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ऋग्वेद मण्डल - 1 के सूक्त 105 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 1/ सूक्त 105/ मन्त्र 6
    ऋषिः - आप्त्यस्त्रित आङ्गिरसः कुत्सो वा देवता - विश्वेदेवा: छन्दः - विराट्पङ्क्ति स्वरः - पञ्चमः

    कद्व॑ ऋ॒तस्य॑ धर्ण॒सि कद्वरु॑णस्य॒ चक्ष॑णम्। कद॑र्य॒म्णो म॒हस्प॒थाति॑ क्रामेम दू॒ढ्यो॑ वि॒त्तं मे॑ अ॒स्य रो॑दसी ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    कत् । वः॒ । ऋ॒तस्य॑ । ध॒र्ण॒सि । कत् । वरु॑णस्य । चक्ष॑णम् । कत् । अ॒र्य॒म्णः । म॒हः । प॒था । अति॑ । क्रा॒मे॒म॒ । दुः॒ऽढ्यः॑ । वि॒त्तम् । मे॒ । अ॒स्य । रो॒द॒सी॒ इति॑ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    कद्व ऋतस्य धर्णसि कद्वरुणस्य चक्षणम्। कदर्यम्णो महस्पथाति क्रामेम दूढ्यो वित्तं मे अस्य रोदसी ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    कत्। वः। ऋतस्य। धर्णसि। कत्। वरुणस्य। चक्षणम्। कत्। अर्यम्णः। महः। पथा। अति। क्रामेम। दुःऽढ्यः। वित्तम्। मे। अस्य। रोदसी इति ॥ १.१०५.६

    ऋग्वेद - मण्डल » 1; सूक्त » 105; मन्त्र » 6
    अष्टक » 1; अध्याय » 7; वर्ग » 21; मन्त्र » 1
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    पुनरेतैः परस्परं किं किं प्रष्टव्य समाधातव्यं चेत्युपदिश्यते ।

    अन्वयः

    हे विद्वांसो व एतेषां स्थूलानां पदार्थानामृतस्य सत्यस्य कारणस्य धर्णसि कत् क्वास्ति वरुणस्य चक्षणं कदस्ति महोऽर्यम्णे यो दूढ्यो व्यवहारस्तं कत् केन पथाऽतिक्रामेम तस्य पारं गच्छाम तद्विद्यया परिपूर्णा भवेमेति यावत्। अन्यत् पूर्ववत् ॥ ६ ॥

    पदार्थः

    (कत्) क्व (वः) एतेषाम् (ऋतस्य) कारणस्य (धर्णसि) धर्त्ता। अत्र सुपां सुलुगिति विभक्तेर्लुक्। (कत्) (वरुणस्य) जलादिकार्यस्य (चक्षणम्) दर्शनम् (कत्) केन (अर्यम्णः) सूर्यस्य (महः) महतः (पथा) मार्गेण (अति) (क्रामेम) ऊल्लङ्घयेम (दूढ्यः) दुःखेन ध्यातुं योग्यो व्यवहारः (वित्तं, मे अस्य, रोदसी) इति पूर्ववत् ॥ ६ ॥

    भावार्थः

    विद्यां चिकीर्षुभिर्विदुषां सविधं प्राप्य कार्यकारणविद्यामार्गप्रश्नान् कृत्वोत्तराणि लब्ध्वा क्रियाकौशलेन कार्याणि संसाध्य दुःखं निहत्य सुखानि लब्धव्यानि ॥ ६ ॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    फिर इनको परस्पर क्या-क्या पूछना और समाधान करना चाहिये, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ।

    पदार्थ

    हे विद्वानो ! (वः) इन स्थूल पदार्थों के (ऋतस्य) सत्य कारण का (धर्णसि) धारण करनेवाला (कत्) कहाँ है (वरुणस्य) जल आदि कार्यरूप पदार्थों का (चक्षणम्) देखना (कत्) कहाँ है तथा (महः) महान् (अर्यम्णः) सूर्य्यलोक का जो (दूढ्यः) अति गम्भीर दुःख से ध्यान में आने योग्य व्यवहार है उसको (कत्) किस (पथा) मार्ग से हम (अति, क्रामेम) पार हों अर्थात् उस विद्या से परिपूर्ण हों। और शेष मन्त्रार्थ प्रथम मन्त्र के तुल्य जानना चाहिये ॥ ६ ॥

    भावार्थ

    विद्या प्राप्ति की इच्छावाले पुरुषों को चाहिये कि विद्वानों के समीप जाकर कार्य्य और कारण की विद्या के मार्ग विषयक प्रश्नों को कर उनसे उत्तर पाकर क्रियाकुशलता से कामों को सिद्ध करके दुःख का नाश कर सुख पावें ॥ ६ ॥

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    विषय

    नियमितता , निर्द्वेषता , जितेन्द्रियता

    पदार्थ

    १. गतमन्त्र के देवों को ही सम्बोधित करते हुए कहते हैं कि (वः) = तुम्हारा (ऋतस्य) = ऋत का (धर्णसि) = [धरणम्] धारण करना (कत्) = कहाँ गया ? ऋत शब्द के दो भाव हैं - [क] खेत में बचे रह गये अन्नकणों को बीनकर जीविका चलाना ; कितना निर्दोष और त्यागमय है यह जीवन ! [ख] प्रत्येक कार्य को सूर्य - चन्द्रमा की भाँति नियमितता से करना - “स्वस्ति पन्थामनु चरेम सूर्याचन्द्रमसाविव” । इस नियमितता का ही परिणाम है कि मनुष्य स्वस्थ शरीर व दीप्त मस्तिष्क का बनता है । 

