ऋग्वेद - मण्डल 1/ सूक्त 84/ मन्त्र 13
इन्द्रो॑ दधी॒चो अ॒स्थभि॑र्वृ॒त्राण्यप्र॑तिष्कुतः। ज॒घान॑ नव॒तीर्नव॑ ॥
स्वर सहित पद पाठइन्द्रः॑ । द॒धी॒चः । अ॒स्थऽभिः॑ । वृ॒त्राणि॑ । अप्र॑तिऽस्कुतः । ज॒घान॑ । न॒व॒तीः । नव॑ ॥
स्वर रहित मन्त्र
इन्द्रो दधीचो अस्थभिर्वृत्राण्यप्रतिष्कुतः। जघान नवतीर्नव ॥
स्वर रहित पद पाठइन्द्रः। दधीचः। अस्थऽभिः। वृत्राणि। अप्रतिऽस्कुतः। जघान। नवतीः। नव ॥
ऋग्वेद - मण्डल » 1; सूक्त » 84; मन्त्र » 13
अष्टक » 1; अध्याय » 6; वर्ग » 7; मन्त्र » 3
Acknowledgment
अष्टक » 1; अध्याय » 6; वर्ग » 7; मन्त्र » 3
Acknowledgment
भाष्य भाग
संस्कृत (1)
विषयः
पुनस्तस्य कृत्यमुपदिश्यते ॥
अन्वयः
हे सेनेश ! यथाप्रतिष्कुत इन्द्रोऽस्थभिर्नवनवतीर्दधीचो वृत्राणि कणीभूतानि जलानि जघान हन्ति तथा शत्रून् हिन्धि ॥ १३ ॥
पदार्थः
(इन्द्रः) सूर्यलोकः (दधीचः) ये दधीन् वाय्वादीनञ्चन्ति तान् (अस्थभिः) अस्थिरैश्चञ्चलैः किरणचलनैः। अत्र छन्दस्यपि दृश्यते। (अष्टा०७.१) अनेनानङादेशः। (वृत्राणि) वृत्रसंबन्धिभूतानि जलानि (अप्रतिष्कुतः) असंचलितः (जघान) हन्ति (नवतीः) नवतिसंख्याकाः (नव) नव दिशामवयवाः ॥ १३ ॥
भावार्थः
अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। मनुष्यैः स एव सेनापतिः कार्यो यः सूर्यवच्छत्रूणां हन्ता स्वसेनारक्षकोऽस्तीति वेद्यम् ॥ १३ ॥
हिन्दी (4)
विषय
फिर उस राजा के कृत्य का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥
पदार्थ
हे सेनापते ! जैसे (अप्रतिष्कुतः) सब ओर से स्थिर (इन्द्रः) सूर्यलोक (अस्थभिः) अस्थिर किरणों से (नव नवतीः) निन्नानवें प्रकार के दिशाओं के अवयवों को प्राप्त हुए (दधीचः) जो धारण करनेहारे वायु आदि को प्राप्त होते हैं, उन (वृत्राणि) मेघ के सूक्ष्म अवयव रूप जलों को (जघान) हनन करता है, वैसे तू अनेक अधर्मी शत्रुओं का हनन कर ॥ १३ ॥
भावार्थ
यहाँ वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। वही सेनापति होने के योग्य होता है, जो सूर्य के समान दुष्ट शत्रुओं का हन्ता और अपनी सेना का रक्षक है ॥ १३ ॥
विषय
दधीचि की हड्डियों से
पदार्थ
१. (इन्द्रः) = जितेन्द्रि पुरुष (अप्रतिष्कुतः) = प्रतिकूल शब्द से रहित हुआ - हुआ , प्रतिद्वन्द्वी से रहित हुआ - हुआ (दधीचः) = [ध्यानं प्रत्यक्तः = नि० १२/३३] ध्यानी पुरुष की (अस्थभिः) = [असु क्षेपणे] विषयों को दूर फेंकने की शक्तियों से (वृत्राणि) = ज्ञान की आवरणभूत वासनाओं को (नवतीः नव) = निन्यानवे बार (जघान) = नष्ट करता है और इस प्रकार अपने जीवन के शतवर्षों को वासना - शून्य बनाता है । २. 'इन्द्र ने दधीचि की अस्थियों से वज्र बनाकर वृत्र का विनाश किया' - इस पौराणिक कथा का मूल इसी मन्त्र में है इसका भाव मन्त्रार्थ में स्पष्ट है कि ध्यान - परायण व्यक्ति ही दध्यङ् व दधीचि है । विषयों को दूर फेंकने की वृत्तियाँ ही हड़ियाँ हैं । वासना ही वृत्र है । निन्यानवे बार नाश का अभिप्राय यही है कि हम सदा वासना के आक्रमण को अपने से दूर रखने के लिए सजग रहते हैं ।
भावार्थ
भावार्थ = ध्यानपरायण मनुष्य ही वासना का पराजय कर पाता है ।
विषय
सेनापति के कर्तव्य । दधीचि की अस्थियों का रहस्य ।
भावार्थ
