अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 7/ मन्त्र 16
दे॑वज॒ना गुदा॑ मनु॒ष्या आ॒न्त्राण्य॒त्रा उ॒दर॑म् ॥
स्वर सहित पद पाठदे॒व॒ऽज॒ना: । गुदा॑: । म॒नु॒ष्या᳡: । आ॒न्त्राणि॑ । अ॒त्रा: । उ॒दर॑म् ॥१२.१६॥
स्वर रहित मन्त्र
देवजना गुदा मनुष्या आन्त्राण्यत्रा उदरम् ॥
स्वर रहित पद पाठदेवऽजना: । गुदा: । मनुष्या: । आन्त्राणि । अत्रा: । उदरम् ॥१२.१६॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
सृष्टि की धारणविद्या का उपदेश।
पदार्थ
[सृष्टि में] (देवजनाः) उन्मत्त लोग (गुदाः) गुदा [मलत्याग नाड़ियाँ], (मनुष्याः) मननशील मनुष्य (आन्त्राणि) आँतें, (अत्राः) [अतनशील] विज्ञानी पुरुष (उदरम्) पेट [के समान हैं] ॥१६॥
भावार्थ
मन्त्र १४ के समान है ॥१६॥
टिप्पणी
१६−(देवजनाः) दिवु मदे-अच्। उन्मत्तजनाः (गुदाः) अ० २।३३।४। मलत्यागनाड्यः (मनुष्याः) अ० ३।४।६। मननशीलाः (आन्त्राणि) अ० २।३३।४। उदरनाडीविशेषाः (अत्राः) अमिचिमिशसिभ्यः क्त्रः। उ० ४।१६४। अत सातत्यगमने−क्त्र, तलोपः। अतनशीलाः। अतिथयः। विज्ञानिनः (उदरम्) अ० २।३३।४। जठरम् ॥
विषय
नदी से निधन तक
पदार्थ
१. (नदी सूत्री) = नदी इस वेदधेनु की सूत्री [जन्म देनेवाली नाड़ी], (वर्षस्य पतय:) = वृष्टि के पालक मेघ (स्तना:) = स्तन हैं, (स्तनयित्नुः ऊधः) = गर्जनशील मेघ ऊधस् [औड़ी] है। (विश्वव्यचा:) = सर्वव्यापक आकाश (चर्म) = चमड़ा है, (ओषधयः लोमानि) = ओषधियाँ लोम हैं, (नक्षत्राणि रूपम्) = नक्षत्र उसके रूप, अर्थात् देह पर चितकबरे चिह्न हैं। २. (देवजना:) = देवजन [ज्ञानी लोग] (गुदा:) = गुदा हैं, (मनुष्याः आन्द्राणि) = मननशील मनुष्य उसकी आते हैं, (अत्ताः उदरम्) = अन्य खाने-पीनेवाले प्राणी उसके उदर हैं, (रक्षांसि लोहितम्) = राक्षस लोग रुधिर हैं, (इतरजना: ऊबध्यम्) = इतर जन अनपचे अन्न के समान हैं, (अभ्रम्) = मेघ (पीव:) = मेदस् [चर्बी] हैं, (निधनम्) = निधन (मज्जा) = मज्जा है [निधन-यज्ञ का अन्तिम प्रसाद]।
भावार्थ
वह वेदवाणी 'नदियों व निधन' सबका प्रतिपादन कर रही है।
भाषार्थ
(देवजनाः) उन्मत्त जन हैं (गुदाः) गौ की गुदा के अवयव, (मनुष्याः) मनुष्य हैं (आन्त्राणि) गौ का पक्वाशय, (अत्राः) अन्य अदनकर्ता प्राणी हैं (उदरम्) गौ का पेट।
टिप्पणी
[देव पद "दिव्" धातु का रूप है। दिव् का अर्थ "मद" भी होता है (दिवादिः)। अतः देवजनाः= उन्मत्त जन। ये गौ के गुदा के समान हैं। मनुष्याः= मननशील जन। यथा "मनुष्याः = मत्त्वा कर्माणि सीव्यन्ति" (निरुक्त ३।२।७)। मननपूर्वक कर्मपट बुनने या सीनेवाले व्यक्ति अपने काम में परिपक्व प्रज्ञा वाले होते हैं, अतः इन्हें आन्त्राणि कहा है, आन्तों में परिपक्व अन्न होता है। मनुष्याः= मनु (मत्त्वा) + स्याः (सीव्यन्ति) देवजनों तथा मनुष्यों से अतिरिक्त प्राणी केवल भोजनपरायण होते हैं, "अत्राः" होते हैं [अद् + राः], अतः इन्हें उदर कहा है।]
विषय
विश्वका गोरूप से वर्णन॥
भावार्थ
(देव-जनाः) देव जन (गुदाः) गुदा हैं, (मनुष्याः आन्त्राणि) सामान्य मनुष्य उसकी आंतें हैं, (अत्रा उदरम्) अन्य भोजन करने वाले प्राणिगण उसके उदर भाग हैं।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
ब्रह्मा ऋषिः। गोदेवता। १ आर्ची उष्णिक्, ३, ५, अनुष्टुभौ, ४, १४, १५, १६ साम्न्यौ बृहत्या, ६,८ आसुयौं गायत्र्यौ। ७ त्रिपदा पिपीलिकमध्या निचृदगायत्री। ९, १३ साम्न्यौ गायत्रौ। १० पुर उष्णिक्। ११, १२,१७,२५, साम्नयुष्णिहः। १८, २२, एकपदे आसुरीजगत्यौ। १९ आसुरी पंक्तिः। २० याजुषी जगती। २१ आसुरी अनुष्टुप्। २३ आसुरी बृहती, २४ भुरिग् बृहती। २६ साम्नी त्रिष्टुप्। इह अनुक्तपादा द्विपदा। षड्विंशर्चं एक पर्यायसूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Cow: the Cosmic Metaphor
Meaning
Serpents and demons are rectal muscles, humans are intestines, eaters are the stomach.
Translation
Godly people (devajanah) are his large intestine (guda), men his entrails (antrani) and the devourers his abdomen (udara).
Translation
Devajanas stand as it’s entrails, the men its intestines and other eating creatures are like the stomach.
Translation
Godly persons are her entrails, ordinary men are her bowels, and learned guests her abdomen
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
१६−(देवजनाः) दिवु मदे-अच्। उन्मत्तजनाः (गुदाः) अ० २।३३।४। मलत्यागनाड्यः (मनुष्याः) अ० ३।४।६। मननशीलाः (आन्त्राणि) अ० २।३३।४। उदरनाडीविशेषाः (अत्राः) अमिचिमिशसिभ्यः क्त्रः। उ० ४।१६४। अत सातत्यगमने−क्त्र, तलोपः। अतनशीलाः। अतिथयः। विज्ञानिनः (उदरम्) अ० २।३३।४। जठरम् ॥
Acknowledgment
Book Scanning By:
Sri Durga Prasad Agarwal
Typing By:
Misc Websites, Smt. Premlata Agarwal & Sri Ashish Joshi
Conversion to Unicode/OCR By:
Dr. Naresh Kumar Dhiman (Chair Professor, MDS University, Ajmer)
Donation for Typing/OCR By:
Sri Amit Upadhyay
First Proofing By:
Acharya Chandra Dutta Sharma
Second Proofing By:
Pending
Third Proofing By:
Pending
Donation for Proofing By:
Sri Dharampal Arya
Databasing By:
Sri Jitendra Bansal
Websiting By:
Sri Raj Kumar Arya
Donation For Websiting By:
N/A
Co-ordination By:
Sri Virendra Agarwal