अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 7/ मन्त्र 23
मि॒त्र ईक्ष॑माण॒ आवृ॑त्त आन॒न्दः ॥
स्वर सहित पद पाठमि॒त्र: । ईक्ष॑माण: । आऽवृ॑त्त: । आ॒ऽन॒न्द: ॥१२.२३॥
स्वर रहित मन्त्र
मित्र ईक्षमाण आवृत्त आनन्दः ॥
स्वर रहित पद पाठमित्र: । ईक्षमाण: । आऽवृत्त: । आऽनन्द: ॥१२.२३॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
सृष्टि की धारणविद्या का उपदेश।
पदार्थ
[वह] (ईक्षमाणः) देखता हुआ (मित्रः) मित्र [हितकारी], (आवृत्तः) सन्मुख वर्तमान (आनन्दः) आनन्द [स्वरूप है] ॥२३॥
भावार्थ
सर्वदर्शी सर्वव्यापक परमेश्वर सब का हितकारी है ॥२३॥
टिप्पणी
२३−(मित्रः) हितः (ईक्षमाणः) पश्यन् सन् (आवृत्तः) समन्ताद् वर्तमानः (आनन्दः) सुखस्वरूपः ॥
विषय
वेद का मुख्य प्रतिपाद्य विषय 'प्रभु'
पदार्थ
१. वेदवाणी में सभी पदार्थों, जीव के कर्तव्यों व आत्मस्वरूप का वर्णन है। इनका मुख्य प्रतिपाद्य विषय प्रभु हैं। यह प्रभु हमारे हृदय में (आसीन:) = आसीन हुए-हुए (अग्नि:) = अग्नि हैं हमें निरन्तर आगे ले-चलनेवाले हैं [भ्रामयन् सर्वभूतानि यन्त्राद्धानि मायया], (उत्थितः) = हमारे हृदय में उठे हुए ये प्रभु (अश्विना) = प्राणापान हैं, जब प्रभु की भावना हमारे हृदयों में सर्वोपरि होती है तब हमारी प्राणापान की शक्ति का वर्धन होता है। (प्राङ् तिष्ठन्) = पूर्व में [सामने] ठहरे हुए वे प्रभु (इन्द्र:) = हमारे लिए परमैश्वर्यशाली व शत्रुओं का विद्रावण करनेवाले हैं। (दक्षिणा तिष्ठन) = दक्षिण में स्थित हुए-हुए वे (यमः) = यम हैं, हमारे नियन्ता हैं, (प्रत्यङ् तिष्ठन) = पश्चिम में ठहरे हुए वे प्रभु (धाता) = हमारा धारण करनेवाले हैं। (उदङ् तिष्ठन्) = उत्तर में ठहरे हुए (सविता) = हमें प्रेरणा देनेवाले हैं। २. ये ही प्रभु (तृणानि प्राप्त:) = तृणों को प्राप्त हुए-हुए (सोमः राजा) = देदीप्यमान [राज् दीसौ] सोम होते हैं। ये तृण भोजन के रूप में उदर में प्राप्त होकर 'सोम' के जनक होते हैं। (ईक्षमाण:) = हमें देखते हुए, ये प्रभु (मित्र:) = हमें प्रमीति [मृत्यु] से बचानेवाले हैं [प्रमीते: त्रायते मित्रः], (आवृत्त:) = हममें व्याप्त हुए-हुए वे प्रभु (आनन्द:) = हमारे लिए आनन्दरूप हो जाते हैं।
भावार्थ
प्रभु हमारे लिए 'अग्नि, अश्विना, इन्द्र, यम, धाता, सविता, सोम' मित्र व आनन्दरूप है।
भाषार्थ
(ईक्षमाणः) तृप्त हो कर जब बैल देख रहा होता है तब वह (मित्रः) मित्र के सदृश स्नेहभरी दृष्टि से मानो देखता है। (आवृत्तः) जब वापिस लौटता है तब वह (आनन्दः) आनन्दस्वरूप होता है। आनन्दमयी अवस्था में होता है। मित्रः = त्रिमिदा स्नेहने (भ्वादिः)। अथवा (मित्रः) वर्षा द्वारा स्निग्ध करने वाला सूर्य, जोकि पृथिवी का (ईक्षमाणः), निरीक्षण करता है। (ईक्षमाणः) ईक्षण करता हुआ बैलरूप है। (आवृत्तः) प्रातःकाल पुनः लौट कर आया सूर्य - (आनन्दः) जोकि आनन्द प्रद होता है, आवृत्त हुए आनन्दस्वरूप बैल सदृश है।
विषय
विश्वका गोरूप से वर्णन॥
भावार्थ
(ईक्षमाणः मित्रः) जब वह समस्त प्राणियों पर कृपा दृष्टि से देखता है तब वह सब का ‘मित्र’ है। (आवृत्तः आनन्दः) जब उनको व्याप लेता है तो वही आनन्द रूप हो जाता है।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
ब्रह्मा ऋषिः। गोदेवता। १ आर्ची उष्णिक्, ३, ५, अनुष्टुभौ, ४, १४, १५, १६ साम्न्यौ बृहत्या, ६,८ आसुयौं गायत्र्यौ। ७ त्रिपदा पिपीलिकमध्या निचृदगायत्री। ९, १३ साम्न्यौ गायत्रौ। १० पुर उष्णिक्। ११, १२,१७,२५, साम्नयुष्णिहः। १८, २२, एकपदे आसुरीजगत्यौ। १९ आसुरी पंक्तिः। २० याजुषी जगती। २१ आसुरी अनुष्टुप्। २३ आसुरी बृहती, २४ भुरिग् बृहती। २६ साम्नी त्रिष्टुप्। इह अनुक्तपादा द्विपदा। षड्विंशर्चं एक पर्यायसूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Cow: the Cosmic Metaphor
Meaning
In will and desire, it is Mitra, vibrant and ecstatic, it is Ananda.
Translation
Looking about his (iksamanah), he is the friendly Lord (Mitrah) (mitra); when turned about (Avrttah), he is delight.
Translation
When it iooks itself it 1s Mitra when it has turned round it is Anand, the joy.
Translation
God is Friend when He looks upon mankind with an eye of mercy. He is full of joy when He pervades all objects.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
२३−(मित्रः) हितः (ईक्षमाणः) पश्यन् सन् (आवृत्तः) समन्ताद् वर्तमानः (आनन्दः) सुखस्वरूपः ॥
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