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ऋग्वेद मण्डल - 9 के सूक्त 106 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 9/ सूक्त 106/ मन्त्र 3
    ऋषिः - अग्निश्चाक्षुषः देवता - पवमानः सोमः छन्दः - निचृदुष्णिक् स्वरः - ऋषभः

    अ॒स्येदिन्द्रो॒ मदे॒ष्वा ग्रा॒भं गृ॑भ्णीत सान॒सिम् । वज्रं॑ च॒ वृष॑णं भर॒त्सम॑प्सु॒जित् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अ॒स्य । इत् । इन्द्रः॑ । मदे॑षु । आ । ग्रा॒भम् । गृ॒भ्णी॒त॒ । सा॒न॒सिम् । वज्र॑म् । च॒ । वृष॑णम् । भ॒र॒त् । सम् । अ॒प्सु॒ऽजित् ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    अस्येदिन्द्रो मदेष्वा ग्राभं गृभ्णीत सानसिम् । वज्रं च वृषणं भरत्समप्सुजित् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    अस्य । इत् । इन्द्रः । मदेषु । आ । ग्राभम् । गृभ्णीत । सानसिम् । वज्रम् । च । वृषणम् । भरत् । सम् । अप्सुऽजित् ॥ ९.१०६.३

    ऋग्वेद - मण्डल » 9; सूक्त » 106; मन्त्र » 3
    अष्टक » 7; अध्याय » 5; वर्ग » 9; मन्त्र » 3
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    पदार्थः

    (सानसिं) सर्वभजनीयं (ग्राभं) ग्रहणीयं (आ) अथ (वृषणं) वर्षणशीलं (वज्रं, सम्भरत्) विद्युतः कर्त्तारम् (अस्य, इत्) अस्यैव (इन्द्रः) कर्मयोगी (अप्सुजित्) सर्वकामनानां स्ववशीभूतकारकः (मदेषु) आनन्दलाभाय (गृभ्णीत) उपासनां कुर्वीत ॥३॥

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    हिन्दी (3)

    पदार्थ

    (सानसिम्) सर्वभजनीय परमात्मा को (ग्राभम्) जो ग्रहण करने के योग्य है (आ) और (वृषणम्) वर्षणशील (वज्रम्) विद्युत् को (संभरत्) बनाता है, (अस्य, इत्) उसी की ही (इन्द्रः) कर्मयोगी (अप्सुजित्) जो सब कामनाओं को वशीभूत करनेवाला है, (गृम्णीत) उपासना को (मदेषु) आनन्द की प्राप्ति के लिये करें ॥३॥

    भावार्थ

    कर्मयोगी को चाहिये कि वह एकमात्र परमात्मा की अनन्य भक्ति करे, अन्य किसी की उपासना न करे ॥३॥

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    विषय

    ग्राभं गृभ्णीत

    पदार्थ

    (इन्द्रः) = जितेन्द्रिय पुरुष (अस्य इत्) = इस सोम के ही (मदेषु) = उल्लासों में, सोमपान से जनित मद में उस (सानसिम्) = सम्भजनीय (ग्राभम्) = ग्रहीतव्य अथवा सारे संसार को ग्रहण करनेवाले प्रभु को (गृभ्णीत) = ग्रहण करता है। सोमरक्षण से ही प्रभु का दर्शन होता है । (च) = और इस (सोमरक्षण) = जनित मद में (वृषणं) = शक्तिशाली (वज्रं) = क्रियाशीलता रूप वज्र को (संभरत्) = धारण करता है और (अप्सुजित्) = सदा कर्मों में प्रसित हुआ हुआ विजयी होता है । सोमरक्षक शक्तिशाली बनकर क्रियाशील बनता है ।

    भावार्थ

    भावार्थ- सोमरक्षण से ही प्रभु सा ग्रहण होता है। यह सोमी पुरुष क्रियाशील होता है ।

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    विषय

    आश्रय योग्य प्रभु।

    भावार्थ

    (अस्य मदेषु) इस के ही हर्षो के लिये (इन्द्रः) मेघवत् ऐश्वर्यवान् प्रभु (सानसिं ग्राभम्) सुख से सेवन योग्य ग्रहण, पकड़ या अवलम्ब को (गृणीत) ग्रहण करे। वह (अप्सुजित्) प्रकृति के परमाणुओं पर भी शासन करने वाला प्रभु (वृषणं वज्रं च) वृष्टिकारक विद्युत् के तुल्य (वृषणं) सुखवर्षी (वज्रम्) बल को (संभरत्) एक साथ धारण करता है।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    ऋषि:-१-३ अग्निश्चाक्षुषः। ४–६ चक्षुर्मानवः॥ ७-९ मनुराप्सवः। १०–१४ अग्निः॥ पवमानः सोमो देवता॥ छन्दः- १, ३, ४, ८, १०, १४ निचृदुष्णिक्। २, ५–७, ११, १२ उष्णिक् । ९,१३ विराडुष्णिक्॥ चतुदशर्चं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (1)

    Meaning

    Under the inspiration and ecstasy of this soma of divine love, let the soul seize the victorious bow, take on the generous virile and mighty bolt of will and power of faith and win the target of the battle of Karma to the attainment of Divinity.

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    कर्मयोग्याने एकमेव परमात्म्याचीच अनन्यभक्ती करावी इतर कुणाची उपासना करू नये. ॥३॥

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