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ऋग्वेद मण्डल - 9 के सूक्त 106 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 9/ सूक्त 106/ मन्त्र 4
    ऋषिः - चक्षुर्मानवः देवता - पवमानः सोमः छन्दः - निचृदुष्णिक् स्वरः - ऋषभः

    प्र ध॑न्वा सोम॒ जागृ॑वि॒रिन्द्रा॑येन्दो॒ परि॑ स्रव । द्यु॒मन्तं॒ शुष्म॒मा भ॑रा स्व॒र्विद॑म् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    प्र । ध॒न्व॒ । सो॒म॒ । जागृ॑विः । इन्द्रा॑य । इ॒न्दो॒ इति॑ । परि॑ । स्र॒व॒ । द्यु॒ऽमन्त॑म् । शुष्म॑म् । आ । भ॒र॒ । स्वः॒ऽविद॑म् ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    प्र धन्वा सोम जागृविरिन्द्रायेन्दो परि स्रव । द्युमन्तं शुष्ममा भरा स्वर्विदम् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    प्र । धन्व । सोम । जागृविः । इन्द्राय । इन्दो इति । परि । स्रव । द्युऽमन्तम् । शुष्मम् । आ । भर । स्वःऽविदम् ॥ ९.१०६.४

    ऋग्वेद - मण्डल » 9; सूक्त » 106; मन्त्र » 4
    अष्टक » 7; अध्याय » 5; वर्ग » 9; मन्त्र » 4
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    पदार्थः

    (सोम) हे सर्वोत्पादक परमात्मन् ! भवान् (जागृविः) जागरणशीलोऽस्ति। (इन्दो) हे प्रकाशस्वरूप परमात्मन् ! (इन्द्राय) कर्मयोगिने (परिस्रव) आविर्भूय तं प्राप्नोतु यः कर्मयोगी (द्युमन्तम्) दीप्तिमान् (स्वर्विदं) विज्ञानी तं (शुष्मं) बलेन (आभर) परिपूरयतु (प्रधन्व) तं जगदुपकाराय प्रेरयतु च ॥४॥

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    हिन्दी (3)

    पदार्थ

    (सोम) हे सर्वोत्पादक परमात्मन् ! आप (जागृविः) जागरणशील हैं, (इन्दो) हे प्रकाशस्वरूप ! कर्मयोगी के लिये (परिस्रव) आप प्राप्त हों, जो कर्म्मयोगी (द्युमन्तं) दीप्तिवाला (स्वर्विदं) विज्ञानी है, उसको (शुष्मं) बल से (आभर) आप पूर्ण करें और आप (प्रधन्व) कर्म्मयोगी को प्रेरणा करें, ताकि वह संसार की भलाई करे ॥४॥

    भावार्थ

    परमात्मा अपनी शक्तियों से सदैव जागृत है और वह कर्मयोगी को सदैव जागृति देकर सावधान करता है ॥४॥

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    विषय

    द्युमन्तं शुष्मं

    पदार्थ

    हे (सोम) = वीर्य ! (जागृवि:) = शरीर रक्षण के लिये सदा जागरित तू (प्रधन्व:) = हमें प्रकर्षेण प्राप्त हो । हे (इन्दो) = सोम (इन्द्राय) = जितेन्द्रिय पुरुष के लिये (परिस्रव) = शरीर में चारों ओर गतिवाला है। इस प्रकार शरीर में व्याप्त हुआ हुआ तू (द्युमन्तं) = ज्योतिर्मय (शुष्मम्) = शत्रुशोषक बल को (आभरः) = करनेवाला हो। उस बल को जो ('स्वर्विदम्') = स्वयं प्रकाश प्रभु का प्राप्त करानेवाला है (स्वयं राजते । प्रभु की प्राप्ति तभी होती है जब कि हम शरीर में शुष्मतया मस्तिष्क में द्युति को स्थापित कर पाते हैं। इन्हें प्राप्त करानेवाला साधन सोम ही है ।

    भावार्थ

    भावार्थ- सोम से रक्षित हुए हुए हम 'ब्रह्म + क्षत्र' सम्पन्न हों और इस प्रकार प्रभुदर्शन करनेवाले बनें ।

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    विषय

    प्रभु सर्वद्रष्टा, सर्वसुख दाता।

    भावार्थ

    हे (सोम) विद्वन् ! तू (जागृविः) जागरणशील, नित्य सावधान रह ! हे (इन्दो) तेजस्विन् ! तू (प्र धन्व) आगे बढ़। तू (परि स्रव) उस के लिये आगे बढ़। और (स्व:-विदम्) सुख प्राप्त करने वाले, (द्युमन्तं शुष्मम्) तेज से युक्त बल को (आ भर) प्रदान कर या धारण कर।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    ऋषि:-१-३ अग्निश्चाक्षुषः। ४–६ चक्षुर्मानवः॥ ७-९ मनुराप्सवः। १०–१४ अग्निः॥ पवमानः सोमो देवता॥ छन्दः- १, ३, ४, ८, १०, १४ निचृदुष्णिक्। २, ५–७, ११, १२ उष्णिक् । ९,१३ विराडुष्णिक्॥ चतुदशर्चं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (1)

    Meaning

    Flow on, O Soma, spirit of divine bliss, ever awake, brilliant and enlightening, streaming on and on for Indra, the soul, bear and bring the light and fire of the sun and vision of heaven.

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    परमात्मा आपल्या शक्तीमुळे सदैव जागृत असतो व तो कर्मयोग्याला सदैव जागृत करून सावधान करतो. ॥४॥

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