ऋग्वेद - मण्डल 1/ सूक्त 105/ मन्त्र 5
ऋषिः - आप्त्यस्त्रित आङ्गिरसः कुत्सो वा
देवता - विश्वेदेवा:
छन्दः - निचृद्बृहती
स्वरः - मध्यमः
अ॒मी ये दे॑वा॒: स्थन॑ त्रि॒ष्वा रो॑च॒ने दि॒वः। कद्व॑ ऋ॒तं कदनृ॑तं॒ क्व॑ प्र॒त्ना व॒ आहु॑तिर्वि॒त्तं मे॑ अ॒स्य रो॑दसी ॥
स्वर सहित पद पाठअ॒मी इति॑ । ये । दे॒वः॒ । स्थन॑ । त्रि॒षु । आ । रो॒च॒ने । दि॒वः । कत् । वः॒ । ऋ॒तम् । कत् । अनृ॑तम् । क्व॑ । प्र॒त्ना । वः॒ । आऽहु॑तिः । वि॒त्तम् । मे॒ । अ॒स्य । रो॒द॒सी॒ इति॑ ॥
स्वर रहित मन्त्र
अमी ये देवा: स्थन त्रिष्वा रोचने दिवः। कद्व ऋतं कदनृतं क्व प्रत्ना व आहुतिर्वित्तं मे अस्य रोदसी ॥
स्वर रहित पद पाठअमी इति। ये। देवः। स्थन। त्रिषु। आ। रोचने। दिवः। कत्। वः। ऋतम्। कत्। अनृतम्। क्व। प्रत्ना। वः। आऽहुतिः। वित्तम्। मे। अस्य। रोदसी इति ॥ १.१०५.५
ऋग्वेद - मण्डल » 1; सूक्त » 105; मन्त्र » 5
अष्टक » 1; अध्याय » 7; वर्ग » 20; मन्त्र » 5
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अष्टक » 1; अध्याय » 7; वर्ग » 20; मन्त्र » 5
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भाष्य भाग
संस्कृत (1)
विषयः
पुनरेते परस्परं कथं किं कुर्य्युरित्युपदिश्यते ।
अन्वयः
हे विद्वांसो यूयं दिवो रोचने त्रिष्वमी ये देवा आस्थन वस्तेषामृतं कदनृतं कत्। वस्तेषां प्रत्ना आहुतिश्च क्व भवतीत्येषामुत्तराणि ब्रूत। अन्यत्पूर्ववत् ॥ ५ ॥
पदार्थः
(अमी) प्रत्यक्षाऽप्रत्यक्षाः (ये) (देवाः) दिव्यगुणाः पृथिव्यादयो लोकाः (स्थन) सन्ति। अत्र तप्तनप्तनथनाश्चेति थनादेशः। (त्रिषु) नामस्थानजन्मसु (आ) समन्तात् (रोचने) प्रकाशविषये (दिवः) द्योतकस्य सूर्यमण्डलस्य (कत्) कुत्र। पृषोदरादित्वात्क्वेत्यस्य स्थाने कत्। (वः) एषां मध्ये (ऋतम्) सत्यं कारणम् (कत्) (अनृतम्) कार्यम् (क्व) (प्रत्ना) प्राचीनानि (वः) एतेषाम् (आहुतिः) होमः प्रलयः। अन्यत्पूर्ववत् ॥ ५ ॥
भावार्थः
यदा सर्वेषां लोकानामाहुतिः प्रलयो जायते तदा कार्यं कारणं जीवाश्च क्व तिष्ठन्तीति प्रश्नः। एतदुत्तरं सर्वव्यापक ईश्वर आकाशे च कारणरूपेण सर्वं जगत्सुषुप्तवज्जीवाश्च वर्त्तन्त इति। एकैकस्य सूर्यस्य प्रकाशाकर्षणविषये यावन्तो यावन्तो लोका वर्त्तन्ते तावन्तस्तावन्तः सर्व ईश्वरेण रचयित्वा धृत्वा व्यवस्थाप्यन्त इति वेद्यम् ॥ ५ ॥
हिन्दी (3)
विषय
फिर ये परस्पर कैसे क्या करें, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ।
पदार्थ
हे विद्वानो ! तुम (दिवः) प्रकाश करनेवाले सूर्य्य के (रोचने) प्रकाश में (त्रिषु) तीन अर्थात् नाम, स्थान और जन्म में (अमी) प्रकट और अप्रकट (ये) जो (देवाः) दिव्य गुणवाले पृथिवी आदि लोक (आ) अच्छी (स्थन) स्थिति करते हैं (वः) इनके बीच (ऋतम्) सत्य कारण (कत्) कहाँ और (अनृतम्) झूठे कार्यरूप (कत्) कहाँ और (वः) उनके (प्रत्ना) पुराने पदार्थ तथा उनका (आहुतिः) होम अर्थात् विनाश (क्व) कहाँ होता है, इन सब प्रश्नों के उत्तर कहो ? शेष मन्त्र का अर्थ पूर्व के तुल्य जानना चाहिये ॥ ५ ॥
