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ऋग्वेद मण्डल - 3 के सूक्त 31 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 3/ सूक्त 31/ मन्त्र 5
    ऋषिः - गाथिनो विश्वामित्रः, ऐषीरथीः कुशिको वा देवता - इन्द्र: छन्दः - निचृत्त्रिष्टुप् स्वरः - धैवतः

    वी॒ळौ स॒तीर॒भि धीरा॑ अतृन्दन्प्रा॒चाहि॑न्व॒न्मन॑सा स॒प्त विप्राः॑। विश्वा॑मविन्दन्प॒थ्या॑मृ॒तस्य॑ प्रजा॒नन्नित्ता नम॒सा वि॑वेश॥

    स्वर सहित पद पाठ

    वी॒ळौ । स॒तीः । अ॒भि । धीराः॑ । अ॒तृ॒न्द॒न् । प्रा॒चा । अ॒हि॒न्व॒न् । मन॑सा । स॒प्त । विप्राः॑ । विश्वा॑म् । अ॒वि॒न्द॒न् । प॒थ्या॑म् । ऋ॒तस्य॑ । प्र॒ऽजा॒नन् । इत् । ता । न॒म॒सा । वि॒वे॒श॒ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    वीळौ सतीरभि धीरा अतृन्दन्प्राचाहिन्वन्मनसा सप्त विप्राः। विश्वामविन्दन्पथ्यामृतस्य प्रजानन्नित्ता नमसा विवेश॥

    स्वर रहित पद पाठ

    वीळौ। सतीः। अभि। धीराः। अतृन्दन्। प्राचा। अहिन्वन्। मनसा। सप्त। विप्राः। विश्वाम्। अविन्दन्। पथ्याम्। ऋतस्य। प्रऽजानन्। इत्। ता। नमसा। विवेश॥

    ऋग्वेद - मण्डल » 3; सूक्त » 31; मन्त्र » 5
    अष्टक » 3; अध्याय » 2; वर्ग » 5; मन्त्र » 5
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    अथ विद्वत्सङ्गेन किं जायत इत्याह।

    अन्वयः

    हे मनुष्या यथा धीरा विप्राः प्राचा मनसा सप्त सतीरभ्यहिन्वन्ननृतमतृन्दन्नृतस्य वीळौ विश्वां पथ्यामविन्दन् तथा त्वं ता नमसा प्रजानन्निदा विवेश ॥५॥

    पदार्थः

    (वीळौ) प्रशंसनीये बले (सतीः) विद्यमानाः प्रकृतीः (अभि) (धीराः) ध्यानवन्तः (अतृन्दन्) हिंस्युः (प्राचा) प्राक्तनेन (अहिन्वन्) वर्धयन्ति (मनसा) अन्तःकरणेन (सप्त) पञ्च प्राणा बुद्धिर्मनश्च (विप्राः) मेधाविनः (विश्वाम्) सर्वाम् (अविन्दन्) लभन्ते (पथ्याम्) पथि साध्वीं क्रियाम् (ऋतस्य) सत्यस्य (प्रजानन्) (इत्) एव (तानि) (नमसा) (आ) (विवेश) आविश ॥५॥

    भावार्थः

    अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। यथा युक्त्या सेवितानि प्राणान्तःकरणानि दुःखत्यागाय सुखलाभाय च प्रभवन्ति तथैव विद्वत्सङ्गादीनि कर्म्माणि दुःखानि निर्वार्य सुखानि जनयन्ति ॥५॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    अब विद्वान् के सङ्ग से क्या होता है, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

    पदार्थ

    हे मनुष्यो ! जैसे (धीराः) उत्तम विचारयुक्त (विप्राः) बुद्धिमान् लोग (प्राचा) प्राचीन (मनसा) अन्तःकरण से (सप्त) पाँच प्राण बुद्धि और मन तथा (सतीः) वर्त्तमान प्रकृतियों को (अभि) (अहिन्वन्) बढ़ाते हैं और मिथ्या का (अतृन्दन्) नाश करें तथा (ऋतस्य) सत्य के (वीळौ) प्रशंसनीय बल में (विश्वाम्) सम्पूर्ण (पथ्याम्) मर्य्यादा के योग्य क्रिया को (अविन्दन्) प्राप्त होते हैं वैसे आप (ताः) उनको (नमसा) स्तुति से (प्रजानन्) जानते हुए (इत्) ही (आ) (विवेश) शुभ कर्म में प्रवेश कीजिये ॥५॥

    भावार्थ

    इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे युक्ति से सेवन किये हुए प्राण और अन्तःकरण दुःख के त्याग और सुख के लाभ के लिये समर्थ होते हैं, वैसे ही विद्वानों के सङ्ग आदि कर्म दुःखों को निवृत्त कराके सुखों को उत्पन्न कराते हैं ॥५॥

