Loading...

काण्ड के आधार पर मन्त्र चुनें

  • अथर्ववेद का मुख्य पृष्ठ
  • अथर्ववेद - काण्ड 10/ सूक्त 2/ मन्त्र 22
    सूक्त - नारायणः देवता - ब्रह्मप्रकाशनम्, पुरुषः छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - ब्रह्मप्रकाशन सूक्त

    केन॑ दे॒वाँ अनु॑ क्षियति॒ केन॒ दैव॑जनीर्विशः। केने॒दम॒न्यन्नक्ष॑त्रं॒ केन॒ सत्क्ष॒त्रमु॑च्यते ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    केन॑ । दे॒वान् । अनु॑ । क्षि॒य॒ति॒ । केन॑ । दैव॑ऽजना: । विश॑: । केन॑ । इ॒दम् । अ॒न्यत् । नक्ष॑त्रम् । केन॑ । सत् । क्ष॒त्रम् । उ॒च्य॒ते॒ ॥२.२२॥


    स्वर रहित मन्त्र

    केन देवाँ अनु क्षियति केन दैवजनीर्विशः। केनेदमन्यन्नक्षत्रं केन सत्क्षत्रमुच्यते ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    केन । देवान् । अनु । क्षियति । केन । दैवऽजना: । विश: । केन । इदम् । अन्यत् । नक्षत्रम् । केन । सत् । क्षत्रम् । उच्यते ॥२.२२॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 10; सूक्त » 2; मन्त्र » 22

    पदार्थ -
    वह [मनुष्य] (केन) किस के द्वारा (देवान्) स्तुतियोग्य गुणों, और (केन) किस के द्वारा (दैवजनीः) दैव [पूर्वजन्म के अर्जित कर्म] से उत्पन्न (विशः अनु) मनुष्यों में (क्षियति) रहता है। (केन) किस के द्वारा (इदम्) यह (सत्) सत्य (क्षत्रम्) राज्य, और (केन) किसके द्वारा (अन्यत्) दूसरा [भिन्न] (नक्षत्रम्) अराज्य (उच्यते) बताया जाता है ॥२२॥

    भावार्थ - विचारशील मनुष्य उत्तम गुणों और उत्तम लोगों से मिलने, धर्मयुक्त राज्य की विधि और अधर्मयुक्त कुराज्य के निषेध पर विचार करे। इस का उत्तर आगामी मन्त्र में है ॥२२॥

    इस भाष्य को एडिट करें
    Top