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ऋग्वेद मण्डल - 8 के सूक्त 63 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 8/ सूक्त 63/ मन्त्र 9
    ऋषिः - प्रगाथः काण्वः देवता - इन्द्र: छन्दः - निचृद्गायत्री स्वरः - षड्जः

    अ॒स्य वृष्णो॒ व्योद॑न उ॒रु क्र॑मिष्ट जी॒वसे॑ । यवं॒ न प॒श्व आ द॑दे ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अ॒स्य । वृष्णः॑ । वि॒ऽओद॑ने । उ॒रु । क्र॒मि॒ष्ट॒ । जी॒वसे॑ । यव॑म् । न । प॒श्वः । आ । द॒दे॒ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    अस्य वृष्णो व्योदन उरु क्रमिष्ट जीवसे । यवं न पश्व आ ददे ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    अस्य । वृष्णः । विऽओदने । उरु । क्रमिष्ट । जीवसे । यवम् । न । पश्वः । आ । ददे ॥ ८.६३.९

    ऋग्वेद - मण्डल » 8; सूक्त » 63; मन्त्र » 9
    अष्टक » 6; अध्याय » 4; वर्ग » 43; मन्त्र » 3
    Acknowledgment

    इंग्लिश (1)

    Meaning

    On receiving the variety and versatility of food, energy and inspiration from this generous and virile Indra, life rises and springs forward for the joy of living as an animal gets the grass for food and energy and plays around.

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    याचा अभिप्राय असा की, ईश्वराने जीवलोकाला पुष्कळ अन्न द्यावे, ज्यामुळे आनंद निर्माण व्हावा. ते प्राणी प्रसन्न होऊन त्यांनी त्याच्या कीर्तीचे गान गावे. ॥९॥

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    संस्कृत (1)

    विषयः

    N/A

    पदार्थः

    अस्य वृष्णोः=प्रत्यक्षादिव भासमानात् । वर्षितुरिन्द्रात् । अत्र पञ्चम्यर्थे षष्ठी । जनः । व्योदने=विविधे ओदने भोज्यद्रव्ये लब्धे सति । जीवसे=जीवनाय । उरु=बहु । क्रमिष्ट=भूयोभूयः क्रीडतीत्यर्थः । अत्र दृष्टान्तः, यवन्न=यथा यवं=घासं प्राप्य । पश्वः=पशवः । आददे=हर्षमाददते=गृह्णन्ति तद्वत् ॥९ ॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    N/A

    पदार्थ

    (अस्य+वृष्णोः) सर्वत्र प्रत्यक्ष के समान भासमान इस वर्षाकारी जगदीश्वर से (वि+ओदने) विविध प्रकार के अन्नों को पाकर यह जीवलोक (जीवसे) जीवन के लिये (उरु+क्रमिष्ट) वारंवार क्रीड़ा करता है, (न) जैसे (पश्वः) पशु (यवम्) वास को पाकर (आददे) आनन्द प्राप्त करते हैं ॥९ ॥

    भावार्थ

    इसका अभिप्राय यह है कि ईश्वर जीवलोक को बहुत अन्न देवें, जिससे इसमें उत्सव हो और ये प्राणी प्रसन्न हो उसकी कीर्ति गावें ॥९ ॥

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    विषय

    सुखार्थी जीव का प्रभु के आनन्द की ओर झुकाव।

    भावार्थ

    ( वृष्णः व्योदने ) बरसते मेघ के द्वारा उत्पन्न अन्न पर जिस प्रकार जीव संसार-जीवन के लिये कदम बढ़ाता है और पशुगण जौ आदि चरता है उसी प्रकार (अस्य वृष्णः) इस परम बलशाली, सब सुखों के वर्षक प्रभु के ( वि-ओदने ) विशेष दयार्द्र भाव से पूर्ण रसवत् सुख में यह जीव लोक (जीवसे) जीवन प्राप्त करने के लिये ( उरु क्रमिष्ट ) बहुत कदम बढ़ाता है, और ( पश्वः यवं न ) पशु जिस प्रकार जौ को भोजन के लिये ग्रहण करते हैं उसी प्रकार ये समस्त जीवगण उसी ब्रह्मरूप परम सुखद, रसस्वरूप पदार्थ को ( आददे ) प्राप्त करते हैं।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    प्रगाथः काण्व ऋषिः॥ १—११ इन्द्रः। १२ देवा देवताः॥ छन्द:—१, ४, ७ विराडनुष्टुप्। ५ निचुदनुष्टुप्। २, ३, ६ विराड् गायत्री। ८, ९, ११ निचृद् गायत्री। १० गायत्री। १२ त्रिष्टुप्॥ द्वादशर्चं सूक्तम्॥

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    विषय

    सात्विक भोजन

    पदार्थ

    [१] (अस्य) = इस (वृष्ण:) = सब सुखों के वर्षक प्रभु के प्रभु से उत्पन्न किये गये (व्योदने) = विशिष्ट (ओदन) = सात्त्विक भोजन के होने पर यह जीव (उरु क्रमिष्ट) = खूब क्रियाशील होता है तथा (जीवसे) = उत्कृष्ट जीवन के लिए होता है। [२] (न) = जिस प्रकार (पश्वः) = पशु (यवं) = जौ को, उसी प्रकार यह भोजन को (आददे) = ग्रहण करता है । पशु स्वाद के कारण नहीं खाते रहते। इसी प्रकार यह भी मात्रा में ही भोजन करता है।

    भावार्थ

    भावार्थ- हम उस सुखों के वर्षक प्रभु से दिये गये सात्त्विक भोजनों को ही करें।

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