्रम् ॥
विषय
मित्र से प्रजा तक
पदार्थ
१.(मित्र: च वरुणः च) = मित्र और वरुण (अंसौ) = कन्धे हैं, (त्वष्टा च अर्यमा च) = त्वष्टा और अर्यमा (दोषणी) = भुजाओं के ऊपर के भाग हैं, (महादेवः बाहः) = महादेव बाहु हैं [अगली टाँगों का पिछला भाग], (इन्द्राणी) = विद्युत्-शक्ति (भसत्) = गुह्यभाग है, (वायुः पुच्छम्) = वायु पूंछ है, (पवमानः बाला:) = बहता हुआ वायु उसके बाल हैं। २. (ब्रह्म च क्षत्रं च) = ब्रह्म और क्षत्र [ब्राह्मण और क्षत्रिय] (श्रोणी) = उसके श्रोणीप्रदेश [कुल्हे] हैं, (बलम्) = बल [सेना] (ऊरू) = जाँचे हैं। (धाता च सविता च) = धाता और सविता उसके (अष्ठीवन्तौ) = टखने हैं, (गन्धर्वाः जंघा:) = गन्धर्व जंघाएँ हैं (अप्सरस:) = रूपवती स्त्रियाँ [अप्सराएँ] (कुष्ठिका:) = खुरों के ऊपर-पीछे की ओर लगी अंगुलियाँ हैं, (अदितिः) = पृथिवी (शफा:) = खुर हैं। ३. (चेत:) = चेतना (हृदयम्) = हृदय है, (मेधा) = बुद्धि (यकृत्) = जिगर है, (व्रत पुरीतत्) = व्रत उसकी अति है, (क्षुत् कुक्षि:) = भूख कोख है, (इरा) = अन्न व जल (वनिष्टुः) = गुदा व बड़ी आँतें हैं, (पर्वता:) = पर्वत व मेघ (प्लाशय:) = छोटी आंत हैं, (क्रोध:) = क्रोध वृक्को -गुर्दे हैं, (मन्यु:) = शोक व दीप्ति (आण्डौ) = अण्डकोश हैं, (प्रजा शेप:) = प्रजाएँ उसका लिंगभाग हैं [वृक्की पुष्टिकरी प्रोक्तौ जठरस्थस्य मेदसः । वीर्यवाहिशिराधारौ वृषणौ पौरुषावहौ। गर्भाधानकर लिङ्गमयन वीर्यमूत्रयोः-शार्ङ्गधर]।
भावार्थ
वेद में मित्र, वरुण से लेकर क्रोध, मन्यु, प्रजा आदि का सुचारुरूपेण प्रतिपादन है।
भाषार्थ
(चेतः) चित्त है (हृदयम्) गौ का हृदय, (मेधा)१ आशु ग्रहणशक्ति है (यकृत्) जिगर [liver], (व्रतम्) व्रत है (पुरीतत्) शरीर में विस्तृत आन्तें।
टिप्पणी
[चेतः, हृदयम्, —चित्त है विश्वाङ्ग, और हृदय है गौ का अङ्ग। इन दोनों में तादात्म्य है। योगदर्शन में भी चित्त और हृदय का परस्पर सम्बन्ध दर्शाया है "हृदये चित्तसंवित्" (३।३४), अर्थात् हृदय में चित्त के स्वरूप का ज्ञान होता है। मेधा और यकृत् का पारस्परिक सम्बन्ध अनुसन्धेय है। व्रत का अभिप्राय है व्रत में "खाद्य-अन्न"। इस प्रकार व्रत और पुरीतत् का परस्पर सम्बन्ध द्योतित हो जाता है] [(१) मेधा आशुग्रहणे कण्डवादिः।]
विषय
विश्वका गोरूप से वर्णन॥
भावार्थ
(चेतः हृदयम्) समस्त चेतना उसका हृदय है, (मेधा यकृत्) मेधा बुद्धि उसका यकृत् कलेजा भाग हैं, (व्रतम्) व्रत उस के (पुरीतत्) आतें हैं।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
ब्रह्मा ऋषिः। गोदेवता। १ आर्ची उष्णिक्, ३, ५, अनुष्टुभौ, ४, १४, १५, १६ साम्न्यौ बृहत्या, ६,८ आसुयौं गायत्र्यौ। ७ त्रिपदा पिपीलिकमध्या निचृदगायत्री। ९, १३ साम्न्यौ गायत्रौ। १० पुर उष्णिक्। ११, १२,१७,२५, साम्नयुष्णिहः। १८, २२, एकपदे आसुरीजगत्यौ। १९ आसुरी पंक्तिः। २० याजुषी जगती। २१ आसुरी अनुष्टुप्। २३ आसुरी बृहती, २४ भुरिग् बृहती। २६ साम्नी त्रिष्टुप्। इह अनुक्तपादा द्विपदा। षड्विंशर्चं एक पर्यायसूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Cow: the Cosmic Metaphor
Meaning
Memory and mind is the heartcore, assimilative power is the liver, rule and fast is the intestines.
Translation
Thoughtfulness (cetah) is his heart (hrdaya); intelligence (medha) is his liyer (yakrt); and the vow (vrata) is his intestines (puritat).
Translation
Thought is its heart, the intelligence its liver and the law its pericardium.
Translation
Thought is the heart, intelligence is the liver, law the pericardium.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
११−(चेतः) ज्ञानम् (हृदयम्) हृदयं चेतनास्थानमोजसश्चाश्रयम्। शार्ङ्गधरः, अ० ५।४२। (यकृत्) शकेर्ऋतिन्। उ० ४।५८। यज सङ्गतिकरणे−ऋतिन्, जस्य कः। संगच्छमानम्। कालखण्डम्। यकृद्रञ्जकपित्तस्य स्थानं रक्तस्य संश्रयम्। शार्ङ्गधरः, अ० ५।३९। (मेधा) बुद्धिः (व्रतम्) वरणीयो व्यवहारः। नियमः (पुरीतत्) कॄगॄशॄपॄकुटि०। उ० ४।१४३। पॄ पालनपूरणयोः−इ+तनु विस्तारे−क्विप्। पुरीं शरीरं तनोतीति। सूक्ष्मान्त्रम् ॥
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