अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 7/ मन्त्र 5
श्ये॒नः क्रो॒डो॒न्तरि॑क्षं पाज॒स्यं बृह॒स्पतिः॑ क॒कुद्बृ॑ह॒तीः कीक॑साः ॥
स्वर सहित पद पाठश्ये॒न: । क्रो॒ड: । अ॒न्तरि॑क्षम् । पा॒ज॒स्य᳡म् । बृह॒स्पति॑: । क॒कुत् । बृ॒ह॒ती: । कीक॑सा: ॥१२.५॥
स्वर रहित मन्त्र
श्येनः क्रोडोन्तरिक्षं पाजस्यं बृहस्पतिः ककुद्बृहतीः कीकसाः ॥
स्वर रहित पद पाठश्येन: । क्रोड: । अन्तरिक्षम् । पाजस्यम् । बृहस्पति: । ककुत् । बृहती: । कीकसा: ॥१२.५॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
सृष्टि की धारणविद्या का उपदेश।
पदार्थ
[सृष्टि में] (श्येनः) [चलनेवाला] सूर्य (क्रोडः) गोद (अन्तरिक्षम्) मध्य अवकाश (पाजस्यम्) [बल के लिये हितकारी] पेट (बृहस्पतिः) बृहस्पति [लोकविशेष] (ककुत्) शिखा, (बृहतीः) बड़ी दिशाएँ (कीकसाः) हँसली [गले] की हड्डियों [के समान है] ॥५॥
भावार्थ
मन्त्र ३ के समान है ॥५॥
टिप्पणी
५−(श्येनः) अ० ३।३।३। श्येन आदित्यो भवति श्यायतेर्गतिकर्मणः-निरु० १४।१३। सूर्यः (क्रोडः) अ० ९।४।१५। अङ्कः (अन्तरिक्षम्) मध्यलोकः (पाजस्यम्) अ० ४।१४।८। पाजसे बलाय हितम्। जठरम् (बृहस्पतिः) लोकविशेषः (ककुत्) अ० ६।८६।३। शिखा (बृहतीः) महत्यो दिशः (कीकसाः) अ० २।३३।२। जत्रुवक्षोगतास्थीनि ॥
विषय
वायु से उपसद तक
पदार्थ
१. (वायुः विश्वम्) = वायु उसके सब अवयव हैं। (स्वर्ग: लोक:) = स्वर्गलोक (कृष्णद्रम्) = आकर्षक गति है [कृष्ण हु], विधरणी लोकों को पृथक्-पृथक् स्थापित करनेवाली शक्ति (निवेष्यः) = उसका बैठने का कूल्हा है। २. (श्येन:) = श्येनयाग (क्रोड:) = उसका गोद-भाग है, (अन्तरिक्षम्) = अन्तरिक्ष (पाजस्यम्) = पेट है, (ब्रहस्पतिः ककुद्) = बृहस्पति उसका ककुद है। (बृहती:) = ये विशाल दिशाएँ (कीकसा:) = उसके गले के मोहरे हैं। ३. (देवानां पत्नी:) = 'सूर्या, इन्द्राणी, वरुणानी, अग्नाणी' आदि देवपलियाँ (पृष्टयः) = पृष्ठ के मोहरे, (उपसदः) = उपसद इष्टियाँ (पर्शवः) = उसकी पसलियाँ हैं।
भावार्थ
वेदवाणी में प्रभु के बनाये हुए वायु आदि पदार्थों के ज्ञान के साथ कर्तव्यभूत उपसद आदि इष्टियों का भी प्रतिपादन किया गया है।
भाषार्थ
(श्येनः) श्येन है (क्रोडः) गौ की छाती; (अन्तरिक्षम्) अन्तरिक्ष है (पाजस्यम्) उदर, पेट; (बृहस्पतिः) बृहस्पति है (ककुद्) ककुद्; (बृहतीः) बृहती हैं (कीकसाः) रीढ़ की अस्थियां।
टिप्पणी
["श्येन" है अन्तरिक्षस्थ विद्युत् (निरुक्त ११।१।१)। यह गतिशील है "श्यायति गच्छतीति श्येनः" (उणा २।४७)। श्येन पक्षी भी होता है जोकि अन्तरिक्ष में गति करता है, उड़ता है। विद्युत् भी अन्तरिक्षस्थ मेघ में गति करती है, लहर के रूप में मानो उड़ती है। इसे क्रोड़ कहा है, अर्थात् गौ की छाती। छाती में दो अङ्ग होते हैं – (१) फेफड़े, जिन में श्वास-प्रश्वास रूपी वायु रहती है, (२) हृदय, जिस में कि रक्तरूप आपः रहते हैं। आप के कारण हृदय को सिन्धु कहा है (अथर्व० १०।२।११)। अन्तरिक्षस्थ श्येन अर्थात् विद्युत् का साधर्म्य भी दो तत्त्वों के साथ है, (१) अन्तरिक्षस्थ वायु के साथ, तथा (२) मेघस्थ आपः के साथ। इस साधर्म्य के कारण श्येन को क्रोड़ अर्थात् गौ की छाती कहा है। "पाजस्यम्" है उदर अर्थात् पेट। “पाजः बलम्" (निघं० २।९), तथा पाजः अन्नम्" (निघं० २।