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    विषय

    [आवृत्त-चक्षुष्कता] प्रत्यगात्मदर्शन

    पदार्थ

    [१] (वीडौ) = बड़ी दृढ़ विषयरूपी पर्वत गुफा में (सती:) = होती हुई इन इन्द्रियरूप गौवों का (अभि) = लक्ष्य करके (धीराः) = धीर-पुरुष (अतृन्दन्) = इस विषय पर्वत को हिंसित करते हैं। इस पर्वत को विदीर्ण करके ही तो वे इन्द्रियरूप गौवों को फिर से प्राप्त कर सकेंगे। विषय इन्द्रियों का अपहरण करते हैं। धीर- पुरुष उन्हें विषय-व्यावृत्त करके पुनः प्राप्त करने का प्रयत्न करता है । (विप्राः) = ये ज्ञानी पुरुष (सप्त) = इन सात इन्द्रियों को [कर्णाविमौ नासिके चक्षुणी मुखम्] (प्राचा) = प्रकृष्ट गतिवाले (मनसा) = मन से (अहिन्वन्) = विषय जाल से बाहिर निकालते हैं [निरगमयन् सा०] । मन को उत्कृष्ट चिन्तनवाला बनाते हुए ये धीर-पुरुष इन्द्रियों को विषयों की ओर नहीं जाने देते। [२] इसी उद्देश्य से ये धीर-पुरुष (विश्वाम्) = सब सत्यज्ञानों से युक्त (ऋतस्य) = सत्य की (पथ्याम्) = साधनभूतसत्य व यज्ञों का प्रतिपादन करनेवाली इस वेदवाणी को (अविन्दन्) = प्राप्त करते हैं। (ता) = उन सत्य ज्ञानों को (प्रजानन्) = जानता हुआ (इत्) = निश्चय से (नमसा) = नमन द्वारा (आविवेश) प्रभु में प्रवेश करता है ।

    भावार्थ

    भावार्थ - धीर- पुरुष इन्द्रियों को विषय-व्यावृत्त करके, सत्यज्ञान की साधनभूत वेदवाणी का ज्ञान प्राप्त करता हुआ, नमन द्वारा प्रभु में प्रवेश करता है। अथ षष्ठो वर्गः ॥ ६॥

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    विषय

    देह में सातों प्राणवत् राष्ट्र में सात प्रकृतियों का वर्णन।

    भावार्थ

    (धीराः) धीर, बुद्धिमान् ध्याननिष्ठ विद्वान् जन (वीडौ) बल प्राप्त हो जाने पर या बलवान् प्राण के आश्रय पर ही (सतीः सप्त) बलवती सातों वृत्तियों या प्रकृतियों को (अतृन्दन्) मारते हैं। उन पर वश करते हैं। (विप्राः) बुद्धिमान् पुरुष ही उन (सप्त) सातों को (प्राचा) उत्तम पद की ओर जाने वाले (मनसा) मननशील चित्त वा ज्ञान से (अहिन्वन्) उनको बढ़ाते, उनको पुष्ट करते हैं। और वे (विश्वाम्) समस्त (ऋतस्य पथ्याम्) सत्य के मार्ग (अविन्दन्) जान लेते हैं। (प्रजानन् इत्) उत्तम ज्ञानवान् पुरुष ही (ताः) उन सातों को (नमसा) गुरुभक्ति, परमेश्वरोपासना और उत्तम आहार द्वारा (आ विवेश) प्रविष्ट होकर उनको दमन करता है। (२) राष्ट्र पक्षमें—स्वामी, अमात्य, सुहृद्, राष्ट्र, दुर्ग, कोष और बल इन सातों प्रकृतियों को (धीराः = अधि ईराः) अध्यक्षजन वश करता है। अपने (मनसा) वश करने वाले बल से उनको बढ़ावे, जो (ऋतंस्य) सत्य न्याय के सब हित मार्ग को जानते हैं। विद्वान् ही उनको अन्न के बल पर या नमाने वाले दण्ड के बल पर वश करे।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    विश्वामित्रः कुशिक एव वा ऋषिः॥ इन्द्रो देवता॥ छन्दः—१, १४, १६ विराट् पङ्क्तिः। ३, ६ भुरिक् पङ्क्तिः। २, ५, ६, १५, १७—२० निचृत् त्रिष्टुप्। ४, ७, ८, १०, १२, २१, २२ त्रिष्टुप्। ११, १३ स्वराट् त्रिष्टुप्॥ द्वाविंशत्यृचं सूक्तम्॥

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. जसे युक्तीने सेवन केलेले प्राण व अंतःकरण दुःखाचा त्याग व सुखाच्या लाभासाठी समर्थ असतात तसेच विद्वानांची संगती इत्यादी कर्म दुःखांना निवृत्त करून सुख उत्पन्न करतात. ॥ ५ ॥

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    इंग्लिश (2)

    Meaning

    When the seven faculties of the mind and senses grow too strong and rigid in their natural carnality, then saints and sages of patience and courage, knowledge and wisdom, calling up their original strength of the spirit, control their senses, mind and intellect and recover their vision of the path to universal truth and the Divine Law. And the soul, with homage and humility, enters the cave of the heart and discovers the light of Indra, lord of the universe.

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    Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]

    The outcome of the association with the enlightened persons is told.

    Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]

    O men ! as the intelligent and persevering wise men develop seven products of the Matter (5 Pranas) (vital airs) intellect and mind with previous inner sense, they discard the truth and gain all good activity because of the strength of truth. So you should enter them with humility.

    Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]

    N/A

    Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]

    The Pranas and Antahk karanas (inner senses consisting of Mana (mind), Chitta ( individual consciousness ) Buddhi (intellect) and Ahankara (egoism) when utilized properly lead to the mitigation of misery and achievement of happiness. In the same manner, the acts like the association with the enlightened persons drive away all misery and bring about happiness.

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