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ऋग्वेद मण्डल - 1 के सूक्त 84 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 1/ सूक्त 84/ मन्त्र 12
    ऋषिः - गोतमो राहूगणः देवता - इन्द्र: छन्दः - विराडास्तारपङ्क्ति स्वरः - पञ्चमः

    ता अ॑स्य॒ नम॑सा॒ सहः॑ सप॒र्यन्ति॒ प्रचे॑तसः। व्र॒तान्य॑स्य सश्चिरे पु॒रूणि॑ पू॒र्वचि॑त्तये॒ वस्वी॒रनु॑ स्व॒राज्य॑म् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    ताः । अ॒स्य॒ । नम॑सा । सहः॑ । स॒प॒र्यन्ति॑ । प्रऽचे॑तसः । व्र॒तानि॑ । अ॒स्य॒ । स॒श्चि॒रे॒ । पु॒रूणि॑ । पू॒र्वऽचि॑त्तये । वस्वीः॑ । अनु॑ । स्व॒ऽराज्य॑म् ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    ता अस्य नमसा सहः सपर्यन्ति प्रचेतसः। व्रतान्यस्य सश्चिरे पुरूणि पूर्वचित्तये वस्वीरनु स्वराज्यम् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    ताः। अस्य। नमसा। सहः। सपर्यन्ति। प्रऽचेतसः। व्रतानि। अस्य। सश्चिरे। पुरूणि। पूर्वऽचित्तये। वस्वीः। अनु। स्वऽराज्यम् ॥

    ऋग्वेद - मण्डल » 1; सूक्त » 84; मन्त्र » 12
    अष्टक » 1; अध्याय » 6; वर्ग » 7; मन्त्र » 2
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    पुनरेताः किं कुर्वन्तीत्युपदिश्यते ॥

    अन्वयः

    हे मनुष्या ! यूयं यथा स्वराज्यमर्चन् न्यायाधीशः सर्वान् पालयति, तथाऽस्य नमसा सह वर्त्तमानाः प्रचेतसः सेनाः सहः सपर्यन्ति, या अस्य पूर्वचित्तये पुरूणि व्रतानि सश्चिरे ता वस्वीरनुमोदितुं सेवध्वम् ॥ १२ ॥

    पदार्थः

    (ताः) (अस्य) प्रतिपादितस्य (नमसा) अन्नेन वज्रेण वा (सहः) बलम् (सपर्यन्ति) सेवन्ते (प्रचेतसः) प्रकृष्टं चेतो विज्ञानं यासां ताः (व्रतानि) नियमानुगतानि धर्म्याणि कर्माणि (अस्य) (सश्चिरे) गच्छन्ति (पुरूणि) बहूनि (पूर्वचित्तये) पूर्वेषां संज्ञानाय संज्ञापनाय वा (वस्वीः) (अनु) (स्वराज्यम्) इति पूर्ववत् ॥ १२ ॥

    भावार्थः

    मनुष्यैर्नहि सामग्र्या बलेन नियमैर्विनाऽनेकानि राज्यादीनि सुखानि सम्पद्यन्ते तस्माद् यमनियमानामानुयोग्यमेतत्सर्वं संचिन्त्य विजयादीनि कर्माणि साधनीयानि ॥ १२ ॥

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    हिन्दी (4)

    विषय

    फिर वे क्या करती हैं, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ॥

    पदार्थ

    हे मनुष्यो ! तुम लोग जैसे (स्वराज्यम्) अपने राज्य का सत्कार करता हुआ न्यायाधीश सबका पालन करता है, वैसे (अस्य) इस अध्यक्ष के (नमसा) अन्न वा वज्र के साथ वर्त्तमान (प्रचेतसः) उत्तम ज्ञानयुक्त सेना (सहः) बल को (सपर्यन्ति) सेवन करती हैं (याः) जो (अस्य) सेनाध्यक्ष के (पूर्वचित्तये) पूर्वज्ञान के लिये (पुरूणि) बहुत (व्रतानि) सत्यभाषण नियम आदि को (सश्चिरे) प्राप्त होती हैं (ताः) उन (वस्वीः) पृथिवी सम्बन्धियों को देशों के आनन्द भोगने के लिये सेवन करो ॥ १२ ॥