भावार्थ
प्रश्न-जब सब लोकों की आहुति अर्थात् प्रलय होता है तब कार्य्यकारण और जीव कहाँ ठहरते हैं ? इसका उत्तर-सर्वव्यापी ईश्वर और आकाश में कारण रूप से सब जगत् और अच्छी गाढ़ी नींद में सोते हुए के समान जीव रहते हैं। एक-एक सूर्य्य के प्रकाश और आकर्षण के विषय में जितने-जितने लोक हैं, उतने-उतने सब ईश्वर ने बनाये धारण किये तथा इनकी व्यवस्था की है, यह जानना चाहिये ॥ ५ ॥
विषय
ऋत - अनृत - आहुति
पदार्थ
१. (दिवः आरोचने) = ज्ञान के प्रकाश में रहनेवाले (त्रिषु) = शरीर , मन व बुद्धि - तीनों में दीप्तिवाले (अमी ये) = जो ये (देवाः) = देव - शरीर में तेज से चमकते हैं , मन में निर्मलता से चमकते हैं और मस्तिष्क में ज्ञान से उज्ज्वल (स्थन) = हैं , हे देवो ! (वः) = उन आपका (ऋतम्) = खेतों में बचे रह गये अन्न - कणों के संग्रह से जीविका करने की वृत्ति (कत्) = कहाँ गई ? (अनृतम्) = कृषि के द्वारा जीवनयापन करना (कत्) = कहाँ गया ? और (वः) = तुम्हारी (प्रत्ना) = सनातन - सृष्टि के प्रारम्भ में प्रभु से उपदिष्ट (आहुतिः) = यज्ञ की वृत्ति (क्व) = कहाँ गई ?
२. जीवन अत्यन्त आनन्दमय था जबकि तुम ऋत के द्वारा जीवन बिता रहे थे । द्यूत की अपेक्षा कृषि में कष्ट व श्रम प्रतीत होता है , परन्तु कृषि में जो आनन्द व शान्ति है , वह द्यूत में कहाँ ? कृषि हमें प्रभु के समीप ले - जाती है , द्यूत हमें प्रभु से दूर ले - जाता है । यज्ञों से प्रभु का उपासन होता है । ये यज्ञ इहलोक व परलोक के कल्याण के साधन हैं । (मे) = मेरो (अस्य) = इस बात को (रोदसी) = सारा संसार (वित्तम्) = सम्यक् जान ले ।
भावार्थ
भावार्थ - ऋतवाला जीवन सुखी व शान्त होता है , अनृत - [कृषि] - प्रधान जीवन हमें प्रभु के समीप ले - जाता है । यज्ञ से लोकद्वय का कल्याण होता है ।
विषय
परम मूल और सर्वाश्रय का निरूपण ।
भावार्थ
हे ( देवाः ) दिव्य गुणों से युक्त, विद्वान् जनो ! और पृथिव्यादि लोको ! ( ये ) जो ( अमी ) ये नाना पृथिवी आदि लोक ( दिवः रोचने ) सूर्य के प्रकाश में ( त्रिषु ) तीनों कालों ! और तीनों लोकों में ( आ स्थन ) व्यापक या प्रत्यक्ष विद्यमान हैं ( वः ) तुम्हारा ( ऋतंकत् ) मूल कारण, आदि प्रवर्तक बल कहां है । ( अनृतं कत् ) उस प्रवतक बल से भिन्न 'अनृत' अर्थात् जड़, प्रकृति अब ( कत् ) कहां है । ( वः ) तुम्हारी ( प्रत्ना ) अनादि काल से चली आई ( आहुतिः ) धारण करने और बल देने या उत्पन्न करने वाली पुनः अपने में समा लेने वाली शक्ति ( कत् ) कहां है । हे ( रोदसी ) गुरु शिष्य दोनो ! ( मे अस्य वित्तं ) मुझ विद्वान् से इस तत्व का ज्ञान करो । ( २ ) ये जो आप विद्वान् जन हैं ( दिवः रोचने त्रिषु ) सत्य ज्ञान के प्रकाश में उत्तम मध्यम और निकृष्ट कोटि के पुरुषों में या तीनों कालों में हैं। आप के लिये सत्य और असत्य कहां है । सनातन की वेद वाणी या मुख्य आज्ञा कहां स्थित है। यह राजा प्रजा वर्ग दोनों जानें । इति विंशो वर्गः ॥