( इन्द्रः ) सूर्य जिस प्रकार ( दधीचः ) समस्त पदार्थों को धारण करने वाले वायु आदि पदार्थों में भी व्यापक प्रकाश के ( अस्थभिः ) आघात करने वाले, इधर उधर गति देने वाले किरणों से (वृत्राणि) मेघस्थ जलों को ( जघान ) आघात करता है, उनको छिन्न भिन्न करता है उसी प्रकार (अप्रतिष्कुतः) मुकाबले के प्रतिस्पर्धी शत्रु सेना से पराजित न होने वाला ( इन्द्रः ) शस्त्रों को छिन्न भिन्न करने वाला राजा ( दधीचः ) बल धारण या शस्त्रों को धारण करने वाले वीरों को अपने वश में रखने वाले वीर सेनापति के ( अस्थभिः ) बाण फेंकने में कुशल वीर सैनिकों से ( नवतीः नव ) नव गुण नब्बे [८१०] वृत्राणि ‘बढ़ते शत्रुसैन्धों को ( जवान ) पराजित करे ।’ ‘नवतीः नव ८१० वृत्राणि-’ ८१० शत्रुसैन्य कैसे ? शत्रु, मित्र और उदासीन भेद से तीन हुए, उन के मित्र और मित्रों के मित्र इस प्रकार प्रत्येक के तीन तीन होकर ९ भेद हुए । उत्तम, अधम और मध्यम भेद से प्रत्येक के २७ हुए । इनमें भी प्रत्येक प्रभाव, उत्साह और मन्त्र इन तीन शक्तियों के भेद से ८१ हुए। दश दिशा भेद से ८१० हुए । अध्यात्म में ( इन्द्रः ) आत्मा ( दधीचः ) शरीर धारक प्राण के रोग नाशक बलों से बलवान् होकर ( नवतीः नव ) ८१० प्रकृति जन्य विकारों को नाश करे अथवा वा ( नवतीः नव ) ९९ वर्षों का पार करता है, पूर्णायु, सुखी जीता है।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
गोतमो राहूगण ऋषिः । इन्द्रो देवता । छन्दः—१, ३–५ निचृदनुष्टुप् । २ विराड् नुष्टुप् । ६ भुरिगुष्णिक् । ७-६ उष्णिक् । १०, १२ विराडास्तारपंक्तिः । ११ आस्तारपंक्तिः । २० पंक्तिः । १३-१५ निचृद्गायत्री । १६ निचृत् त्रिष्टुप् । १७ विराट् त्रिष्टुप्। १८ त्रिष्टुप् । १९ आर्ची त्रिष्टुप् । विंशत्यृचं सूक्तम् ।
विषय
विषय (भाषा)- फिर उस राजा के कृत्य का उपदेश इस मन्त्र में किया है॥
सन्धिविच्छेदसहितोऽन्वयः
सन्धिच्छेदसहितोऽन्वयः- हे सेनेश ! यथा अप्रतिष्कुतः इन्द्रः अस्थभिः नवनवतीः दधीचः वृत्राणि कणीभूतानि जलानि जघान हन्ति तथा शत्रून् हिन्धि ॥१३॥
पदार्थ
पदार्थः- हे (सेनेश)=सेनापति ! (यथा)=जिस प्रकार से, (अप्रतिष्कुतः) असंचलितः=किसी से संचलित न किये जानेवाला, (इन्द्रः) सूर्यलोकः=सूर्यलोक, (अस्थभिः) अस्थिरैश्चञ्चलैः किरणचलनैः= अस्थिर और चञ्चल किरणों के चलने के द्वारा, (नव) नव दिशामवयवाः=नौ दिशाओं के अवयवों के द्वारा, (नवतीः) नवतिसंख्याकाः=नव्वे की संख्या में, (दधीचः) ये दधीन् वाय्वादीनञ्चन्ति तान्=धारण किये हुए वायु आदि को ले जानेवाले. (वृत्राणि) वृत्रसंबन्धिभूतानि जलानि=बादल सम्बन्धी पञ्च भूतों में जल हैं, उनके, (कणीभूतानि)=वाष्प कणों में बदल रहे, (जलानि)=जलों को, (जघान) हन्ति=छिन्न-भिन्न करते हैं, (तथा)=वेसे ही, (शत्रून्)=शत्रुओं को, (हिन्धि)=मार दो ॥१३॥
महर्षिकृत भावार्थ का भाषानुवाद
भावार्थः(महर्षिकृतः)- हे सेनापते ! जैसे (अप्रतिष्कुतः) सब ओर से स्थिर (इन्द्रः) सूर्यलोक (अस्थभिः) अस्थिर किरणों से (नव नवतीः) निन्नानवें प्रकार के दिशाओं के अवयवों को प्राप्त हुए (दधीचः) जो धारण करनेहारे वायु आदि को प्राप्त होते हैं, उन (वृत्राणि) मेघ के सूक्ष्म अवयव रूप जलों को (जघान) हनन करता है, वैसे तू अनेक अधर्मी शत्रुओं का हनन कर॥१३॥
विशेष
महर्षिकृत भावार्थ का अनुवादक-कृत भाषानुवाद- इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। वही सेनापति होने के योग्य है, जो सूर्य के समान शत्रुओं का हन्ता और अपनी सेना का रक्षक है, ऐसा जानना चाहिए ॥१३॥
पदार्थान्वयः(म.द.स.)