    भावार्थ

    इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को योग्य है कि सामग्री बल और अच्छे नियमों के विना बहुत राज्य आदि के सुख नहीं प्राप्त होते, इस हेतु से यम-नियमों के अनुकूल जैसा चाहिये, वैसा इसका विचार करके विजय आदि धर्मयुक्त कर्मों को सिद्ध करें ॥ १२ ॥

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    विषय

    नम्रतायुक्त बल

    पदार्थ

    १. (ताः) = वे इन्द्रियाँ [गौर्यः] (प्रचेतसः) = प्रकृष्ट ज्ञानवाले (अस्य) = इस इन्द्र जीवात्मा के (सहः) = बल को (नमसा) नमन से, विनीतता के द्वारा (सपर्यन्ति) = पूजित करती हैं । सोमपान करनेवाली इन्द्रियाँ इन्द्र को सबल बनाती हैं और इसके बल को विनीतता से युक्त करती हैं । २. ये इन्द्रियाँ (अस्य) = इस इन्द्र के (पुरूणि) = पालन व पूरणात्मक (व्रतानि) = व्रतों को (सश्चिरे) = सेवित करती हैं । सोमपान करनेवाली इन्द्रियों के द्वारा ही हमारे सब पुण्यकर्म पूर्ण हुआ करते हैं । ३. ये इन्द्रियाँ (पूर्वचित्तये) = सृष्टि से पूर्व वर्तमान उस प्रभु के ज्ञान के लिए होती हैं । इनके द्वारा सृष्टि पदार्थों में प्रभु की महिमा का दर्शन होकर प्रभु की सत्ता में विश्वास दृढ़ होता है । होता यह तभी है जब (अनु स्वराज्यम्) = आत्मानुशासन की भावना प्रबल होती है । आत्मसंयम के बाद ही इन्द्रियाँ उत्तम निवास का कारण बनती हैं ।

    विशेष / सूचना

    भावार्थ = सोमपान करनेवाली इन्द्रियाँ हमें नम्रतायुक्त बल प्राप्त कराती हैं ।

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    विषय

    प्रजाओं के कर्तव्य ।

    भावार्थ

    (ताः) वे ( प्रचेतसः) उत्तम ज्ञान से युक्त, विदुषी ( वस्वीः ) प्रजाएं, ( अस्य ) इस नायक के ( सहः ) शत्रु पराजयकारी बल की ( नमसा ) अपने शत्रु को नमाने वाले शस्त्रास्त्र बल तथा आदर सत्कार और अन्नादि समृद्धि से ( सपर्यन्ति ) आराधना करती हैं, उस की वृद्धि करती हैं । ( स्वराज्यम् अनु ) अपने राज्यैश्वर्य की वृद्धि के लिये ( पूर्वचित्तये ) अपने पूर्व पुरुषों के अनुभवों का ज्ञान प्राप्त करने के लिये, अथवा (पूर्वचित्तये) अपने पूर्वोक्त मुख्य पुरुषों को उचित रीति से बतलाने के लिये ( अस्य ) अपने राजा के ( पुरूणि व्रतानि ) बहुत से नियमों, विधानों और कर्तव्यों को ( सश्चिरे ) धारण करें, उनका पालन और रक्षण करें ।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    गोतमो राहूगण ऋषिः । इन्द्रो देवता । छन्दः—१, ३–५ निचृदनुष्टुप् । २ विराड् नुष्टुप् । ६ भुरिगुष्णिक् । ७-६ उष्णिक् । १०, १२ विराडास्तारपंक्तिः । ११ आस्तारपंक्तिः । २० पंक्तिः । १३-१५ निचृद्गायत्री । १६ निचृत् त्रिष्टुप् । १७ विराट् त्रिष्टुप्। १८ त्रिष्टुप् । १९ आर्ची त्रिष्टुप् । विंशत्यृचं सूक्तम् ।

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    विषय

    विषय (भाषा)- फिर वे क्या करती हैं, इस विषय को इस मन्त्र में कहा है॥

    सन्धिविच्छेदसहितोऽन्वयः

    स्वराज्यम् {अनु}अर्चन् न्यायाधीशः सर्वान् पालयति, तथा अस्य नमसा सह वर्त्तमानाः प्रचेतसः सेनाः सहः सपर्यन्ति, या अस्य पूर्वचित्तये पुरूणि व्रतानि सश्चिरे ता वस्वीः अनुमोदितुं सेवध्वम्॥१२॥