    २. (वरुणस्य) = द्वेष का निवारण , निर्द्वेषता का (चक्षणम्) = दर्शन (कत्) = कहाँ गया ? ऋत के परिणामस्वरूप देवों का जीवन द्वेषादि से रहित था । ऋत गया तो द्वेषादि आ गये । 

    ३. (अर्यम्णः) = [अरीन् यच्छति] अर्यमा के - शत्रुओं का नियमन करनेवाले के (पथा) = मार्ग से प्राप्त होनेवाला (महः) = [greatness , lusture] महत्त्व व प्रकाश (कत्) = कहाँ गया ? देव द्वेष से ही ऊपर थे सो नहीं , उन्होंने काम - क्रोध - लोभ सभी को जीतकर अपने महत्त्व व दीप्तजीवन को सिद्ध किया था । अर्यमा के मार्ग पर चलना किसको महत्त्व व दीप्ति प्राप्त नहीं कराता ! 

    ३. हे (रोदसी) = द्युलोक व पृथिवीलोक (मे अस्य वित्तम्) = हमारे इस संकल्प को जान लो कि हम अब पुनः (दूढ्यः) = दुर्बुद्धियों को , हमारा अनिष्टाचरण करनेवाले ‘काम - क्रोध - लोभ’ आदि को (अतिक्रामेम) = लाँघ जाएँ । दुर्बुद्धि से उत्पन्न होनेवाले काम - क्रोध आदि को यहाँ दुर्बुद्धि कह दिया गया है । इन्हें पार करना हमारा कर्तव्य है । 
     

    भावार्थ

    भावार्थ - हमारा जीवन नियमितता , निर्द्वेषता व जितेन्द्रियता का हो । 
     

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    विषय

    मूल कारण का अन्वेषण ।

    भावार्थ

    ( वः ) तुम्हारे ( ऋतस्य ) मूल सत् कारण, सत्य ज्ञान और बल, वीर्य के बल को मेघ या समुद्र के समान ( धर्णसिः ) धारण करने वाला ( कत् ) कहां है । ( वरुणस्य ) सर्व श्रेष्ठ परमेश्वर का ( चक्षणं ) साक्षात् दर्शन या ज्ञान ( कत् ) कैसा है ( अर्यम्णः ) सूर्य के समान तेजस्वी, सब दुष्टों के नियन्ता परमेश्वर को ( कत् महः पथा) किस महान् उपदेशमय मार्ग से ( दूढयः ) कठिनता से चिन्तना करने योग्य, बुद्धि के अगम्य पदार्थों को ( अतिक्रामेम ) पार करें, (२) हे शूरवीर, ज्ञानी , पुरुषो ! तुम्हारे (ऋतस्य) ऐश्वर्य को धारण करने वाला राजा कहां है ? दुःखों के वारक राजा का (चक्षणं) चक्षु अर्थात् राज्यप्रबन्ध देखने का साधन कहां है ? (अर्यमणः) न्यायकारी शत्रु नियन्ता राजा के (कत्) किस २ न्याय मार्ग से हम ( दूढ्यः ) दुष्ट पुरुषों को वश करें। (वित्तं मे अस्य रोदसी) राज प्रजावर्गो ! तुम दोनों इस बात का अच्छी प्रकार ज्ञान करो ।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    १-९ आप्त्यस्त्रित ऋषिः आंङ्गिरसः कुत्सा वा ॥ विश्वे देवा देवता ॥ छन्दः- १, २,१६, १७ निचृतपङ्क्तिः । ३, ४, ६, ९, १५, १८ विराट्पंक्तिः। ८, १० स्वराट् पंक्तिः । ११, १४ पंक्तिः । ५ निचृद्बृहती। ७ भुरिग्बृहती । १३ महाबृहती । १६ निचृत्त्रिष्टुप् ॥

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    विद्याप्राप्तीची इच्छा करणाऱ्या पुरुषांनी विद्वानांकडे जावे व कार्यकारण विद्यामार्गाबाबत प्रश्न विचारून त्यांच्याकडून उत्तर घ्यावे. क्रियाकुशलतेने काम सिद्ध करून दुःखाचा नाश करून सुख प्राप्त करावे. ॥ ६ ॥

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    इंग्लिश (2)

    Meaning

    O divinities of existence, what and where is the ultimate cause of the original life and law, what is that omnipotence? What and where is that omniscient all- seeing eye that watches the created forms and their karmic movement? What and where is that awful path of the great sun by which we may comprehend and cross the challenges of existence? May the heaven and earth know of this and reveal the knowledge to me.

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    Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]

    The same subject of questions and answer is continued.

    Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]

    O learned persons, where is the upholder of the true cause of these gross objects? Where is the realization of God the most acceptable or where can we see the water and other elements? How can we go beyond the difficult dealing and path of the great sun or be fully endowed with this knowledge ? The rest as before.

    Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]

    (वरुणस्य) जलादिकार्यस्य = Of water and other objects that have been created by God. (अर्यम्ण:) सूर्यस्य = of the sun. (दूढ़य:) दुःखेन ध्यातुं योग्यो व्यवहारः, तस्य = Of the difficult dealing.

    Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]

    Those who desire to acquire knowledge, should approach learned persons and ask them questions as to the cause and effect and the path of knowledge. They should get their answers and should enjoy happiness by accomplishing various works with arts and industries, thus destroying all misery.

    Translator's Notes

    In the case of the spiritual interpretation the word Varuna and Aryama stand for God the most acceptable. How can we get the knowledge of the most abstruse subjects with the path shown by God who is dispenser of justice and Resplendent like the sun.

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