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ऋग्वेद मण्डल - 5 के सूक्त 31 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 5/ सूक्त 31/ मन्त्र 12
    ऋषिः - अमहीयुः देवता - इन्द्र: छन्दः - त्रिष्टुप् स्वरः - धैवतः

    आयं ज॑ना अभि॒चक्षे॑ जगा॒मेन्द्रः॒ सखा॑यं सु॒तसो॑ममि॒च्छन्। वद॒न्ग्रावाव॒ वेदिं॑ भ्रियाते॒ यस्य॑ जी॒रम॑ध्व॒र्यव॒श्चर॑न्ति ॥१२॥

    स्वर सहित पद पाठ

    आ । अ॒यम् । ज॒नाः॒ । अ॒भि॒ऽचक्षे॑ । ज॒गा॒म॒ । इन्द्रः॑ । सखा॑यम् । सु॒तऽसो॑मम् । इ॒च्छन् । वद॑न् । ग्रावा॑ । अव॑ । वेदि॑म् । भ्रि॒या॒ते॒ । यस्य॑ । जी॒रम् । अ॒ध्व॒र्यवः॑ । चर॑न्ति ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    आयं जना अभिचक्षे जगामेन्द्रः सखायं सुतसोममिच्छन्। वदन्ग्रावाव वेदिं भ्रियाते यस्य जीरमध्वर्यवश्चरन्ति ॥१२॥

    स्वर रहित पद पाठ

    आ। अयम्। जनाः। अभिऽचक्षे। जगाम। इन्द्रः। सखायम्। सुतऽसोमम्। इच्छन्। वदन्। ग्रावा। अव। वेदिम्। भ्रियाते। यस्य। जीरम्। अध्वर्यवः। चरन्ति ॥१२॥

    ऋग्वेद - मण्डल » 5; सूक्त » 31; मन्त्र » 12
    अष्टक » 4; अध्याय » 1; वर्ग » 31; मन्त्र » 2
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    पुनस्तमेव विषयमाह ॥

    अन्वयः

    हे जना ! योऽयमिन्द्रोऽभिचक्षे सुतसोमं सखायमिच्छन् ग्रावेव वदन् वेदिमवा जगाम यस्य जीरमध्वर्यवश्चरन्ति यौ द्वौ शिल्पविद्या भ्रियाते तौ सदैव भवन्तः सत्कुर्वन्तु ॥१२॥

    पदार्थः

    (आ) (अयम्) (जनाः) प्रसिद्धा विद्वांसः (अभिचक्षे) अभितः ख्यातुम् (जगाम) गच्छेत् (इन्द्रः) ऐश्वर्य्यवान् (सखायम्) मित्रम् (सुतसोमम्) निष्पादितपदार्थविद्यम् (इच्छन्) (वदन्) उपदिशन् (ग्रावा) गर्जनायुक्तो मेघ इव (अव) (वेदिम्) अग्निस्थानम् (भ्रियाते) धरेताम् (यस्य) (जीरम्) वेगम् (अध्वर्यवः) विद्यायज्ञसम्पादकाः (चरन्ति) ॥१२॥

    भावार्थः

    ये मनुष्या विद्याप्राप्तये विद्यादानाय वा सर्वैः सह मैत्रीं कृत्वा सङ्गच्छेरँस्ते सर्वां विद्यां प्राप्तुं शक्नुयुः ॥१२॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

    पदार्थ

    हे (जनाः) प्रसिद्ध विद्वान् जनो ! जो (अयम्) यह (इन्द्रः) ऐश्वर्य्यवाला (अभिचक्षे) सब ओर से प्रसिद्ध होने को (सुतसोमम्) संपन्न की पदार्थविद्या जिसने ऐसे (सखायम्) मित्र की (इच्छन्) इच्छा करता और (ग्रावा) गर्जना से युक्त मेघ के सदृश (वदन्) उपदेश देता हुआ जन (वेदिम्) अग्नि के स्थान को (अव, आ, जगाम) प्राप्त होवे (यस्य) जिसके (जीरम्) वेग को (अध्वर्यवः) विद्यारूप यज्ञ के सम्पादक अर्थात् उक्त यज्ञ को प्रसिद्ध करनेवाले जन (चरन्ति) प्राप्त होते हैं और जो दो शिल्पविद्या को (भ्रियाते) धारण करें, उन दोनों का सदा ही आप लोग सत्कार करें ॥१२॥

    भावार्थ

    जो जन विद्या की प्राप्ति तथा विद्या देने के लिये सम्पूर्ण जनों के साथ मित्रता करके मिलें, वे सम्पूर्ण विद्या के प्राप्त होने को समर्थ होवें ॥१२॥