पदार्थान्वयः(म.द.स.)- हे (सेनेश) सेनापति ! (यथा) जिस प्रकार से (अप्रतिष्कुतः) किसी से संचलित न किये जानेवाला (इन्द्रः) सूर्यलोक (अस्थभिः) अस्थिर और चञ्चल किरणों के चलने के द्वारा और (नव) नव नौ दिशाओं के अवयवों के द्वारा (नवतीः) नव्वे की संख्या में, अर्थात् असंख्य (दधीचः) धारण किये हुए वायु आदि को ले जानेवाले. (वृत्राणि) बादल सम्बन्धी पञ्च भूतों में जल हैं, उनके (कणीभूतानि) वाष्प कणों में बदल रहे (जलानि)जलों को (जघान) छिन्न-भिन्न करते हैं, (तथा) वेसे ही (शत्रून्) शत्रुओं को (हिन्धि) मार दो ॥१३॥
संस्कृत भाग
इन्द्रः॑ । द॒धी॒चः । अ॒स्थऽभिः॑ । वृ॒त्राणि॑ । अप्र॑तिऽस्कुतः । ज॒घान॑ । न॒व॒तीः । नव॑ ॥ विषयः-पुनस्तस्य कृत्यमुपदिश्यते ॥ भावार्थः- अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। मनुष्यैः स एव सेनापतिः कार्यो यः सूर्यवच्छत्रूणां हन्ता स्वसेनारक्षकोऽस्तीति वेद्यम् ॥१३॥
मराठी (1)
भावार्थ
या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. तोच सेनापती होण्यायोग्य असतो. जो सूर्याप्रमाणे दुष्ट शत्रूंचा हन्ता व आपल्या सेनेचा रक्षक असतो. ॥ १३ ॥
इंग्लिश (2)
Meaning
Indra, lord of light and space, unchallenged and unchallengeable, wields the thunderbolt and, with weapons of winds, light and thunder, breaks the clouds of ninety-nine orders of water and electricity for the sake of humanity and the earth.
Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]
What is the duty of Indra is taught in the 13th Mantra.
Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]
O commander of the army, as the un-shakable sun destroys ninety nine or innumerable clouds made of water with the moving unstable rays of the light which go into the supporting airs, in the same way, being indomitable you should destroy all wicked enemies with the aid of your soldiers who are experts in using powerful arms.
Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]
(इन्द्रः) सूर्यलोक: = Solar world. (दधीच:) दधीन धारकान् वाम्यवादीन् अंचन्ति तान् (अस्थिभिः) अस्थिरैः चञ्चलै "किरणचलर्नेः
Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]
Men should appoint only that person as commander of the army who is the destroyer of his enemies like the sun of the clouds and protector of his army.
Translator's Notes
The exact significance of 99 is yet to be found out by research. Most of the commentators take it only in the sense of many or in-numerable. The spiritual interpretation of the Mantra. God who possesses un-restricted might slays with His sin-destroying powers nine senses-five senses of preception and four Antah Karanas or internal organs, mind and intellect etc., engaged in sinful thoughts and acts and therefore unable to protect a devotee who meditates. In this interpretation, the meaning of some important words may be taken as follows: (इन्द्र) परमेश्वर: इदि-परमैश्वर्ये (अस्थभिः) पापत्रक्षेप समर्थाभिः शक्तिभिः असु प्रक्षेपे । (नवती:) न अवन्ति रक्षन्तीति नवती: कर्कन्ध्वादिषु पररूपं वाच्यम् (दधीच:) ध्यानवत: उपासकस्य ध्यानम् अवतीति दध्यङ् ध्यानशब्दस्य पृषोदरादित्वाद दधिभाव:। विद्याधर्मधारकान अंचति विज्ञापयति तस्य इति दधीचः व्याख्याने दयानन्दर्षि: ऋ० १. ११०.९ भाष्ये।
Acknowledgment
Book Scanning By:
Sri Durga Prasad Agarwal
Typing By:
N/A
Conversion to Unicode/OCR By:
Dr. Naresh Kumar Dhiman (Chair Professor, MDS University, Ajmer)
Donation for Typing/OCR By:
N/A
First Proofing By:
Acharya Chandra Dutta Sharma
Second Proofing By:
Pending
Third Proofing By:
Pending
Donation for Proofing By:
N/A
Databasing By:
Sri Jitendra Bansal
Websiting By:
Sri Raj Kumar Arya
Donation For Websiting By:
Shri Virendra Agarwal
Co-ordination By:
Sri Virendra Agarwal