७)। पाजः अस्यते प्रक्षिप्यतेऽस्मिन्निति पाजस्यम्, उदरम्। अन्न को मुख में चबा कर अधःस्थ उदर में फैंक दिया जाता है। अन्तरिक्ष है "पाजस्य", अर्थात् गौ का उदर। यथा “अन्तरिक्षमुतोदरम्' (अथर्व० १०।७।३२)। उदर स्वयं एक थैले जैसा है, अन्तरिक्ष सदृश है, जिस में कि आमाशय, पक्वाशय आदि अङ्ग रखे हुए हैं। उदरम्= उ + दरम् (दॄ विदारणे), विदीर्ण हुआ-हुआ अङ्ग। "बृहस्पतिः" एक ग्रह है सौरमण्डल में। यह ग्रह बड़ा है "बृहतः पतिः" (निरुक्त १०।१।११)। बड़े होने के कारण इसे बृहस्पति कहा है। कुकद् भी गौ की पीठ से ऊपर उठा रहता है, सींगों को छोड़ कर गौ के सब अङ्गों से ऊचां है। इस लिये बृहस्पति को गौ का कुकद् कहा है। "बृहतीः" यह वैदिक छन्द है। यह अन्य छन्दों का उपलक्षक भी हैं। छन्दोमय वेद, ज्ञान का स्रोत है। ज्ञानमय होने के कारण इसे वेद कहते हैं (विद् ज्ञाने)। 'कोकसाः' है पृष्ठवंश की अस्थियां, जिन के छिद्रों में से सुषुम्णा नाड़ी फैली हुई है। सुषुम्णा नाड़ीज्ञान-साधिका है। इस हेतु "बृहतीः” को कीकसाः कहा है, अर्थात् गौ के कीकस।]
विषय
विश्वका गोरूप से वर्णन॥
भावार्थ
(श्येनः कोडः) श्येनयाग उसका क्रोड़ भाग है, (अन्तरिक्षम् पाजस्यम्) अन्तरिक्ष उसका पाजस्य अर्थात् पेट है, (बृहस्पतिः ककुत्) बृहस्पति उसका ककुद् या कोहान भाग है, (बृहतीः कीकसाः) बड़ी दिशाएं उसके गले के मोहरे हैं।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
ब्रह्मा ऋषिः। गोदेवता। १ आर्ची उष्णिक्, ३, ५, अनुष्टुभौ, ४, १४, १५, १६ साम्न्यौ बृहत्या, ६,८ आसुयौं गायत्र्यौ। ७ त्रिपदा पिपीलिकमध्या निचृदगायत्री। ९, १३ साम्न्यौ गायत्रौ। १० पुर उष्णिक्। ११, १२,१७,२५, साम्नयुष्णिहः। १८, २२, एकपदे आसुरीजगत्यौ। १९ आसुरी पंक्तिः। २० याजुषी जगती। २१ आसुरी अनुष्टुप्। २३ आसुरी बृहती, २४ भुरिग् बृहती। २६ साम्नी त्रिष्टुप्। इह अनुक्तपादा द्विपदा। षड्विंशर्चं एक पर्यायसूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Cow: the Cosmic Metaphor
Meaning
Cosmic dynamics is the bosom, firmament is the belly, Brhaspati is the hump, expansiveness is the vertebrae of the spine.
Translation
The syena (hawk) is his breast; the midspace is his belly; the Lord supreme is his hump (kakuda); the brhati verses are his breast-bones (kikasah).
Translation
The shenayaga is the breast of this Cow, the firmament or air like belly, Brihaspati is like its hump and the Brihati metres are like its breast bone and cartilages of the ribs.
Translation
The revolving Sun is the breast. Atmosphere is the belly. Jupiter is the hump. Vast quarters are the breast-bone and cartilages of the ribs
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
५−(श्येनः) अ० ३।३।३। श्येन आदित्यो भवति श्यायतेर्गतिकर्मणः-निरु० १४।१३। सूर्यः (क्रोडः) अ० ९।४।१५। अङ्कः (अन्तरिक्षम्) मध्यलोकः (पाजस्यम्) अ० ४।१४।८। पाजसे बलाय हितम्। जठरम् (बृहस्पतिः) लोकविशेषः (ककुत्) अ० ६।८६।३। शिखा (बृहतीः) महत्यो दिशः (कीकसाः) अ० २।३३।२। जत्रुवक्षोगतास्थीनि ॥
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