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    विषय

    राष्ट्र का प्रेम से भरण पोषण ।

    भावार्थ

    भा०—हे (जनाः ) प्रजाजनो ! ( अयम् इन्द्रः ) यह ऐश्वर्यवान्, राजा और विद्वान् (सखायं ) अपने मित्र ( सह-सोमम् ) पुत्रवत् प्रिय, राष्ट्र को ( इच्छन् ) हृदय से चाहता ( अभिचक्षे ) उसको देखने और उपदेश करने के लिये ( आ जगाम ) सब ओर जाया करे । ( ग्रावा ) ज्ञान का उपदेश करने वाला विद्वान् और शिला के समान दुष्टों का मुख मर्दन करने वाला क्षत्रिय ( वदन् ) उपदेश करता हुआ और आज्ञा प्रदान करता हुआ, (वेदि ) प्राप्त भूमि को ( भ्रियाते ) पालन करें ( यस्य ) जिसकी ( जीरं ) प्रेरणा को समस्त ( अध्यर्यवः ) अपनी हिंसा वा नाश न चाहने वाले प्रजा जन सदा ( चरन्ति ) आचरण करें, मानें ।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    अवस्युरात्रेय ऋषिः ॥ १-८, १०-१३ इन्द्रः । ८ इन्द्रः कुत्सो वा । ८ इन्द्र उशना वा । ९ इन्द्रः कुत्सश्च देवते ॥ छन्द: – १, २, ५, ७, ९, ११ निचृत्त्रिष्टुप् । ३, ४, ६ , १० त्रिष्टुप् । १३ विराट् त्रिष्टुप । ८, १२ स्वराट्पंक्तिः ॥ त्रयोदशर्चं सूक्तम् ॥

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    विषय

    सुतसोम अध्वर्यु

    पदार्थ

    १. (जना:) = हे लोगो! (अयम् इन्द्रः) = यह सर्वशक्तिमान सर्वैश्वर्यसम्पन्न प्रभु (अभिचक्षे) = तुम्हें देखने के लिए तुम्हारे रक्षण के लिए [Look after] (आजगाम) = आता है। यह इन्द्र (सखायम्) = अपने मित्र (सुतसोमम्) = सोम का सवन करनेवाले को अपने अन्दर वीर्यशक्ति [सोम] को उत्पन्न करनेवाले को- (इच्छन्) = चाहता है। २. यह (वदन्) = हमारे हृदयों में ज्ञान की वाणियों का उच्चारण करता हुआ (ग्रावा) = महान् गुरु [स पूर्वेषामपि गुरुः कालेनानवच्छेदात्] (वेदिम् अवभ्रियाते) = यज्ञवेदी की ओर लाया जाता है, अर्थात् यज्ञात्मक कर्मों में प्रवृत्त होने पर ही हम उस प्रभु को अपने समीप प्राप्त कराते हैं। उस प्रभु के सान्निध्य को हम प्राप्त करते हैं, (यस्य) = जिसकी (जीरम्) = प्रेरणा को (अध्वर्यवः) = यज्ञप्रणेता लोग (चरन्ति) = कार्यान्वित करते हैं। वस्तुतः प्रभु ने 'सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा' यज्ञों के साथ ही हमें जन्म दिया है और कहा है कि इसके द्वारा तुम फूलो-फलो। इन यज्ञों के द्वारा ही तो प्रभु की उपासना होती है 'यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवाः' । प्रभु यज्ञरूप ही तो हैं ।

    भावार्थ

    भावार्थ- प्रभु का मित्र वह है जोकि सोम का [वीर्य का] रक्षण करता है और यज्ञशील होता है ये ही व्यक्ति प्रभु से रक्षणीय होते हैं ।

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    जी माणसे विद्याप्राप्तीसाठी व विद्यादानासाठी संपूर्ण लोकांशी मैत्री करतात. ती संपूर्ण विद्या प्राप्त करण्यास समर्थ असतात. ॥ १२ ॥

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    इंग्लिश (2)

    Meaning

    O citizens of the land, this Indra, the ruling lord, has come to the yajna vedi to see his friends and all with the desire to observe and enjoy the finest achievements of the nation. The scholars too proclaiming their achievements are brought to the vedi where learned priests dedicated to the yajna of love and non-violence conduct and manage the programme and its progress.

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    Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]

    The subject of mechanical engineering is dealt.

    Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]

    O famous scholars ! the wealthy person comes to the place of fire like a thundering cloud to get name and fame, with a view to get a friend, expert in the science of physics and whose speed (quality or worth. Ed.) is known to the performers of the Yajna (in the form of the spread of knowledge). Those two who uphold the science of art and industry and all others should be honored by you.

    Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]

    N/A

    Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]

    The persons who associate with all for the acquisition of knowledge or for imparting knowledge to others, make friendship with all, and thereafter can acquire all kind of know ledge and wisdom.

    Foot Notes

    (सुतसोमम् ) निष्पादितपदार्थविद्यम् = Expert in the science of physics. (जीरम् ) वेगम् । जीरा इति क्षिप्रनाम (NG 2, 15 ) = Speed. (अध्वर्यवः) विद्यायज्ञसम्पादकाः । = Performers of the Yajna in the form of the spread of knowledge.

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