    पदार्थ

    पदार्थः- हे (मनुष्याः)= मनुष्यों ! (यूयम्)=तुम सब, (यथा)=जिस प्रकार से, (स्वराज्यम्)-स्वकीयराष्ट्रम्- इति पूर्ववत्=अपने राज्य की, {अनु}आनुकूल्ये=भलाई के लिये, (अर्चन्) सत्कुर्वन्=उत्तम कार्य करते हुए, (न्यायाधीशः)= न्यायाधीश, (सर्वान्)=सबकी, (पालयति)=रक्षा करता है, (तथा)=वैसे ही, (अस्य)=इसके, (नमसा) अन्नेन वज्रेण वा=अन्न या वज्र के, (सह)=साथ, (वर्त्तमानाः)=उपस्थित, (प्रचेतसः) प्रकृष्टं चेतो विज्ञानं यासां ताः=श्रेष्ठ बुद्धि और विशेष ज्ञानवाली, सेनाः=सेना के, (सहः) बलम्=बल का, (सपर्यन्ति) सेवन्ते=विश्वास करते हैं, (या)=जो, (अस्य) प्रतिपादितस्य=इस निर्माण करनेवाले के, (पूर्वचित्तये) पूर्वेषां संज्ञानाय संज्ञापनाय वा=पहले के ज्ञान के लिये और अन्यों को ज्ञान कराने के लिये, (पुरूणि) बहूनि=बहुत से, (व्रतानि) नियमानुगतानि धर्म्याणि कर्माणि= धर्म और कर्म के नियमों अनुसार, (सश्चिरे) गच्छन्ति=चलते हैं, (ताः) =उन, (वस्वीः)पृथिवी सम्बन्धिन्यः= पृथिवी सम्बन्धी वस्तुओं को, (अनुमोदितुं)=स्वीकार करते हुए, (सेवध्वम्)=उनका सेवन करो॥१२॥

    महर्षिकृत भावार्थ का भाषानुवाद

    महर्षिकृत भावार्थ का अनुवादक-कृत भाषानुवाद- मनुष्यों के द्वारा सामग्री, बल और नियमों के विना बहुत से राज्य आदि के सुख प्राप्त नहीं होते हैं, इसलिये यम-नियमों के अनुसार इन सब पर विचार करके विजय आदि कर्मों को सिद्ध करना चाहिए ॥१२॥

    विशेष

    अनुवादक की टिप्पणियां- यम-यह पाँच हैं-सत्य, अहिंसा, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह पाँच यम होते हैं। नियम- यह पाँच हैं-शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर-प्रणिधान पाँच नियम होते हैं। यम और नियम मनुष्य के मन की प्रवृत्तियों को शुद्ध करने मे सहायक होते हैं।

    पदार्थान्वयः(म.द.स.)

    पदार्थान्वयः(म.द.स.)- हे (मनुष्याः) मनुष्यों! (यूयम्) तुम सब (यथा) जिस प्रकार से अपने राज्य की भलाई के लिये (अर्चन्) उत्तम कार्य करते हुए, (न्यायाधीशः) न्यायाधीश (सर्वान्) सबकी (पालयति) रक्षा करता है, (तथा) वैसे ही (अस्य) इसके (नमसा) अन्न या वज्र के (सह) साथ (वर्त्तमानाः) उपस्थित (प्रचेतसः) श्रेष्ठ बुद्धि और विशेष ज्ञानवाली सेना के (सहः) बल का (सपर्यन्ति) विश्वास करते हैं। (या) जो (अस्य) इस निर्माण करनेवाले के (पूर्वचित्तये) पहले के ज्ञान के लिये और अन्यों को ज्ञान कराने के लिये (पुरूणि) बहुत से (व्रतानि) धर्म और कर्म के नियमों के अनुसार (सश्चिरे) चलते हैं। (ताः) उन (वस्वीः) पृथिवी सम्बन्धी वस्तुओं को (अनुमोदितुं) स्वीकार करते हुए (सेवध्वम्) उनका सेवन करो॥१२॥