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
१-९ आप्त्यस्त्रित ऋषिः आंङ्गिरसः कुत्सा वा ॥ विश्वे देवा देवता ॥ छन्दः- १, २,१६, १७ निचृतपङ्क्तिः । ३, ४, ६, ९, १५, १८ विराट्पंक्तिः। ८, १० स्वराट् पंक्तिः । ११, १४ पंक्तिः । ५ निचृद्बृहती। ७ भुरिग्बृहती । १३ महाबृहती । १६ निचृत्त्रिष्टुप् ॥
मराठी (1)
भावार्थ
प्रश्न - जेव्हा सर्व लोकांची (गोलांची) आहुती अर्थात् प्रलय होतो तेव्हा कार्यकारण (प्रकृती) व जीव कुठे राहतात? उत्तर - सर्वव्यापी ईश्वर व आकाशात कारणरुपाने जग व गाढ निद्रेत झोपल्याप्रमाणे जीव राहतात. एकेका सूर्याचा प्रकाश व आकर्षण असलेले जितके जितके गोल आहेत तितके तितके सर्व ईश्वराने बनविलेले असून ते धारण करून त्यांची व्यवस्था केलेली आहे हे जाणावे. ॥ ५ ॥
इंग्लिश (2)
Meaning
O lords of knowledge, who or what are those divine powers of existence abiding in the light of heaven by their name, identity and state of being in the three regions of the universe? Where is the law of cosmic dynamics of evolution? What is truth and what is untruth? What is eternal and constant? What is existential and mutable? What was the first mutation of Prakrti in the cosmic yajna? What is going to be the last and closing oblation in the cosmic vedi? May the heaven and earth know and reveal it for us.
Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]
The same subject is continued.
Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]
O learned persons, you should answer the questions regarding the light of the bright solar world, the name, place and origin of the earth and other worlds or divine attributes. What is their true cause, what is the effect and when and how is their ancient dissolution etc. The rest as 'before.
Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]
(देवा:) दिव्यगुणाः पृथिव्यादयो लोकाः = The earth and other worlds possessing divine attributes. (त्रिषु) नामस्थानजन्मसु = Name, place and origin. (दिवः) द्योतकस्य सूर्यमण्डलस्य = Of the refulgent solar world. (ऋतम्) सत्यकारणम् = True cause. (अनृतम्) कार्यम् = Effect.
Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]
The question is when there is dissolution of all worlds, where is then the cause, the effect and the souls ? The answer to the question is. All worlds and souls then stand in Omnipresent God and the sky in causal form. All different worlds which are related to each sun so far as light and gravitation are concerned, have been created and are sustained by God. It is He who keeps them in proper order and Law.
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