अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 7/ मन्त्र 15
वि॒श्वव्य॑चा॒श्चर्मौष॑धयो॒ लोमा॑नि॒ नक्ष॑त्राणि रू॒पम् ॥
स्वर सहित पद पाठवि॒श्वऽव्य॑चा: । चर्म॑ । ओष॑धय: । लोमा॑नि । नक्ष॑त्राणि । रू॒पम् ॥१२.१५॥
स्वर रहित मन्त्र
विश्वव्यचाश्चर्मौषधयो लोमानि नक्षत्राणि रूपम् ॥
स्वर रहित पद पाठविश्वऽव्यचा: । चर्म । ओषधय: । लोमानि । नक्षत्राणि । रूपम् ॥१२.१५॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
सृष्टि की धारणविद्या का उपदेश।
पदार्थ
[सृष्टि में] (विश्वव्यचाः) सर्वव्याप्ति (चर्म) चर्म, (ओषधयः) ओषधें [अन्न आदि] (लोमानि) रोम, (नक्षत्राणि) नक्षत्र (रूपम्) रूप [के समान हैं] ॥१५॥
भावार्थ
मन्त्र १४ के समान है ॥१५॥
टिप्पणी
१५−(विश्वव्यचाः) व्यच छले सम्बन्धे च-असुन् सर्वव्याप्तिः (चर्म) त्वचा (ओषधयः) अन्नादिपदार्थाः (लोमानि) रोमाणि (नक्षत्राणि) अ० ३।७।७। तारागणाः (रूपम्) सौन्दर्यम् ॥
विषय
नदी से निधन तक
पदार्थ
१. (नदी सूत्री) = नदी इस वेदधेनु की सूत्री [जन्म देनेवाली नाड़ी], (वर्षस्य पतय:) = वृष्टि के पालक मेघ (स्तना:) = स्तन हैं, (स्तनयित्नुः ऊधः) = गर्जनशील मेघ ऊधस् [औड़ी] है। (विश्वव्यचा:) = सर्वव्यापक आकाश (चर्म) = चमड़ा है, (ओषधयः लोमानि) = ओषधियाँ लोम हैं, (नक्षत्राणि रूपम्) = नक्षत्र उसके रूप, अर्थात् देह पर चितकबरे चिह्न हैं। २. (देवजना:) = देवजन [ज्ञानी लोग] (गुदा:) = गुदा हैं, (मनुष्याः आन्द्राणि) = मननशील मनुष्य उसकी आते हैं, (अत्ताः उदरम्) = अन्य खाने-पीनेवाले प्राणी उसके उदर हैं, (रक्षांसि लोहितम्) = राक्षस लोग रुधिर हैं, (इतरजना: ऊबध्यम्) = इतर जन अनपचे अन्न के समान हैं, (अभ्रम्) = मेघ (पीव:) = मेदस् [चर्बी] हैं, (निधनम्) = निधन (मज्जा) = मज्जा है [निधन-यज्ञ का अन्तिम प्रसाद]।
भावार्थ
वह वेदवाणी 'नदियों व निधन' सबका प्रतिपादन कर रही है।
भाषार्थ
(विश्वव्यचाः) अन्तरिक्ष में विस्तृत वायु, या विश्व में विस्तृत सौररश्मियां या, अन्तरिक्ष है (चर्म) गौ की चमड़ी, (ओषधयः लोमानि) ओषधियां हैं गौ के लोम, (नक्षत्राणि) नक्षत्र हैं (रूपम्) गौ के अङ्गों के [चमकते] रूप।
टिप्पणी
[व्यचः = विस्तार। यथा “अन्तरा द्यां च पृथिवीं च यद् व्यचः" (अथर्व० ९।३।१५)। व्यचः = वि + अञ्चु, अचु, अचि गतौ (भ्वादिः)।]
विषय
विश्वका गोरूप से वर्णन॥
भावार्थ
(विश्वव्यचाः) सर्वव्यापक आकाश उसका (चर्म) चमड़ा है, (ओषधयः लोमानि) ओषधियां उसके लोम हैं, (नक्षत्राणि रूपम्) नक्षत्र उसके रूप अर्थात् उसके देह पर चितकबरे चिह्न हैं।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
ब्रह्मा ऋषिः। गोदेवता। १ आर्ची उष्णिक्, ३, ५, अनुष्टुभौ, ४, १४, १५, १६ साम्न्यौ बृहत्या, ६,८ आसुयौं गायत्र्यौ। ७ त्रिपदा पिपीलिकमध्या निचृदगायत्री। ९, १३ साम्न्यौ गायत्रौ। १० पुर उष्णिक्। ११, १२,१७,२५, साम्नयुष्णिहः। १८, २२, एकपदे आसुरीजगत्यौ। १९ आसुरी पंक्तिः। २० याजुषी जगती। २१ आसुरी अनुष्टुप्। २३ आसुरी बृहती, २४ भुरिग् बृहती। २६ साम्नी त्रिष्टुप्। इह अनुक्तपादा द्विपदा। षड्विंशर्चं एक पर्यायसूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Cow: the Cosmic Metaphor
Meaning
World covering space is the skin, herbs and trees are hair, clusters of stars are the form.
Translation
All encompassing space is his skin, plants his small hair, constellations of stars (naksatra) his form.
Translation
The all-embracing space represents its skin, the herbacious plants it’s hair and the lunar mansions its form.
Translation
The all-embracing sky is the hide, the herbs are her hair, and the stars her variegated spots on the body.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
१५−(विश्वव्यचाः) व्यच छले सम्बन्धे च-असुन् सर्वव्याप्तिः (चर्म) त्वचा (ओषधयः) अन्नादिपदार्थाः (लोमानि) रोमाणि (नक्षत्राणि) अ० ३।७।७। तारागणाः (रूपम्) सौन्दर्यम् ॥
Acknowledgment
Book Scanning By:
Sri Durga Prasad Agarwal
Typing By:
Misc Websites, Smt. Premlata Agarwal & Sri Ashish Joshi
Conversion to Unicode/OCR By:
Dr. Naresh Kumar Dhiman (Chair Professor, MDS University, Ajmer)
Donation for Typing/OCR By:
Sri Amit Upadhyay
First Proofing By:
Acharya Chandra Dutta Sharma
Second Proofing By:
Pending
Third Proofing By:
Pending
Donation for Proofing By:
Sri Dharampal Arya
Databasing By:
Sri Jitendra Bansal
Websiting By:
Sri Raj Kumar Arya
Donation For Websiting By:
N/A
Co-ordination By:
Sri Virendra Agarwal