    संस्कृत भाग

    ताः । अ॒स्य॒ । नम॑सा । सहः॑ । स॒प॒र्यन्ति॑ । प्रऽचे॑तसः । व्र॒तानि॑ । अ॒स्य॒ । स॒श्चि॒रे॒ । पु॒रूणि॑ । पू॒र्वऽचि॑त्तये । वस्वीः॑ । अनु॑ । स्व॒ऽराज्य॑म् ॥ विषयः- पुनरेताः किं कुर्वन्तीत्युपदिश्यते ॥ सन्धिच्छेदसहितोऽन्वयः- हे मनुष्याः ! यूयं यथा {अनु} भावार्थः(महर्षिकृतः)- मनुष्यैर्नहि सामग्र्या बलेन नियमैर्विनाऽनेकानि राज्यादीनि सुखानि सम्पद्यन्ते तस्माद् यमनियमानामानुयोग्यमेतत्सर्वं संचिन्त्य विजयादीनि कर्माणि साधनीयानि ॥१२॥

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. सामग्री, बल व चांगले नियम याशिवाय अनेक राज्यांचे सुख प्राप्त होऊ शकत नाही. यामुळे माणसांनी यमनियमाच्या अनुकूल वागून विजयप्राप्ती इत्यादी धर्मयुक्त कार्य करावे. ॥ १२ ॥

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    इंग्लिश (3)

    Meaning

    Those forces, noble and intelligent, serve and augment the courage and power of this Indra with food, energy and armaments and, as citizens of the land, as a matter of duty to the freedom and discipline of the republic, predictably join many dedicated projects and programmes of his in anticipation of success.

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    Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]

    The same subject is continued.

    Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]

    O men, as a judge protects all, showing respect to the laws of the Svarajya (Self Government) in the same manner, these armies of the commander endowed with good food and thunderbolt-like powerful weapons and full of knowledge or intelligent serve strength. For acquiring knowledge of old things, they observe many vows and perform many righteous acts on earth.

    Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]

    (नमसा) अन्नेन वज्रोण वा = With good food, or thunderbolt-like powerful weapons. (सिशि्चरे) गच्छन्ति = Go

    Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]

    It is not possible for a man to get good Government and other means of happiness without proper implements, strength and the observance of rules of right conduct. There fore men should get victory over their enemies by the observance of Yamas and Niyamas.

    Translator's Notes

    The Yamas are five in number. अहिंसा (Non-violence) सत्य (Truth) अस्तेय (Non-stealing) ब्रह्मचर्य (Perfect continence) and अपरिग्रह (detachment) सश्रतिर्गतिकर्मा (निघ० २.१४ )|

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    Subject of the mantra

    Then, what do they do? This subject has been discussed in this mantra.

    Etymology and English translation based on Anvaya (logical connection of words) of Maharshi Dayanad Saraswati (M.D.S)-

    He=O!(manuṣyāḥ) =humans, (yūyam) =all of you, (yathā) = In a way that is beneficial for the welfare of one's kingdom, (arcan) =doing good work, (nyāyādhīśaḥ) =judge, (sarvān) =of all, (pālayati) =protects, (tathā) =similarly, (asya) =its, (namasā) =for food and thunder bolt,(saha) =with, (varttamānāḥ) =present, (pracetasaḥ) =with superior intelligence and special knowledge, (sahaḥ) =of the power, (saparyanti) =believe, (yā) =that, (asya) =of this creator, (pūrvacittaye)= to know the past and to know the others. (purūṇi) many,(vratāni)= According to the rules of righteousness and karma, (saścire) =move, (tāḥ) =of those,(vasvīḥ) =earlier thigs of earth, (anumodituṃ) =accepting, (sevadhvam) = earthly things.

    English Translation (K.K.V.)

    O humans! Just as the judge protects everyone while doing good work for the welfare of his kingdom, similarly you all believe in the power of the army with superior intelligence and special knowledge present along with grain or thunderbolt. Those, who follow many rules of righteousness and karma for the earlier knowledge of this creator and to impart knowledge to others. Accept those earthly things and consume them.

    Footnote

    Yama –These are five – Truth, satisfaction, non-violence, celibacy and renunciation are the five Yamas. Niyama - There are five rules - Purification, contentment, penance, self-study and devotion to God. Yama and Niyama are helpful in purifying the tendencies of the human mind.

    TranslaTranslation of gist of the mantra by Maharshi Dayanandtion of gist of the mantra by Maharshi Dayanand

    Without material, strength and rules, human beings cannot attain the happiness of many kingdoms etc., therefore, according to Yama-Niyamas, one should consider all these and accomplish the deeds like victory et cetera.

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